‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’के कार्यवाह श्री. जयवंत कोंडविलकर अपने गुरु भय्याजी काणे की प्रेरणा से गत ५० वर्षाें से पूर्वोत्तर भारत के सीमा प्रांत में शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय एकात्मता के प्रति जागरूकता निर्माण करने हेतु प्रयत्नशील हैं ।
भावना ही मनुष्य को कार्यरत करती है । बुद्धि दिशा देगी; परंतु देश के प्रति उत्कट प्रेम की भावना ही कार्यकर्ताओं को खरे अर्थ में बल प्रदान करती है । पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्र धार्मिक दबाव, अलगाववादी, मादक द्रव्यों का व्यापार एवं आतंकवाद, ऐसी विविध समस्याओं का निरंतर सामना करनेवाले प्रदेश हैं । इस प्रदेश में राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करने हेतु रत्नागिरी से पूर्वोत्तर भारत में जानेवाले शिक्षक भय्याजी काणे और उनके शिष्य जयवंत कोंडविलकर के जीवन समर्पण का यह प्रवास है । राष्ट्र निर्माण का बीज गहराई तक अंकित हो, इसके लिए वे क्या कर सकते हैं ? देश और भारतीय संस्कृति से जनता और बच्चों को जोडना है, यह विचार कार्यान्वित करते समय अनेकानेक चुनौतियों के सामने आने पर भी जीतोड सेवा कैसे कर सकते हैं, यह कार्य इन दोनों ने कर दिखाया है ।

विशेष सदर

छत्रपति शिवाजी महाराजजी के हिंदवी स्वराज्य के लिए मावळों एवं धर्मयोद्धाओं द्वारा किया त्याग सर्वोच्च है, उसीप्रकार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘धर्मयोद्धा’ के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी और उनके हिन्दू धर्मरक्षा के संघर्ष की जानकारी देनेवाले ‘हिन्दुत्व के धर्मयोद्धा’ इस स्तंभ द्वारा अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इसके साथ ही इन उदाहरणों से हमारे मन की चिंता दूर होकर उत्साह निर्माण होगा ! – संपादक
१. जयवंत कोंडविलकर का परिचय एवं ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’की स्थापना

महाराष्ट्र के भूमिपुत्र एवं स्वयंसेवक दिवंगत शंकर दिनकर (भैय्याजी) काणे ने द्वितीय सरसंघचालक पू. गोळवलकर गुरुजी से प्रेरणा ली । फिर उन्होंने ईशान्य भारत में राष्ट्रीयत्व निर्माण करने का महत्त्वपूर्ण कार्य हाथ में लेकर कोकण के जयवंत कोंडविलकर के साथ यह कार्य वर्ष १९७२ में आरंभ किया है । वे मणिपुर में अपनी आयु के १२ वें वर्ष से हैं । गत ५० से भी अधिक वर्षाें से वे ईशान्य भारत की अलगाववादी शक्तियों को रोकने के लिए सकारात्मक एवं विशेष प्रयत्न कर रहे हैं ।
पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्र का अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि वहां की परिस्थिति कितनी उलझी हुई और चिंताजनक है । भारतीय स्वतंत्रता से पहले के काल से ही वहां के स्थानीय वनवासियों में अलगाव की भावना थी । कुछ विदेशी शक्तियों ने वहां के मूल स्थानीय वनवासियों की विविध जाति-जनजातियों में धार्मिक दबावतंत्र का उपयोग कर फूट डालने के बीज बहुत ही सुनियोजित ढंग से बोए थे । इसके परिणामस्वरूप विघातक शक्तियों ने पूर्वोत्तर भारत में प्रवेश किया । अक्टूबर १९४७ में मणिपुर संस्थान भारत में विलीन हो गया; परंतु स्वतंत्र भारत के ७७ वर्षाें के इतिहास में लगभग ६६ वर्ष अष्टलक्ष्मी प्रदेश का विशेषरूप से सीमा भाग का विकास उपेक्षित रहा । गत ११ वर्षाें से यह चित्र बदल रहा है ।
इस भाग में अलगाववाद, मादक द्रव्य एवं धार्मिक दबावतंत्र के माध्यम से विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप जैसी समस्याओं का सामना करना है तो वहां के वनवासियों की संस्कृति को समझ कर उनमें अपनेपन की भावना धीरे से निर्माण कर और युवा पीढी को विकासाभिमुख उज्जवल भविष्य के स्वप्न साकार होने हेतु निरंतर प्रोत्साहित करते रहना आवश्यक है । उसके लिए सेवाभावी संस्था एवं सामुदायिक स्तर पर प्रयत्नशील रहना होगा । भय्याजी काणे एवं जयवंत कोंडविलकर, इस गुरु-शिष्य की जोडी ने यह कार्य वर्ष १९७२ से अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में भी जारी रखा है । इस कार्य को संस्थात्मक रूप देने के लिए उन्होंने वर्ष १९८६ में ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’ नामक संस्था की स्थापना की ।
वर्ष १९७२ से २००० तक के काल में पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों को शिक्षा हेतु महाराष्ट्र में लाया गया । यहां शिक्षा लेते समय मिला अपनापन और नीतिमूल्यों के आधारपर पूर्वोत्तर भारत के ये वनवासी विद्यार्थी पुन: अपने प्रदेश में जाकर अपना भविष्य बनाने लगे; इसके साथ ही भारतीयत्व के विचारों का प्रसार भी करने लगे । इन्ही विचारों से पूर्वांचल छात्रावासों की संकल्पना साकार हुई ।

२. ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’का उद्देश्य
वर्ष १९९९ में भय्याजी का निधन हो गया । भय्याजी के ‘शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय एकात्मता’का इस स्वप्न को आगे ले जाने का संकल्प श्री. जयवंत कोंडविलकर ने किया है । मणिपुर में सहयोगियों की सहायता से वर्ष २००२ में श्री. कोंडविलकर ने अपने मार्गदर्शक भय्याजी काणे की स्मृतिप्रीत्यर्थ म्यानमार की सीमा के निकट खारासोम में पहला ‘ओजा शंकर विद्यालय’ स्थापित किया । आगे वर्ष २००९ में तमेंलोंग में ‘पौ. शंकर काणे विद्यालय’ और वर्ष २०१५ में चुराचांदपुर में ‘पू. शंकर काणे विद्यालय’ शुरू किए । पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में मूल्याधिष्ठित शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को राष्ट्रीय प्रवाह में लाने का काम भय्याजी काणे और उनके पश्चात श्री. जयवंत कोंडविलकर कर रहे हैं । पूर्वोत्तर भारत में धार्मिक दबाव बढाने के लिए कार्यरत संस्थाओं को भारी मात्रा में विदेशी वित्तीय सहायता मिलती थी । इन संस्थाओं के माध्यम से चलनेवाले विद्यालय नि:शुल्क शिक्षा देते हैं; इसलिए भय्याजी काणे एवं श्री. जयवंत कोंडविलकर ने भी प्रारंभ में नि:शुल्क शिक्षा देकर वहां की युवा पीढी में उज्जवल भविष्य के लिए शिक्षा में रुचि निर्माण की । इसमें भी पहले-पहले अनेक भारतविरोधी अलगाववादी और आतंकी गुटों से प्रखर विरोध होता रहा; परंतु स्थानीय लोगों के विश्वास से यह कार्य चलता रहा । इसे साध्य करने हेतु लगभग ४० वर्ष उन्हें समर्पित करने पडे । ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’ नामक संस्था के माध्यम से मणिपुर के सीमावर्ती क्षेत्र में वर्तमान में ३ विद्यालयों में ४०० से भी अधिक स्थानीय विद्यार्थी शिक्षा ले रहे हैं ।
४० से भी अधिक वर्ष पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में राष्ट्रीय एकात्मता के कार्य के लिए श्री. जयवंत कोंडविलकर ने जीवन समर्पित किया है । १६ से भी अधिक बार उनके प्राण संकट में पड गए थे । अनेक बार आतंकवादी गुटों और भूमिगत गुटों के विरोध का सामना करना पडा । उन्होंने इनका सामना अत्यंत दृढता और साहस से किया । इससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ईश्वरीय कार्य के लिए ही बारंबार उनका पुनर्जन्म हुआ है ! उन्होंने इन सभी प्रसंगों का केवल सामना ही नहीं किया, अपितु उस प्रदेश में उन्हाेंने अपने और संस्था के प्रति लोगों का विश्वास भी जीता है । जयवंतजी की जीवनयात्रा दिल दहला देनेवाली किसी फिल्म से कम नहीं है ।
३. ईशान्य भारतीय स्थानीय युवा पीढी को राष्ट्रीय प्रवाह में लाना ही खरा उपाय है !
श्री. कोंडविलकर कहते हैं, ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है ।) इन नीतिमूल्यों के आधार पर भारत को वास्तव में जागतिक महासत्ता बनाने का स्वप्न यदि साकार करना हो, तो नागरिकों के मन में प्रखर एकात्मता की ज्योति, ज्वाला बनकर सतत धधकती रहनी चाहिए । २१ वीं शताब्दी को बदलनेवाले भू-राजकीय समीकरण एवं हिंद-पैसिफिक भाग के बढते महत्त्व का विचार करने पर पूर्वोत्तर भारत सामरिकदृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । इसकारण ही वहां की समस्याओं के मूल पर जाकर काम करना आवश्यक है । इसीलिए ईशान्य भारतीय स्थानीय युवा पीढी को राष्ट्रीय प्रवाह में लाना, यही खरा उपाय है ।’’
मणिपुर के संविधान के पश्चात देशभर में हुए आंदोलन, नागा एवं मैतेई में आरक्षण के नाम पर नियोजित ढंग से दंगे करवाए जाने का षड्यंत्र, सीमा पर आतंकियों की अफीम की (अमली पदार्थ) खेती, बारंबार होनेवाली हिंसा, अत्याचार, राष्ट्र निर्माण में योगदान देनेवाले सेना अधिकारियों की हत्या, इन सभी बातों को विदेशी शक्तियों के छिपे समर्थन के घटनाक्रम की ओर देखने पर सहज ही ध्यान में आएगा कि मणिपुर सदैव क्यों धधकता रहा है ?
४. ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’के कार्य
मणिपुर राज्य में जैसे ये विद्यालय हैं, उसीप्रकार वहां के बच्चों को आगे की उच्च शिक्षा मिले, देश की मूल संस्कृति समझ में आए, इसके लिए महाराष्ट्र में उनके लिए छात्रावास शुरू किए गए हैं । इस कार्य को ‘ज्ञानप्रबोधिनी’ एवं ‘जनकल्याण समिति’, इन दोनों मान्यवर संस्थाओं का उत्तम सहयोग मिल रहा है । संस्था को राष्ट्रीय एकात्मता सहित सामाजिक समरसता, पूर्वोत्तर सीमा भाग का शाश्वत विकास एवं उत्तुंग कामगिरी कर राष्ट्र विकास में योगदान देनेवाली युवा पीढी तैयार करने के लिए कार्य करना है ।
मणिपुर में आरंभ हुए तीनों विद्यालयों को सक्षम कर पूर्वोत्तर भारत की सीमा भाग के वनवासी विद्यार्थी अपने प्रदेश में रहकर अगली शिक्षा ले पाएं, वनवासियों में सांस्कृतिक संवर्धन एवं आधुनिकता का तालमेल बिठाना हो, तो इन तीनों विद्यालयों को अद्यतन (अपडेट) करना आवश्यक है । वर्तमान में इन विद्यालयों में अपर्याप्त साधन-सुविधाएं हैं । अत: संस्था ने कार्यविस्तार के लिए योजना तैयार की है । भविष्य में वर्तमान साधन-सुविधाएं अद्यतन कर, १० वीं तक कक्षा शुरू करना, पूर्वोत्तर भारत की सीमा मूल्याधिष्ठित शिक्षा देनेवाले विद्यालयों का नेटवर्क निर्माण करना, भविष्य में गतिविधियों के विषय में मार्गदर्शन केंद्रों का निर्माण करना, वैज्ञानिक दृष्टि निर्माण करने के लिए चलित प्रयोगशालाओं का प्रकल्प कार्यान्वित करना, जैविक एवं सांस्कृतिक शोधकार्य को प्रोत्साहन देना, क्रीडा संकुल का निर्माण, कौशल्य केंद्रों का निर्माण करना, स्वास्थ्य सुविधाएं देना, ऐसे विविध प्रकल्प हाथ में लेने हैं । अब भी बहुत लंबी यात्रा तय करनी है । स्थानीय लोगों का सहभाग एवं देश के अन्य भागों के नागरिकों का पूर्वोत्तर भारत की ओर देखने का सकरात्मक दृष्टिकोण का तालमेल बिठाकर, उस प्रदेश के वनवासियों के मन में भारतीयत्व अंकित करने के लिए अपना-अपना जो भी संभव हो योगदान देना, यही भय्याजी काणे के कार्य के प्रति मानवंदना होगी । जयवंत कोंडविलकर कहते हैं यह मार्ग अवश्य ही लंबा और कठिन है; परंतु यही एकमेव मार्ग है । ध्येयपूर्ति का भी यही जलद मार्ग है । यह सर्वथा सच है कि राष्ट्रीयत्व के विचारों का प्रखर प्रकाश ही आगे का मार्ग दिखा सकता है !
आवाहन

‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’के विस्तार कार्य को निधि की आवश्यकता है । संस्था का कार्य यह संपूर्णरूप से सामाजिक समर्थन पर निर्भर है । सज्जन शक्तियों के योगदान से यह पवित्र कार्य सातत्य से शुरू रहे, इसके लिए ‘विद्यार्थी अभिभावकत्व योजना’ आरंभ की गई है । प्रति विद्यार्थी १५ सहस्र की धनराशि जमा कर कोई भी इच्छुक सज्जन राष्ट्रीय एकात्मता के इस कार्य में योगदान दे सकता है । ईशान्य भारत को राष्ट्रीय प्रवाह में लाने के लिए ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’को उदार हस्तों से सहायता करें और प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय कार्य में सक्रीय सहभागी हों’, ऐसा आवाहन ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’के कार्यकारी संचालक श्री. जयवंत कोंडविलकर करते हैं ।
अनुभवाधारित शिक्षा के भाग के रूप में देश के कोने-कोने से परिस्थिति समझकर लेने के लिए कम से कम एक वर्ष युवक पूर्व सीमा भाग में सेवाकार्य कर, राष्ट्र निर्माण के कार्य को और अधिक सक्षम बनाएं । ऐसे इच्छुक युवक ‘पूर्व सीमा विकास प्रतिष्ठान’के कार्य में सम्मिलित होना चाहें, तो वे श्री. जयवंत कोंडविलकर (९६१९७२०२१२), श्री. श्रीपादजी दाबक (९८६००९५८५१) अथवा प्रा. श्रुति मेहता (९०२८९५०२००) से अवश्य संपर्क साधें । आपका सदैव स्वागत है ।
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