मैसुरू वाडियार राजघराना, यह दक्षिण भारत के इतिहास का एक अत्यंत प्रभावशाली एवं महत्त्वपूर्ण राजघराना माना जाता है । १४ वीं शताब्दी से २० वीं शताब्दी के प्रारंभ तक, कर्नाटक में इस राजघराने का दीर्घकाल तक आधिपत्य था । प्रारंभ में विजयनगर साम्राज्य में भागीदारी रखनेवाले ये राजा मुसलमान आक्रमणों से हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए आगे बढे । इस राजघराने ने कला, साहित्य, धर्म, राजनीति एवं व्यापार क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । प्रस्तुत है इस राजघराने की संक्षिप्त जानकारी !

विशेष लेख

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी मावले और सैनिकाें का त्याग सर्वोच्च है, ठीक वैसे ही आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ तथा राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘सैनिक’ के रूप मे कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्म-रक्षण के संघर्ष की जानकारी देने वाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस लेखमाला के द्वारा दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से अपने मन की चिंता दूर हो कर उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक
१. मैसुरू वाडियार राजघराने का इतिहास
मैसुरू वाडियार राजघराने की स्थापना १४ वीं शताब्दी में हुई । इ.स. १३९९ में देवराज वाडियार ने कर्नाटक के मैसुरू प्रदेश में विजयनगर साम्राज्य की सहायता से उन्होंने मैसुरू भाग में अपना प्रभुत्व प्रस्थापित किया । उस काल में यह राजघराना विजयनगर के साम्राज्य में एक प्रमुख भागीदार था ।

१५ वीं शताब्दी के प्रारंभ में बीजापुर के आदिलशाही साम्राज्य के आक्रमणों के कारण मैसुरू राजघराना दुर्बल हो गया । तब भी श्री. कृष्णराज वाडियार ने पुन: साम्राज्य की पुनर्स्थापना की और मैसुरू को एक प्रभावी राजकीय शक्ति बनाया ।

२. कृष्णराज वाडियार तृतीय : धार्मिक एवं संस्कृति को बढावा देनेवाले
श्री. कृष्णराज वाडियार तृतीय (वर्ष १७९४ से १८६८) मैसुरू के इतिहास के एक महान शासक थे । उन्होंने अपने कार्यकाल में जनता के हित के लिए अनेक सुधार किए । उन्होंने कला, साहित्य, धर्म एवं शिक्षा के प्रसार के लिए महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किए । मैसुरू की शास्त्रीय संगीत परंपरा, चित्रकला एवं धार्मिक परंपराओं ने कृष्णराज वाडियार के काल में विशेष प्रगति की ।
इ.स. १८०० में उन्होंने एक सांस्कृतिक संस्था स्थापित कर संगीत, नृत्य एवं चित्रकला का संवर्धन किया ।
३. मैसुरू राजघराने का दशहरा उत्सव : शक्ति एवं वैभव का प्रतीक
मैसुरू राजघराने का दशहरा उत्सव, भारत का एक अत्यंत भव्य एवं प्रभावशाली उत्सव है । प्रतिवर्ष वह मैसुरू के राजमहल में पारंपरिक पद्धति से मनाया जाता है । यह उत्सव राजघराने की गौरवशाली परंपरा, शक्ति एवं धार्मिकता का प्रतीक माना जाता है ।
४. मैसुरू राजमहल : राजसत्ता का वैभव !
मैसुरू के प्रसिद्ध राजमहल को ‘अंबा विलास पैलेस’ भी कहते हैं । यह राजमहल, राजघराने का सौंदर्यशास्त्र एवं स्थापत्यकला का उत्कृष्ट नमूना है । १४ वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में निर्माण किया गया यह राजमहल समय बीतने के साथ-साथ एक महत्त्वपूर्ण राजकीय एवं सांस्कृतिक केंद्र बन गया ।
५. सत्ता एवं राजकीय इतिहास
मैसुरू राज्य बीजापुर, हैदराबाद (भाग्यनगर) एवं महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में सत्ता संघर्ष में अनेक बार फंस गया । १८ वीं शताब्दी के पश्चात हैदर अली एवं टीपू सुलतान के काल में मैसुरू राजघराने ने अनेक युद्ध लडकर अपने प्रदेश की स्थिति सुदृढ की ।

६. कला, संस्कृति एवं धार्मिक क्षेत्रों में राजघराने का योगदान
मैसुरू राजघराने ने अपने सत्ताकाल में अनेक प्रसिद्ध कलाकार, लेखक, संगीतविशेषज्ञ एवं चित्रकारों को आश्रय दिया । उन्होंने धर्म, साहित्य, शास्त्रीय संगीत एवं चित्रकला को प्रोत्साहन देने के लिए विविध विकास उपक्रम शुरू किए ।
सांसद यदुवीर कृष्ण दत्त चामराज वाडीयार के विषय में ..

नवंबर १९९२ में जन्मे श्री. यदुवीर कृष्ण दत्त चामराज वाडीयार, वर्तमान में इस राजघराने के महाराज हैं । वे अब इस परंपरा को आगे बढा रहे हैं । श्री. यदुवीर कृष्ण दत्त चामराज वाडियार की प्राथमिक से पदवीतक की शिक्षा बेंगळुरू में हुई । उनकी प्राथमिक शिक्षा विद्या सागर में तथा बेंगळुरू में विद्या निकेतन स्कूल में १० वीं तक शिक्षा हुई । आगे उन्होंने बेंगळुरू में कैनेडियन इंटरनैशनल स्कूल में ‘आइबी डिप्लोमा प्रोग्राम किया और १२ वीं तक की शिक्षा पूर्ण की । तदुपरांत उन्होंने अमेरिका के महर्स्ट में मैसैच्युसेट्स विद्यापीठ में प्रवेश लिया और वर्ष २०१५ में पदवी प्राप्त की । यदुवीर वाडियार ने अर्थशास्त्र एवं अंग्रेजी विषय में कला शाखा की पदवी प्राप्त की । मैसुरू को भारत के ‘सबसे स्वच्छ शहर’ के रूप में मान्यता मिली । यह मान्यता मिलने पर २ वर्षाें की अवधि के लिए श्री. यदुवीर वाडियार ने मैसुरू में ‘स्वच्छ भारत अभियान के राजदूत’ के रूप में कार्य किया ।
श्री. यदुवीर को वेद एवं कन्नड संगीत का अच्छा ज्ञान है । उन्हें घुडसवारी और ‘पोलो’ खेल में भी रुचि है । वर्तमान में वे भाजप के सांसद हैं ।
सांसद यदुवीर कृष्ण दत्त चामराज वाडीयार की धर्मविरोधकों को चेतावनी
धर्म का जो भी विरोध करेगा, उसे सहन नहीं किया जाएगा !
वर्तमान में हिन्दुत्व के विषय में गलत प्रचार बढ गया है । हिन्दुत्व सभी को समझ लेना चाहिए । हमारा विरोध करेंगे, तो उसे हम भले ही सहन कर लें; परंतु यदि हमारे धर्म का किसी ने विरोध किया, तो हम उसे सहन नहीं करेंगे । किसानों की भूमि वक्फ बोर्ड हडप रहा है । उसके विरोध में हम लडेंगे ।
२० वीं शताब्दी में जयचामराजेंद्र वाडियार (वर्ष १९१९ से १९७४) एक प्रभावी राजनेता एवं समाजसेवक के रूप में पहचाने जाते थे । राज्यपाल पद पर आरूढ होने के पश्चात उन्होंने मैसुरू की सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा की तथा उन्हें नवचैतन्य दिया । मैसुरू राजघराने ने दक्षिण भारत के राजकीय, धार्मिक, कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इस परंपरा का प्रभाव आज की पीढी को सांस्कृतिक मूल्य, ऐतिहासिक परंपराओं एवं राजकीय दायित्व को कैसे निभाना चाहिए, इनकी सीख देता है ।
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