आम आदमी पार्टी के (‘आप’ के) अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक दृष्टि से उदय एवं अस्त !

१. चुनाव हारकर भी कुछ समय उपरांत पुनरागमन किए राजनेता !

‘सबसे बुरी प्रतिमा होते हुए भी तथा अत्यंत प्रतिकूल स्थिति में चुनाव हार चुके संसाधन संपन्न राजनेताओं का राजनीतिक पटल पर पुनः वर्चस्व स्थापित किए जाने का इतिहास रहा है । अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प उसका ताजा उदाहरण हैं । भारत में भी अविभाजित आंध्र प्रदेश में एन.टी. रामाराव से लेकर चंद्राबाबू नायडू (दोनों भी तेलुगु देसम दल के) जैसे विस्मृति में जा चुके अनेक लोग पुनः राजनीतिक प्रवाह में आए हैं; परंतु राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी का प्रकरण विशेष है । मार्च १९७७ में आपातकाल के उपरांत इंदिरा गांधी को केवल चुनाव की आपत्ति का ही सामना नहीं करना पडा, अपितु आपातकाल लगाने के उनके निर्णय की पूरे देश में निंदा की गई । उसके उपरांत की जनता दल सरकार ने इंदिरा गांधी को बंदी बनाया (इंदिरा गांधी की पराजय के उपरांत मनाए जश्न एवं उत्साह का मैं प्रत्यक्ष साक्षी था ।), तथापि जनवरी १९८० तक इंदिरा गांधी के विरुद्ध जो लहर थी, वह धीमी पड गई तथा उन्होंने अगले लोकसभा चुनाव में ३४३ स्थान (सीटें) प्राप्त कर कांग्रेस को बडी जीत दिला दी ।

कर्नल सी.एन. रामकृष्णन् (सेवानिवृत्त)

२. केजरीवाल की पराजय !

जनवरी २०२५ में देहली के तत्कालीन भ्रष्टाचारी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समर्थन में खुलेआम किए प्रचारयुद्ध की गहराई चौंकानेवाली थी । विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए भाजपा को बहुत पसीना बहाना पडा । २१ मार्च २०२४ को केजरीवाल को बंदी बनाकर कारागृह में डाला गया । उस समय इस घटना का परिदृश्य जिस प्रकार ‘भारत के लोकतंत्र की असफलता’ के रूप में प्रस्तुत किया गया, उससे केजरीवाल को स्वयंसेवी संगठनों तथा विदेशी प्रसारमाध्यमों का कितना अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त था, उसका अनुमान लगाया जा सकता है । संयुक्त राष्ट्रों में भी भ्रष्टाचार के प्रकरण में उन्हें कारागृह में डाले जाने का उल्लेख किया गया । वर्ष २०२५ में केजरीवाल के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आपराधिक अभियोगों सहित विभिन्न न्यायालयों में ४० से अधिक अभियोग लंबित थे ।

केजरीवाल के उदय के पीछे ‘डीप स्टेट’ ?

अनेक लोग यह पूछते हैं कि ‘डीप स्टेट’ ने भारतीय लोकतंत्र तथा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बलशाली आर्थिक शक्ति में भारत का उदय होने में बाधा डालने के लिए क्या अरविंद केजरीवाल को चुना था ? विदेशी शक्तियों, खालिस्तानियों तथा सुसमाचार प्रचारकों ने भारतीय राज्य एवं समाज में हस्तक्षेप किया है तथा इसके आगे भी वे ऐसा करते रहेंगे । पैसा तथा प्रसारमाध्यमों के समर्थन से अरविंद केजरीवाल तथा उनकी आम आदमी पार्टी भविष्य में पुनर्जीवित हुई, तो किसी को उन्हें छोडकर जाने का कोई कारण नहीं है । घुसपैठियों के कारण देहली की जनसंख्या वर्ष २०३४ तक दोगुनी हो जाती । युवा मतदाताओं को अरविंद केजरीवाल, आप तथा उनके संदेहजनक पृष्ठभूमि के विषय में ज्ञात नहीं होगा । देहली अथवा केंद्र में यदि कोई दुर्बल सरकार सत्ता में आती है, तो ‘डीप स्टेट’वालों को ‘टुकडे-टुकडे’ गिरोहों को पुनर्जीवित करने में, साथ ही धार्मिक कलह खडा करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा ।

३. पराजय होकर भी केजरीवाल को मिला देहली के ४४ प्रतिशत मतदाताओं का मतदान !

देहली विधानसभा के चुनाव में हारकर भी केजरीवाल तथा उनकी आम आदमी पार्टी को देहली के ४४ प्रतिशत लोगों का मतदान मिला । वर्ष २०२० के चुनाव में केजरीवाल को ५३.५७ प्रतिशत मत मिले तथा उस समय उन्हें ७० में से ६२ स्थान (सीटें) मिले । फरवरी २०२५ के चुनाव में आम आदमी पार्टी को ४३.५७ प्रतिशत, जबकि भाजपा को ४७.१५ प्रतिशत मत मिले । ‘आप’ को ७० में से केवल २२ सीटें मिली तथा शेष सीटें भाजपा को मिली । २७ वर्ष से अधिक समय से देहली विधानसभा में सत्ता से बाहर रही भाजपा ने वर्ष २०२५ में केजरीवाल के विरुद्ध जोरदार लडाई लडी । केजरीवाल को हराने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री मोदी को मैदान में उतरना पडा । कांग्रेस ने भी बडे स्तर पर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया । ‘आप’ के मत प्रतिशत में आई गिरावट का ‘श्रेय’ कांग्रेस को भी दिया जा सकता है ।

४. सदस्यों की दलगत निष्ठा !

केजरीवाल के लिए कारागृह में भी जाने के लिए तैयार निष्ठावान लोगों का एक समूह आम आदमी पार्टी के पास (‘आप’ के पास) है । भ्रष्टाचार के प्रकरणों में ‘आप’ के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह एवं सत्येंद्र जैन को कारागृह जाना पडा, साथ ही समय-समय पर उनके कारावास की अवधि भी बढाई गई; परंतु उनमें से कोई भी केजरीवाल को छोडकर नहीं गया । नियंत्रण से बाहर हो चुकी स्थिति के कारण केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पडा । उसके उपरांत उन्होंने आतिशी मार्लेना को उनका उत्तराधिकारी चुना ।

५. केजरीवाल की जनताद्रोही कार्यशैली !

अ. निर्दयी साम्यवादी नेता की भांति आचरण ! : केजरीवाल ने जिस प्रकार रणनीति बनाकर अपने ही दल के कुछ नेताओं को दल से बाहर निकाला, वह रणनीति साम्यवादी कार्यकाल के क्रूर नेता की भांति थी । जिनकी कविताएं तथा भाषणों के कारण ‘आप’ के सभाओं में भीड उमडती थी, ऐसे कुमार विश्वास को केजरीवाल ने दल से निकाल दिया । प्रशांत भूषण जैसे स्वयं को ‘चतुर’ कहलानेवाले अधिवक्ता को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया । केजरीवाल वर्ष २०११ में जिसके कंधे पर चढकर राजनीति में ऊपर पहुंचे, उन अण्णा हजारे से मिलने के लिए केजरीवाल के पास समय नहीं था । उनके दल की महिला नेता भी इससे अछूती नहीं रही । राज्यसभा में ‘आप’ का प्रतिनिधित्व करनेवाली स्वाती मालीवाल से केजरीवाल के आवास पर (कुख्यात शीशमहल) ‘आप’ के एक गुंडे ने मारपीट कर तथा उन्हें लात मारकर घायल किया ।

आ.स्वयं के विरुद्ध के अभियोग लडने के लिए जनता के पैसों का उपयोग ! : केजरीवाल ने उनके कार्यकाल के पूरे दशक में देहली के नायब राज्यपाल तथा उनके प्रशासकों को साधारण सूत्रों में तथा कानूनी चुनौतियों में व्यस्त रखा । केजरीवाल ने अर्थहीन अभियोग प्रविष्ट कर केंद्र सरकार के साथ-साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चुनौती देने में भी संकोच नहीं किया । सर्वाेच्च न्यायालय में विख्यात अधिवक्ताओं ने उनके अभियोग लडे हैं । उसके लिए देहली के करदाताओं के पैसों से इन अधिवक्ताओं को करोडों रुपए दिए गए ।

इ. माध्यमों का‘व्यवस्थापन ! : ‘मीडिया मैनेजमेंट’ में केजरीवाल ने गोबेल्स एवं रुपर्ट मर्डोक को भी पीछे छोड दिया है । केजरवाल की साम्यवादी विचारधारा ने अंग्रेजी प्रसारमाध्यमों पर निरंतर दबाव बनाए रखा, जिसके परिणामस्वरूप इन प्रसारमाध्यमों ने ‘भारतीय राजनीति का उदित हो रहा तारा’, इन शब्दों में केजरीवाल की प्रशंसा की । उन्होंने उनकी तुलना प्रधानमंत्री नरेंद्र से भी की । अर्थात ही यह बात विरोधी दलों के ‘इंडी’ गठबंधन की सोनिया गांधी, ममता बनर्जी जैसे नेताओं को रास नहीं आई, यह बात अलग है । प्रसारमाध्यमों के कर्मचारियों को विभिन्न सरकारी संस्थाओं तथा महाविद्यालयों में बडे पद तथा गौरवधन दिया गया ।

ई. प्राप्त पद का चतुराई से उपयोग ! : अरविंद केजरीवाल एवं ‘आप’ पर अभी तक किसी प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगे हैं । विज्ञापनों के लिए उन्होंने देहली सरकार के कोष का उपयोग करने से उन्हें प्रसारमाध्यमों का निरंतर समर्थन मिला । देहली के प्रसारमाध्यम तथा विदेशी समाचारपत्रों ने उनकी प्रतिमा ‘लोकतंत्र तथा मतदाताओं के हित के लिए लडनेवाला नेता’, ऐसी बनाई । कुछ माह पूर्व भारत के नियंत्रक तथा महालेखापरीक्षक के अर्थात ‘कैग’ के ब्योरे में प्रकाशित जानकारी से केजरीवाल ने अत्यंत चतुराई से उनके पद का उपयोग शराबनीति से लेकर लोकनिर्माण एवं खरीद की विभिन्न नीतियों का उपयोग चंदा इकट्ठा करने के लिए किया है , ऐसा दिखाई देता है ।

उ. अप्रत्यक्षरूप से राष्ट्रविरोधी लोगों की सहायता ! : देहली की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर रखने के लिए अत्यंत चतुराई से अपने ‘परिवर्तन’, इस स्वयंसेवी संगठन का राजनीतिक दल में रूपांतरण कर इस दल को सत्ता तक ले जाना कोई छोटा काम नहीं था । कांग्रेस द्वारा चलाए खुलेआम भ्रष्टाचार के कारण देहली के मतदाताओं को केजरीवाल के रूप में एक विकल्प अपनाने के लिए बाध्य किया, इसमें कोई संदेह नहीं है । केजरीवाल की प्रतिमा ‘एक प्रामाणिक व्यक्ति’, ‘निःस्वार्थ सामान्य व्यक्ति’ तथा ‘भ्रष्ट नौकरशाही तथा निचले स्तर की राजनीति के विरुद्ध लडनेवाला नेता’, ऐसी बनी, तथापि उन्हें मिले चंदे के संबंध में अब जानकारी सामने आ रही है ।

तथापि आप के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से खालिस्तानी घटकों को मिलनेवाला समर्थन, इस्लामी गिरोहों द्वारा अनेक महिनों तक देहली की रोकी गई सडकें जैसी घटनाएं बहुत कुछ बताती हैं । ‘टुकडे-टुकडे गिरोह’ के विरुद्ध तत्काल अभियोग न चलाकर केजरीवाल ने अप्रत्यक्ष रूप से उसकी सहायता की, इस बात को देहली की जनता कभी नहीं भूलेगी ।

– कर्नल सी.एन. रामकृष्णन् (सेवानिवृत्त), देहली