मृतक के नाम पर अभियोग चलाकर मंदिर प्रशासन के विरुद्ध अचलपुर के तहसीलदार के द्वारा दिया गया आदेश न्यायालय ने किया निरस्त ।

  • ‘श्री दत्तात्रय संस्थान, नायगांव’की संपत्ति के संबंध में मिली कानूनी विजय ।

  • महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के प्रयासों को मिली सफलता ।

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ

अमरावती – अचलपुर तहसील के नायगांव के श्री दत्तात्रय संस्थान के स्वामित्ववाली भूमि मौजा नायगांव स्थित कृषिभूमि काश्तकारी अधिनियम कानून के अंतर्गत कुल के आधिकारिक स्वामित्व (कब्जेदार) को कानून के विरुद्ध (गैरकानूनी) रूप से बेच देने का अचलपुर तहसीलदार का आदेश उपमंडल अधिकारी, अचलपुर न्यायालय ने निरस्त किया । उपमंडल अधिकारी बलवंत अरखराव ने तहसीलदार के इस आदेश को निरस्त कर संस्थान के पक्ष में निर्णय दिया ।

१. नायगांव की यह कृषिभूमि ऐतिहासिक एवं धार्मिकदृष्टि से महत्त्वपूर्ण श्री दत्तात्रय संस्थान के स्वामित्ववाली है । उस पर प्रतिवादी शिवचरण नागोराव जावरकर एवं चक्रधर नागोराव जावरकर ने किसान (काश्तकारी) अधिकार का दावा करते हुए उसे खरीदने के लिए अचलपुर के तहसीलदार को आवेदन दिया था ।

२. ८ सितंबर १९६७ को तत्कालीन तहसीलदार ने ही कुल नागोराव चंद्रभान जावरकर का इस अनिवार्य खरीदारी का आवेदन निरस्त किया था । वरिष्ठ न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती न दिए जाने के कारण उनका काश्तकारी का अधिकार पहले ही समाप्त हो चुका था ।

३. अचलपुर के वर्तमान तहसीलदार ने इस गंभीर कानूनी त्रुटियों की अनदेखी करते हुए १३ अप्रैल २०२३ को आवेदकों के पक्ष में (नागोराव चंद्रभान जावरकर के बच्चे शिवचरण एवं चक्रधर के पक्ष में) खरीदारी करने का आदेश पारित किया ।

४. इसमें गंभीर बात यह थी कि मूल प्रकरण में अचलपुर के वर्तमान तहसीलदार ने संस्थान के मृतक न्यासी उत्तमराव पांडुजी जुनघरे को प्रतिवादी बनाकर उनके विरुद्ध अभियोग चलाया, तो कानून का सैद्धांतिक उल्लंघन था ।

५. पटवारी के सरकारी ब्योरे के अनुसार भूमि के ७/१२ विवरण में कहीं पर भी कब्जेदार का नाम ‘काश्तकार’ के रूप में पंजीकृत नहीं था ।

६. संस्थान के न्यासियों ने न्यायालय में मुंबई काश्तकारी एवं कृषिभूमि (विदर्भ प्रदेश) अधिनियम १९५८’के अनुच्छेद १०७ के अनुसार अपील प्रविष्ट किया । तहसीलदार के इस गैरकानूनी कृत्य के विरुद्ध महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राज्य पदाधिकारी श्री. अनूप जायसवाल ने प्रधानता ली । उन्होंने ंसंस्थान के न्यासियों से सहयोग कर उपमंडल अधिकारी से इसकी समीक्षा कर ज्ञापन प्रस्तुत कर दृढतापूर्वक संस्थान का पक्ष रखा ।

७. दोनों पक्ष के तर्कवाद एवं सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का, उदा. ए.ए. गोपालकृष्णन् विरुद्ध कोचीन देवस्वम् बोर्ड के आधार से उपमंडल अधिकारी बलवंत अरखराव ने यह निष्कर्ष रखा कि प्रतिवादी ‘किश्तकार’ न होते हुए भी तहसील द्वारा उनके पक्ष में दिया गया आदेश गैरकानूनी एवं निरस्त करने के लिए पात्र है । उस परिप्रेक्ष्य में ४ मई को मूल आदेश एवं १३ मई को संशोधन के सहित संशोधित आदेश देकर न्यायालय ने तहसीलदार का विवादित आदेश निरस्त किया ।

८. इस कानूनी प्रक्रिया में एवं निर्णायक विजय में मंदिर महासंघ के श्री. अनूप जायसवालसहित संस्थान के पंच/न्यासी सर्वश्री दीपक जावरकर, अविनाश जुनघरे, आशिष जावरकर, सुरेंद्र पवार एवं श्रीकांत जुनघरे ने दिनरात परिश्रम कर अपना योगदान दिया । देवस्थान की संपत्ति सुरक्षित रही; इसलिए अचलपुर परिसर में महाराष्ट्र मंदिर महासंघ एवं न्यासियों के कार्य की प्रशंसा की जा रही है ।