पितृपक्ष में किए जानेवाले श्राद्ध के धर्मपिंड से माता और पिता दोनों के कुल के, ब्रह्मदेव से लेकर स्वयं की पीढी तक के सर्व पितरों को कैसे लाभ होता है ?

ब्रह्मदेव इच्छाशक्ति से संबधित होते हैं । अतः स्वयं को ब्रह्मात्मक इच्छा-ऊर्जा का अंश समझकर आवाहन करने से ब्रह्माण्ड की इच्छातरंगें कार्यरत होती हैं । इससे अपने कुल से संबंधित तथा लेन-देन से संबंधित सर्व लिंगदेहों को इस आवाहन द्वारा किए श्राद्धकर्म से गति प्राप्त होती है और हमारा साधनामार्ग सुलभ होता है । इसलिए ब्रह्मा की इच्छाशक्ति के बल पर लिंगदेहों का आवाहन करना महत्त्वपूर्ण होता है । विभिन्न स्तरों पर अटके लिंगदेह अनेक बार वासनाओं से, अर्थात विविध प्रकार की इच्छा-आकांक्षाओं से संबधित होते हैं । उसी प्रकार इन सर्व भाव-भावनाओं की मूल निर्मिति ही ब्रह्मदेव की इच्छाशक्ति से हुई है । अतः मन्त्रों में ‘ब्रह्मदेव से’ ऐसा उल्लेख किया है । ब्रह्मदेव की इच्छाशक्ति सूक्ष्म है, इसलिए उसकी व्याप्ति तथा प्रभावकारिता भी अधिक होती है । अतः इस इच्छाशक्ति के बल पर किए एक पिण्डदान से सभी को लाभ होने में सहायता मिलती है ।