Azad Maidan Riots : १३ वर्ष उपरांत भी आजाद मैदान दंगे के आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं !

  • अब तक वसूली भी नहीं !

  • शीलभंग से पीडित महिला पुलिसकर्मियों ने ‘सनातन प्रभात’के पास व्‍यक्‍त की मन की पीडा !

श्री. प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, ‘सनातन प्रभात’

दंगाइयों ने ‘अमर जवान स्मारक’ को ध्वस्त कर दिया।

मुंबई, १० अगस्‍त (संवाददाता) : ११ अगस्‍त २०१२ को धर्मांध मुसलमानों ने महाराष्‍ट्र पुलिस की नाक में दम कर आजाद मैदान के बाहर हुडदंग मचाया था । इस घटना को अब १३ वर्ष अर्थात ४ सहस्र ७४८ दिन बीत गए ।

श्री. प्रीतम नाचनकर

इस दंगे में दंगाईयों ने वाहनों, साथ ही दुकानें तोडकर तथा आगजनी कर आर्थिक हानि तो की है; परंतु उन्‍होंने महिला पुलिसकर्मियों के कपडे फाडकर तथा पुलिसकमियों की बंदूकें छीनकर उनकी अवहेलना भी की थी । महिला पुलिसकर्मियों से राखी बंधवानेवाले राजनेता १३ वर्ष उपरांत भी अपनी बहनों के शील पर हाथ डालनेवालों को दंडित नहीं कर पाए । वर्तमान स्‍थिति को देखा जाए, तो ‘आजाद मैदान के बाहर दंगा करानेवालों को दंड मिलेगा’, यह आशा धुंधली हुई है । उसके कारण सरकार, न्‍यायतंत्र तथा प्रशासन की दंगे के कारण जितनी मानहानि नहं हुई, उतनी मानहानि दंगे के उपरांत की अकार्यक्षमता के कारण हुई है, ऐसी स्‍थिति दिखाई दे रही है ।

आजाद मैदान दंगे के समय पहरे के लिए नियुक्‍त तथा जिन पर धर्मांध मुसलमानों ने आक्रमण किया, उन महिला पुलिसकर्मियों से संपर्क कर ‘सनातन प्रभात’ ने उनकी भावनाएं जानकर लीं ।

आज भी मन से भय दूर नहीं हुआ है ! – पीडित महिला पुलिसकर्मी ने व्‍यक्‍त की पीडा

पीडित महिला पुलिसकर्मी

पुलिस विभाग में नियुक्‍ति होने के कुछ ही दिन पश्‍चात मुझे आजाद मैदान में पहरे के लिए भेजा गया । उस प्रसंग का स्‍मरण होने पर आज भी भय प्रतीत होता है । कभी मैं आजाद मैदान के परिसर में अकेली जाती हूं, तब उस भयानक प्रसंग का स्‍मरण होकर अंतःकरण दहल जाता है । हमारे साथ दुर्व्‍यवहार करनेवालों को १३ वर्ष उपरांत भी दंड नहीं मिला है, इसका दुख होता है ।

वरिष्‍ठ अधिकारियों ने कुछ नहीं किया, तो हमारे बोलने से क्‍या होगा ? – पीडित महिला पुलिसकर्मी ने व्‍यक्‍त की पीडा

उस समय मैं मुंबई मराठी पत्रकार संघ में पहरे पर थी । अंदर निश्‍चितरूप से क्‍या चल रहा है, यह मैंने नहीं देखा; परंतु उसके उपरांत बाहर दंगा भडका । हमारे वरिष्‍ठों ने दंगाईयों को दंड मिले तथा उनसे हानि की वसूली हो; इसके लिए कुछ नहीं किया । तो अब हमारे बोलने से क्‍या होगा ?

क्‍या दंगे की कार्यपद्धति निर्धारित हुई है ?, यह प्रश्‍न मन में उठता है ! – अधिवक्‍ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष, हिन्‍दू विधिज्ञ परिषद (याचिकाकर्ताओं के अधिवक्‍ता)

अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

यह पाप कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल का है । आजाद मैदान दंगे के प्रकरण में अभी तक आरोप निश्‍चित नहीं हुए हैं । सभी आरोपी लापता हैं । अनेक आरोपियों को प्रमाणों के अभाव में छोडा गया है । आजाद मैदान दंगे में महिला पुलिसकर्मियों का शीलभंग हुआ, पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट हुई, उनसे बंदूकें छीन ली गईं तथा पत्रकारों से मारपीट कर उनकी ‘ओबी वैन’ जला दी गईं । उसके कारण पत्रकारों की ओर से हम मुंबई उच्‍च न्‍यायालय गए थे । कांग्रेस ने लज्‍जा के कारण ही क्‍यों न हो; परंतु वसूली की प्रक्रिया आरंभ की; परंतु कांग्रेस ने ‘रजा एकादमी’ को छोड दिया था । हमने न्‍यायालय में रजा एकादमी से वसूली की जाए, यह मांग लगाए रखी । वर्ष २०१३ में तत्‍कालिन न्‍यायाधीश नरेश पाटिल का खंडपीठ प्रतिसप्‍ताह हमारी याचिका सुनता था । उसके कारण सरकार ने रजा एकादमी से भी वसूली की प्रक्रिया आरंभ की; परंतु उसके उपरांत सबकुछ ठप्‍प पड गया है अथवा ‘झारी में छिपे शुक्राचार्यों’ ने कुछ किया है ।

हमने जो सुना है, उसके अनुसार इस प्रकरण में सरकार का पक्ष रखने के लिए विशेष सरकारी अधिवक्‍ता दिया गया था; परंतु अब उसे हटा दिया गया है । आरोपी नहीं मिलते, आरोप भी निश्‍चित नहीं हुए हैं तथा एक रुपए की भी वसूली नहीं हो पाई है, ऐसा दिखाई देता है । १३ वर्ष के लंबे समय के उपरांत भी अपराधियों को दंड नहीं मिला है । उसके कारण कुल मिलाकर क्‍या दंगे की कार्यपद्धति निर्धारित की गई है ?, यह मेरा प्रश्‍न है । पिछले कुछ वर्षों में अकोला, नागपुर जैसे शहरों में इसी प्रकार से दंगे कराए गए । इन दंगों के आरोपी मुसलमान थे तथा मार खानेवाली पुलिस थी । जिनका शीलभंग हुआ, वे महिला पुलिसकर्मी थीं । इस स्‍थिति में परिवर्तन लाने हेतु सरकार को प्रधानता लेना समय की मांग है ।

क्‍या है यह प्रकरण तथा क्‍या है वर्तमान स्‍थिति ?

म्‍यांमार में मुसलमानों पर अत्‍याचार किए जाने का कथित कारण बताकर ११ अगस्‍त २०१२ को मुसलमानों ने आजाद मैदान पर मोर्चा निकाला । इस मोर्चे के समय नेताओं के भडकाऊ भाषणों के कारण दंगा भडक गया । दंगाईयों ने लात मारकर ‘अमर जवान स्‍मारक’ तोडा । पुलिस के २६ वाहनों की तोडफोड की गई । इस प्रकरण में ६१ दंगाईयों पर अपराध पंजीकृत किया गया । तत्‍कालिन जिला दंडाधिकारी ने दंगाईयों से दंगे में हुई हानि की वसूली का आदेश दिया; परंतु पुलिस को दंगाई मिले ही नहीं । इसमें कुछ दंगाईयों की संपत्ति उनके नाम पर नहीं थी, जैसे कारण पुलिस ने बताए । वर्तमान में सभी आरोपी जमानत पर बाहर घूम रहे हैं । उनमें से अनेक आरोपियों ने न्‍यायालय से अपराध वापस लेने की मांग की है । इस प्रकरण में पुलिस आरोपियों के विरुद्ध ठोस प्रमाण नहीं दे पाई है ।

संपादकीय भूमिका 

‘दंगे कराकर भी हमारे विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती’, इससे उन्‍मत्त होकर इन दंगाईयों ने महाराष्‍ट्र में विगत १३ वर्षों में कहां-कहां दंगे कराए, यह देखना आवश्‍यक है । उसके साथ ही उसके लिए केवल दंगाईयों को ही नहीं, अपितु प्रशासनिक अधिकारियों को भी उत्तरदायी मानना होगा, ऐसा यदि इन महिला पुलिसकर्मियों को लगा, तो उसमें अनुचित क्‍या है ?