
१. साम्यवादियों की विभाजनकारी विचारधारा
वर्ष १९४५ में गंगाधर अधिकारी नामक साम्यवादी ने खुलेआम लिखा था, ‘भारत नैसर्गिक लोकतांत्रिक देश नहीं है; इसलिए उसके १४ भागों में टुकडे कर देने चाहिए ।’ उसके कारण ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ (‘जे.एन.यू.’) में कुछ युवक जब ‘भारत तेरे टुकडे होंगे’ के नारे लगाते हैं । वे अकस्मात ही उठकर ऐसा नहीं बोलते, अपितु वह उनकी मूल विचारधारा ही है । पाकिस्तान एवं भारत के विभाजन का वैचारिक आधार भी साम्यवादियों ने ही तैयार किया था । उनका खालिस्तान को भी समर्थन है । जहां-जहां भारत के टुकडे करने की बात आती है, वहां-वहां साम्यवादी निश्चित ही उनके साथ खडे रहते हैं । भारत के अधिक से अधिक टुकडे करने के लिए वे सदैव कार्यरत रहते हैं । उनका मूल लक्ष्य हिन्दू धर्म है । हिन्दू धर्म को अपमानित करने के लिए उनके सभी प्रयास चलते रहते हैं । यह एक अत्यंत गंभीर विषय है । इसके कारण आनेवाले समय में हमें साम्यवादियों से सतर्क रहने की आवश्यकता है ।

२. भारतीय समाज के टुकडे करना ही साम्यवादियों की नीति है !
साम्यवाद एक बडा विशाल वृक्ष है । भारतीय समाज के अनेक टुकडे करना उनकी आंतरिक नीति है । एक वर्ग को वे ‘शोषक’ कहते हैं, जबकि दूसरे वर्ग को ‘शोषित’ कहते हैं । शोषक एवं शोषितों के मध्य सदैव संघर्ष भडकता रहना चाहिए, इसके लिए वे प्रयासशील होते हैं । इस संघर्ष से अराजकता फैलती है तथा अराजकता से विध्वंस होता है । ‘सहस्रों वर्षाें से तैयार हुई मानवीय संस्कृति को संपूर्णरूप से नष्ट करना तथा उसके उपरांत ‘क्लोन सिलेक्ट’ के नाम पर हम पर एक नया मानव, नई संस्कृति थोपकर नए समाज की निर्मिति करना’, यह उनका विचार है । भले ही ऐसा हो, पर उन्होंने आज तक कभी भी नए सृजन की क्षमता नहीं दिखाई । उन्हें इसके अनेक अवसर मिले, तब भी वे कोई भी नया सृजन नहीं कर सके; उसके विपरीत, वे मनुष्य को मानवताशून्य बनाकर पशु के स्तर पर ले आए । नया मानव उत्पन्न करने की बात तो छोड ही दीजिए, उन्होंने मानव को केवल दानव नहीं, अपितु क्रूर पशु बना रखा है । अत: उनसे सतर्क रहना अत्यंत आवश्यक है ।
शक्तिशाली लोकतांत्रिक देशों को साम्यवाद से संकट !
जब कोई भी लोकतांत्रिक देश शक्तिशाली बनता है, तब वे सर्वप्रथम उस पर आक्रमण करते हैं । वे लोकतांत्रिक देशों को शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहते । अमेरिका सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश था । उसके कारण उन्होंने पहला आक्रमण अमेरिका पर किया । अब धीरे-धीरे भारत शक्तिशाली बन रहा है, तो अब उन्होंने अपना संपूर्ण ध्यान भारत पर केंद्रित किया है । समायवादियों को भारत की परिवार व्यवस्था, संयुक्त परिवारपद्धति, धर्मव्यवस्था, भारतीयों का राष्ट्रप्रेम एवं शिक्षाप्रणाली; इन सभी में घुसकर उन्हें दीमक की भांति धीरे-धीरे खोखला करना है । इस विषय में उन्होंने खुलेआम उनकी पुस्तकों में लिखा है ‘पहले चरण में हमारी क्रांति बंदूक की धाक पर होनेवाली क्रांति होगी’, ऐसा कार्ल मार्क्स ने कहा था; परंतु उसके उपरांत साम्यवादियों में अपनी रणनीति बदली । अब उन्होंने कहा है, ‘हम भारत देश को दीमक की भांति खोखला करेंगे ।’ इसके लिए वे अत्यंत आकर्षक मुखौटे की आड में काम कर रहे हैं । वे हमारी सभी व्यवस्थाएं ध्वस्त करने का काम कर रहे हैं और हमें वे साम्यवादी हैं, यह समझ में भी नहीं आता । – श्री. अभिजित जोग |
३. हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने के लिए परिवार व्यवस्था, धर्मसंस्था, शिक्षा प्रणाली एवं राष्ट्रवाद पर आक्रमण

दो गुटों में संघर्ष उत्पन्न करने के लिए साम्यवादियों का मुख्य आधार आर्थिक था । पहले ‘धनवान विरुद्ध निर्धन’ अथवा ‘धनवान मालिक विरुद्ध श्रमिक’ के आधार पर समाज में संघर्ष होना चाहिए, यह उनकी इच्छा थी; परंतु उनका यह उद्देश्य संपूर्णरूप से असफल रहा । सोवियत यूनियन (आज का रूस) का पतन हुआ तथा संपूर्ण यूरोपीय देशों में साम्यवाद असफल रहा, तब उनके यह ध्यान में आया कि आर्थिक आधार पर समाज को बांटने की नीति अब नहीं चलेगी । उसके उपरांत उन्होंने अपनी नीति में परिवर्तन कर सांस्कृतिक आधार पर समाज को विभाजित करना आरंभ किया । उन्होंने भारत की उच्च कोटि की हिन्दू संस्कृति नष्ट करने की योजना बनाई । उसके लिए उन्होंने संस्कृति को बल देनेवाली परिवार व्यवस्था, धर्मसंस्था, राष्ट्रवाद एवं शिक्षाप्रणाली को नष्ट करने का प्रयास आरंभ किया ।
हमारी परिवार व्यवस्था उनका सबसे बडा लक्ष्य है । सर्वप्रथम उन्हें भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था नष्ट करनी है । संयुक्त परिवार व्यवस्था यदि समाप्त हुई, तो लोग अपनी इच्छा अनुसार तथा उन्हें जब चाहिए, तब वे दूसरों से संबंध रख सकेंगे । उसके कारण स्वैराचार फैलेगा । ‘यह आक्रमण बंदूक के बल पर अथवा रक्तरंजित क्रांति से नहीं होगा’, ऐसा उन्होंने कहा । ‘हम सभी संस्थाओं में हमारी विचारधारा घुसा देंगे तथा समस्त समाज को दीमक की भांति ऐसा खोखला करेंगे कि एक दिन इस सनातन वैदिक संस्कृति का संपूर्ण पतन होगा ।’ उन्होंने १९२०-१९३० के दशक में ही यह लिखकर रखा है । उसके अनुसार वे भारतीय परिवार व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली एवं धर्मव्यवस्था को नष्ट कर रहे हैं ।
उनके विचारक विलिमन जेंबर्ग ने वर्ष १९२०-१९३० में लिखकर रखा, ‘पाश्चात्य संस्कृति की दुर्गंध आएगी, ऐसी योजना हम चलाएंगे । (वी विल मेक द वेस्टर्न्स सिविलाइजेशन स्टिंक)’ साम्यवादियों द्वारा जानबूझकर रचे गए षड्यंत्र के अनुसार हम अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप में परिवार व्यवस्था संपूर्णरूप से नष्ट होने की स्थिति देख रहे हैं । वहां के लोगों का धर्म के प्रति विश्वास पूर्णरूप से टूट गया है तथा उनका राष्ट्रप्रेम समाप्त हुआ है । यह अपनेआप नहीं हुआ है । इसका षड्यंत्र वे विगत १०० वर्षाें से चला रहे हैं । ऐसा वे करनेवाले हैं, यह उन्होंने स्वयं ही लिखकर रखा था । उनका अगला लक्ष्य ‘भारत’ है । इसलिए इस आक्रमण को समझना आवश्यक है ।
४. साम्यवादियों का ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’
पर्यावरणवादी, स्त्रीवादी, सामाजिक न्याय एवं सर्वसमावेशिता के लिए लडनेवाले इत्यादि साम्यवादियों के मुखौटे हैं । लिंग परिवर्तन (ट्रान्सजेंडरिजम्) की कल्पना साम्यवादियों द्वारा जानबूझकर खेली गई चाल है । वे छोटे बच्चों को बताते हैं, ‘लिंग परिवर्तन करने के लिए तुम्हें तुम्हारे अभिभावकों से अनुमति लेने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है ।’ इसका अर्थ यह है कि वे अभिभावकों को ‘शोषक’, जबकि बच्चों को ‘शोषित’ बनाते हैं । उन्हें प्रत्येक व्यक्ति के मानवीय संबंधों को ‘शोषक’ एवं ‘शोषित’, इनके मध्य बांटना है तथा उन सभी में एक नया संघर्ष उत्पन्न करना है । अभी तक साम्यवादियों ने इस प्रकार हमारा सर्वनाश करने का प्रयास किया है । आगे जाकर वे उससे भी भयावह प्रयास करनेवाले हैं; क्योंकि मैंने जो बताया, वह नया मार्क्सवाद हमारी संस्कृति पर किया गया आघात है । इसलिए उसे ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ कहा जाता है । वर्तमान काल में उसे ‘वोकिजम’ (प्रस्थापित परंपराओं के विरोध में आचरण करना) कहते हैं । यह हमारी संस्कृति के विरुद्ध छेडा गया बहुत बडा युद्ध है । सनातन वैदिक संस्कृति भारतीय सभ्यता का आधार है । विश्व की इजिप्शियन, मेसोपोटेनियम, मायन जैसी प्राचीन संस्कृतियां नष्ट हो गईं; परंतु हम आज तक टिके रहे, क्योंकि सनातन वैदिक संस्कृति अत्यंत शक्तिशाली है । ऐसा होने पर भी, साम्यवादी आनेवाले कुछ दशकों में उसे दीमक की भांति खोखला करनेवाले हैं । तब कदाचित हम भी टिक नहीं पाएंगे । ये लोग आकर्षक मुखौटा धारण कर काम कर रहे हैं । ये मुखौटे कौन-से हैं तथा उनका वास्तविक स्वरूप क्या है यह हम समझ लें, तभी इस लडाई में हम पूरी शक्ति के साथ उतर पाएंगे । अंततः भारतीय संस्कृति की ही विजय होनेवाली है तथा इसमें हम विजयी होंगे, इसका मुझे पूर्ण विश्वास है ।’
– श्री. अभिजीत जोग, प्रसिद्ध लेखक, पुणे.

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