अर्बन (शहरी) नक्सली एवं अर्बन नक्सलवाद : एक गुप्त राष्ट्र घात

‘भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां अब युद्ध के मैदान अथवा दूर सीमाओं तक ही सीमित नहीं हैं । आज सबसे गंभीर और संभावित संकट बाहरी शत्रुओं से नहीं, अपितु शहरों के भीतर काम करनेवाले वैचारिक रूप से प्रेरित ‘राष्ट्रघातियों’ से आता है, जो सामान्यतया ‘बौद्धिक कार्यकर्ता’ तथा ‘व्यवसायी’ होते हैं । यदा-कदा इन्हें ही ‘अर्बन नक्सली’ के रूप में संदर्भित किया जाता है । जब पूर्व रक्षा प्रमुख (सी.डी.एस., स्वर्गीय) जनरल विपिन रावत ने ‘ढाई मोर्चे का युद्ध (टू एंड ए हाफ फ्रंट वॉर)’ शब्द गढा था, तो उन्होंने इन नक्सलियों को भी ‘आधे’ मोर्चे में सम्मिलित किया था । स्वाभाविक रूप से, वे जिन दो मोर्चों का संकेत दे रहे थे, वे चीन तथा पाकिस्तान थे ।

अर्बन (शहरी) नक्सली शब्द उन व्यक्तियों को संदर्भित करता है, जो बाहरी रूप से सम्मानजनक सामाजिक भूमिकाओं में काम करते हैं; किंतु जो संवैधानिक रूप से स्थापित सरकार को उखाड फेंकने के लिए सशस्त्र माओवादी विद्रोह का प्रचार करते हैं, समर्थन करते हैं तथा उसे वैध बताते हैं । नक्सलवाद और अर्बन नक्सलवाद की समस्या ने दशकों से भारत को परेशान किया है । यह भारतीय राज्य के विरुद्ध काम करनेवाले एक छद्म किंतु वास्तविक वैचारिक लोगों का पारिस्थिति के तंत्र एवं जाल (इकोसिस्टम और नेटवर्क) है, जो नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आदिवासी सुरक्षा इत्यादि के हित में काम करने का दावा करता है । इनकी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध राज्य द्वारा की गई कोई भी कार्यवाही दमनकारी तथा जन विरोधी प्रचारित की जाती है । विवाद के पश्चात यह सूत्र ध्यान देने योग्य है – विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता तथा भारत के भविष्य को आकार देनेवाली वैचारिक लडाई के संदर्भ में ।

१. ‘अर्बन नक्सलिज्म’ क्या है ?

शहरी नक्सलवाद के विचार को समझने के लिए सबसे पहले नक्सली आंदोलन को समझना होगा । १९६७ में पश्चिम बंगाल के सिलीगुडी जिले के नक्सलबारी गांव में, यह आंदोलन एक हिंसक किसान विद्रोह के रूप में आरंभ हुआ, जो माओवाद से प्रेरित था और जिसका नेता कानू मजूमदार था । ज्ञातव्य है कि ग्रामीण नक्सलवाद (विद्रोह) हिंसक और सशस्त्र है जबकि शहरी नक्सलवाद इसका गुप्त, रणनीतिक और वैचारिक अंग है । इसमें विभाजनकारी और विनाशकारी (वे इसे क्रांतिकारी कहते हैं) विचारधारा को फैलाने के लिए शैक्षणिक संस्थान, संचार माध्यम, गैरसरकारी संगठन (एन.जी.ओ.), कानूनी मंच, न्यायालय, बार संगठन, सांस्कृतिक संस्थान इत्यादि का उपयोग समाविष्ट है । यह राज्य के अंगों तथा उपकरणों को दुर्बल बनाता है । जंगलों में बंदूक चलानेवाले कैडरों के विपरीत, शहरी नक्सली शहरों में काम करते हैं – युद्ध के मैदान से दूर, परंतु संघर्ष से दूर नहीं । ये युद्ध को युद्ध क्षेत्र से उठाकर विद्यालय और विश्वविद्यालय की कक्षाओं, कॉर्पोरेट बोर्डरूम, न्यूज रूम और ड्रॉइंगरूम में लाते हैं ।

२. शहरी नक्सल की विशेषताएं

शहरी नक्सल रैगटैग आतंकवादी नहीं हैं । वे अधिकतर शिक्षित तथा निश्चित वैचारिक सोच रखनेवाले प्रभावशाली व्यक्ति होते हैं । उनकी प्रभावशीलता एक विध्वंसक एजेंडे को सम्मानित मंचों पर मूल रूप से समाहित करने की उनकी क्षमता में निहित है । शहरी नक्सल से जुडी कुछ सामान्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :

अ. उच्च शैक्षिक और सामाजिक स्थिति : अनेक शहरी नक्सली वकील, प्रोफेसर, लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, गैर-सरकारी संगठन के पदाधिकारी और यहां तक कि सरकारी सेवक हैं । उनका व्यवसाय, पद विश्वसनीयता प्रदान करता है और वे अपनी कथनी तथा करनी से सभी को प्रभावित करते हैं ।

आ. वैचारिक कठोरता : मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी विचार में निहित, वे भारतीय राज्यों को एक दमनकारी, पूंजीवादी और फासीवादी इकाई के रूप में देखते हैं । उनका लक्ष्य सुधार नहीं, अपितु वर्तमान लोकतांत्रिक संरचना को पूर्णतः उखाड फेंकना है ।

इ. संस्थागत घुसपैठ : शहरी नक्सली शैक्षिक, मीडिया, थिंक टैंक, बार काउंसिल और न्यायपालिका में जनमत को आकार देने, युवाओं को प्रभावित करने तथा राज्य की कार्रवाई में बाधा डालने में सिद्धहस्त होते हैं ।

ई. अप्रत्यक्ष परिचालन भूमिका : वे हथियार लेकर नहीं जाते हैं, किंतु वे रणनीतिक मार्गदर्शन, माओवादियों/नक्सलियों को बंदी होने से बचाने के लिए कानूनी सहायता प्रदान करते हैं और भूमिगत नेटवर्क के साथ समन्वय करते हैं ।

उ. कथा युद्ध/नैरेटिव वार : वे मुक्त भाषण, धर्मनिरपेक्षता, अथवा सामाजिक न्याय की आड में राज्य आख्यानों को चुनौती देते हैं, जबकि सूक्ष्म रूप से माओवादी हिंसा को वैध सिद्ध करते हैं और भारतीय राज्यों को परिपीडक के रूप में चित्रित करते हैं ।

३. उद्देश्य : भारतीय राज्य को नष्ट करना

वामपंथी चरमपंथ (लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म) पर अनेक गोपनीय रिपोर्टों और शैक्षणिक अध्ययनों के अनुसार, शहरी नक्सल का उद्देश्य, बडे माओवादी उद्देश्य के साथ गठबंधन कर भारतीय राज्य के विनाश, साथ ही लोगों की सरकार स्थापित करना है । उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता लोकतांत्रिक संस्थानों के लिए नहीं है, अपितु किसी तरह से आवश्यक किसी भी तरह से सत्ता के संघर्ष, क्रांति तथा अंतिम रूप से उस पर नियंत्रण पाने हेतु उनकी शहरी रणनीति पर केंद्रित है ।

४. सहायता प्रणाली : एक गहन तथा संगठित नेटवर्क

(सेवानिवृत्त) मेजर सरस त्रिपाठी

शहरी नक्सली एक संरचित एवं बहुस्तरीय समर्थन प्रणाली के अंतर्गत फलते-फूलते हैं, जो व्यक्तिगत कार्यकर्ताओं से कहीं आगे तक फैली हुई है । इसमें सम्मिलित हैं :

अ. शैक्षणिक संस्थान : कुछ विश्वविद्यालयों को कट्टरपंथी विचारों का केंद्र माना जाता है । प्रोफेसर और छात्र संघ, जाने-अनजाने, आलोचनात्मक चिंतन अथवा सक्रियता के नाम पर माओवादी/नक्सली विचारधारा को बढावा दे सकते हैं । संस्थानों में प्रमुख हैं : जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) तथा  देहली विश्वविद्यालय । जेएनयू शहरी नक्सलियों को बढावा देने के लिए इतना बदनाम हो गया है कि जब ७६ सुरक्षाकर्मियों (सी.आर.पी.एफ. के ७५ और स्थानीय पुलिस का एक जवान) पर घात लगाकर आक्रमण किया गया, तो एन.एस.यू.आई. के शहरी नक्सलियों ने कुछ प्रोफेसरों की मिलीभगत से परिसर में उत्सव मनाया ।

आ. गैर-सरकारी संगठन और नागरिक अधिकार समूह : कुछ गैर-सरकारी संगठन मानवाधिकारों के नाम पर माओवादी समर्थकों को धन उपलब्ध कराते, खुफिया जानकारी इकट्ठी करते अथवा उन्हें सुरक्षा प्रदान करते पाए गए हैं । इन गैर-सरकारी संगठनों में डायोसीजन सोसाइटी चर्च ऑफ नॉर्थ, जीसस एंड मैरी देहली एजुकेशनल सोसाइटी, देहली डायोसीज ओवरसीज ग्रांट फंड, इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (IEG), सैमुअल फाउंडेशन चैरिटेबल इंडिया ट्रस्ट और हीमोफीलिया फेडरेशन ऑफ इंडिया (HFI) सम्मिलित हैं । भारत सरकार ने कुल २०,७११ गैर-सरकारी संगठनों को बंद कर दिया है । ये गैर-सरकारी संगठन सुदूर भविष्य की सोच रखते हैं और पहले से ही अपनी योजनाएं बना लेते हैं । प्रत्येक वर्ष एक नया गैर-सरकारी संगठन पंजीकृत किया जाता है, जिससे यदि एक गैर-सरकारी संगठन पर प्रतिबंध लग जाए, तो दूसरे चलते रह सकें, साथ ही और नए पंजीकृत किए जा सकें ।

इ. कानूनी नेटवर्क : वकीलों और कार्यकर्ताओं का एक जाल बंदी बनाए माओवादियों को वैधानिक सहायता प्रदान करता है, जांच में देरी कराता है तथा सुरक्षा अभियानों में बाधा डालने के लिए जनहित याचिकाएं प्रविष्ट करता है; जैसे अनेक वकीलों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने तीस्ता सीतलवाड के लिए पैरवी की, जिन पर धन के गबन एवं राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का आरोप है । कुछ वकील कश्मीर के खूंखार आतंकवादियों के मुकदमे लड रहे हैं ।

ई. मीडिया और सांस्कृतिक माध्यम : कुछ पत्रकार, लेखक तथा फिल्म निर्माताओं पर नक्सलियों का सहानुभूतिपूर्ण चित्रण एवं राज्य का शत्रुतापूर्ण चित्रण करने का आरोप है, जिससे जनमत उनके पक्ष में बनता है । अनेक फिल्में हैं जो कश्मीरी आतंकवादियों को पीडित के रूप में चित्रित कर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति एवं समर्थन जुटाने के लिए बनाई गई हैं ।

उ. विदेशी धन तथा समर्थन : खुफिया एजेंसियों ने वामपंथी उद्देश्यों से जुडे गैर-सरकारी संगठनों को मिलनेवाले अंतर्राष्ट्रीय धन के प्रति चिन्ता जताई है, जिससे नक्सल आन्दोलन को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिल रहा है ।

यह जटिल जाल शहरी नक्सलियों को प्रत्यक्ष जांच से बचते हुए प्रभावी ढंग से काम करने की अनुमति देता है । वे एक ऐसे विद्रोह के लिए शहरी कमान संरचना के रूप में कार्य करते हैं जो अन्यथा विध्वंसकारी, ग्रामीण तथा हिंसक हैं ।

(क्रमश:)

– (सेवानिवृत्त) मेजर सरस त्रिपाठी, प्रज्ञामठ पब्लिकेशन्स, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश. (२८.७.२०२५)