डॉ. नीलेश नीलकंठ ओक अमेरिका में स्थायी जगप्रसिद्ध भारतीय इतिहास शोधकर्ता हैं । रामायण एवं महाभारत के कालनिर्धारण पर किए गए शोधकार्य के लिए वे विशेषरूप से प्रसिद्ध हैं । वे खगोलशास्त्र, प्राचीन ग्रंथों के संदर्भ एवं उनके आंतरिक तालमेल के आधार पर अत्यंत वैज्ञानिक पद्धति से प्राचीन इतिहास समझाकर बताते हैं । इसीलिए वे हिन्दुत्व के धर्मयोद्धा हैं ।

विशेष सदर

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज के लिए उनके वीर सैनिकों द्वारा किया गया त्याग सर्वाेच्च है, उसी प्रकार से आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ तथा राष्ट्रप्रेमी नागरिक राष्ट्र-धर्म की रक्षा हेतु ‘वीर योद्धा’के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्मरक्षा के कार्य की जानकारी करानेवाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस स्तंभ से अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर आप में उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक
१. डॉ. नीलेश का जीवन एवं शिक्षा
मेरा जन्म महाराष्ट्र राज्य के रत्नागिरी जिले के (परशुराम क्षेत्र) बोरगांव नामक ग्राम में हुआ । १० वीं की परीक्षा उत्तीर्ण होने तक मैंने उस भाग के विविध विद्यालयों में शिक्षा ली । तदुपरांत मुंबई में पार्ले महाविद्यालय से कनिष्ठ विज्ञान महाविद्यालय एवं पदवीपूर्व अभियांत्रिकी शिक्षा ली । तदुपरांत ‘यूडिसीटी’/ ‘आइसीटी’ (युनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी/इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी) से ‘केमिकल इंजीनियरिंग’में (रासायनिक अभियांत्रिकी) पदवी संपादन की और कैनडा में जाकर पदव्युत्तर पदवी प्राप्त की । आजकल मैं अमेरिका के ‘इन्स्टिट्यूट ऑफ एडवान्स्ड साइन्सेस’ में कार्यरत हूं ।


२. राष्ट्र-धर्म एवं हिन्दुत्व, इसके साथ ही रामायण-महाभारत काल का शोधकार्य
‘समाज ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है और जब कोई धर्मकार्य करता है वह उससे थोडा-सा समाज ऋण चुकता करता है, यह मलभूत भान मुझे मेरे माता-पिता ने बचपन से ही करवाया था । मैं बचपन से ही जिज्ञासु था और किताबों से बहुत लगाव था । अत: स्वाभाविक ही मैं बहुत पढता था और बहुत चिंतन भी करता था । इसलिए अपने अनेकानेक प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए मैंने अनेक विषयों का अध्ययन किया । छोटी आयु में ही विविध शास्त्र और धर्म का अध्ययन किया । गत ३५ वर्षाें से भी अधिक समय से मैं जो शोधकार्य कर रहा हूं, उसकी पृष्ठभूमि यही है ।

तदुपरांत महाभारत की वास्तविक और अचूक अवधि खगोलशास्त्र के आधार पर ढूंढने का मेरा काम शुरू हुआ । तदुपरांत मैंने रामायण का काल ढूंढा । इस क्षेत्र में मैंने जो शोध किया वह वास्तव में शास्त्रीय एवं तर्कशुद्ध प्रयत्न था । इससे मेरे कार्य को भारी मात्रा में विज्ञान क्षेत्र की २० शाखाओं में बहुविद्याशाखीय शास्त्रीय (multidisciplinary) प्रमाण के रूप में प्रमाणीकरण (certified) हुआ । इसके अतिरिक्त भारतीय खगोलशास्त्र, कृषि, जलपरिवहन, पशुपालन करना (animal husbandry), अनुभवजन्य ज्ञान, तत्त्वज्ञान, दर्शनशास्त्र एवं भाषाज्ञान की भारतीय नीव विषयों में प्राचीनता प्रस्थापित करना, ये अतिरिक्त कार्य भी मैंने किए हैं । वर्तमान में खगोलशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, कृषि, जलपरिवहन, तत्त्वज्ञान, भाषाशास्त्र, रसायनशास्त्र, आयुर्वेद एवं अन्य अनेक शास्त्र के बीच संबंध स्थापित करने का कार्य शुरू है ।
३. संत एवं महान पुरुष के कार्य से धार्मिक शोधन करने की प्रेरणा
संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराज, जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज, संत नामदेव महाराज, संत एकनाथ महाराज, समर्थ रामदासस्वामी जैसे महान संत, इसके साथ ही लोकमान्य टिळक, वीर सावरकर, आचार्य विनोबा भावे, ब्रह्मर्षि डॉ. पद्माकर विष्णु वर्तक, प.पू. स्वामी वरदानंद भारती (पूर्वाश्रम के प्रा. अनंत दामोदर आठवले), धरमपाल, ब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराज, रा.स्व. संघ के डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार एवं अन्य अनेक लोगों का जीवनचरित्र, उनके संदर्भ में हुई घटनाएं एवं उनकी जानकारी का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पडा है । मेरे विचार करने की प्रक्रिया पर जोसेफ कैम्पबेल, कार्ल पॉपर, हेन्री डेविड थोरऊ, सेनेका माँटीग्न की विचारप्रक्रिया एवं उनके लेखन का मुझ पर बडा प्रभाव था । वर्तमान में श्री. नीरज अत्री, श्री. राजीव मल्होत्रा, अधिवक्ता जे. साईदीपक से मुझे अंतर्दृष्टि मिली है ।

आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence)के काल में ज्ञानयोग का महत्त्व समर्पकता एवं श्रद्धा बिना नहीं, इसके साथ ही प्रज्ञा बिना कुछ भी संभव नहीं । मुख्यरूप से श्रद्धा एवं प्रज्ञा शुद्ध करने में ज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण है ।

४. हिन्दूत्वविरोधी कथानकों (नैरेटिव) का सामना करने के लिए प्रतिदिन भगवद्गीता का अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण है !
राष्ट्रीय एवं आंतरराष्ट्रीय प्रसारमाध्यमों द्वारा हिन्दुत्वविरोधी कथानकों का सामना करने के लिए सर्वसामान्य अथवा असाधारण हिन्दू हो, प्रत्येक हिन्दू को अपने स्वधर्म का पालन करना चाहिए । स्वधर्म क्या है ?, यह जानने के लिए प्रतिदिन भगवद्गीता का अध्ययन करना चाहिए । धर्म एवं मानवता के कल्याण के लिए यह प्रक्रिया सर्वाेत्कृष्ट है । इस पर मेरा अटूट विश्वास है ।
५. हिन्दू समाजव्यवस्था के उद्देश्य से किए जानेवाले प्रयत्न
‘हिन्दू इकोसिस्टम’ (प्रणाली) कुछ मात्रा में अस्तित्व में है । उस दृष्टिकोण से उत्कृष्ट व्यवस्था भी की जा रही है; परंतु वह विविध स्थानों पर उतने तक ही सीमित है । लोगों में अच्छी पद्धतियों के विषय में जागृति निर्माण करना, सामाजिक माध्यम कर सकते हैं । जब व्यक्तिगत संस्था (आध्यात्मिक, बौद्धिक, अधिवक्ता, प्रसारमाध्यम, न्यायिक एवं अन्य) ये अन्य संस्थाओं की ओर (अपने क्षेत्र में हो अथवा अन्य क्षेत्रों में) उनके प्रतिस्पर्धी के रूप में देखती हैं, तब समाजव्यवस्था बिगडने का भय होता है । मुझे ऐसा लगता है कि सभी संस्थाओं को इस आत्मकेंद्रित दृष्टिकोण से बाहर आना चाहिए । व्यक्तिगत हिन्दू बुद्धिजीवियों पर भी यही बात लागू होती है । यदि आप दूसरों को सहयोग कर सकते हैं, तो अवश्य करें । यदि नहीं कर सकते, तो अपने मार्गानुसार जाएं ।

६. ‘मिलेनियल्स’, ‘जेन जी’ एवं युवा पीढी के लिए सूचना
यदि हिन्दू विचारक, गुरु, स्वामी एवं संगठन को परिपूर्ण मानकर सहस्रों लोग, ‘मिलेनियल्स’ (वर्ष १९८०-१९९६ में जन्मी हुई पीढी), ‘जेन जी’ पीढी (वर्ष १९९६ से २०१० तक जन्मी हुई पीढी) अथवा किसी को भी उपदेश अथवा सिखाने का प्रयत्न करना आरंभ करने पर, वे निश्चितरूप से असफल होंगे, ऐसा लगता है । सुननेवाला कौन है, इसकी उपेक्षा कर हिन्दू बुद्धिजीवी और संगठनों को अपने कौशल्य अथवा ज्ञान के कक्ष एवं मर्यादाओं के विषय में उन्हें प्रामाणिक रहना चाहिए । जब तक ये सभी अपने अनुभवों के विषय में अतिशयोक्ती नहीं करते, तब तक सहस्रों लोग, ‘मिलेनियल्स’, ‘जेन जी’ पीढी एवं युवा पीढी इन बुद्धिजीवियों एवं संगठन से जुडी रहेगी ।
७. हिन्दू समाज को जागृत करने के लिए महत्त्वपूर्ण सूत्र
अ. बहुत विस्तार से वाचन करें । धर्मशास्त्र का अध्ययन करें ।
आ. वैज्ञानिक कौशल्य, तर्कशुद्ध निष्कर्ष निकालने का कौशल्य एवं समस्या निवारण करने की कुशलता आत्मसात् करें और उसका अध्ययन करें ।
इ. स्वयं में समृद्धता एवं सादगी लाएं । ध्येय रखें और उसे साध्य करने के लिए कठोर परिश्रम करें । यदि प्रत्यक्ष ध्येय साध्य हो जाए अथवा न हो परंतु उसका भान रहे, तब भी यह समझो कि बहुत कुछ प्राप्त कर लिया ।
रामायण-महाभारत की काल गणना का शोधकार्य !
१. महाभारत का कालनिर्धारण
‘When Did the Mahabharata War Happen ? – The Mystery of Arundhati’ नामक अपनी पुस्तक में ओक ने व्यासमुनि द्वारा लिखी गई महाभारत के खगोलशास्त्रीय संदर्भाें का अध्ययन दिया है । उनके शोधकार्यानुसार, महाभारत युद्ध इ.स. पू. ५ सहस्र ५६१ में हुआ । ‘अरुंधती-वसिष्ठ’ का विशेष उल्लेख किया जाता है – जिस काल में अरुंधती वसिष्ठ के आगे जा रही थीं, यह खगोलशास्त्रीय दृष्टि से एक अत्यंत दुर्लभ घटना है । इसी बात का उल्लेख महाभारत में है ।
२.️ रामायण का कालनिर्धारण
‘The Historic Rama’ नामक अपनी इस पुस्तक में डॉ. ओक ने वाल्मीकि रामायण के खगोलशास्त्रीय संदर्भाें का अध्ययन कर रामायण की घटनाओं का काल निश्चित किया । उनके शोधकार्य के अनुसार रामायण की घटनाएं इ.स. पू. १२ सहस्र २०९ के आसपास हुईं । ग्रंथ में ऋतुओं का वर्णन, ग्रहस्थिति, चंद्र-सूर्यग्रहण, नक्षत्र आदि का अध्ययन कर उन्होंने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है ।
३. शोधकार्य पद्धति
अ. आधुनिक खगोलशास्त्र के सॉफ्टवेयर का उपयोग कर गृह-नक्षत्रों की स्थिति जांचना ।
आ. भूगोल, पुरातत्व, ग्रंथसामग्री की जांच करना ।
इ. ग्रंथ के अंतर्गत सुसंगतता एवं तार्किक स्थिरता रखना ।
वे विविध पॉडकास्ट, परिषद एवं ‘इंडिक’ मंचों पर इतिहास के भारतीय दृष्टिकोन से प्रस्तुतीकरण करने का काम करते हैं ।

श्री. नीलेश ओक को मिले अनेक राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों में से कुछ का उल्लेख !
प्राईड ऑफ अमेरिका : जागतिक सभ्यता के विषय में शोधकार्य करनेवाले अमेरिकी नागरिकों को यह पुरस्कार दिया जाता है ।
सुराभारती समुपासक सम्मान : यह पुरस्कार संस्कृत एवं संस्कृत वाङ्मय में योगदान और उनका वैज्ञानिक शोधकार्य की पृष्ठभूमि पर दिया गया ।
श्री. ओक के व्यावसायिक कार्यकाल में उन्हें मिले कुछ पुरस्कारों का नामोल्लेख !
‘जीई पावर अवार्ड’, ‘सिक्स सिगमा गुरु’, ‘लीन जेदी’, ‘बीटा गामा सिगमा’ पुरस्कार
इसे अवश्य देखें → ‘सनातन प्रभात’ द्वारा आयोजित श्री नीलेश ओक का पॉडकास्टभाग १भाग २ भाग ३ |

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