Passive Euthanasia : निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर निर्णय लेने के लिए महाराष्ट्र में समितियों का गठन होगा ।

मुंबई, १७ जुलाई (वार्ता) – पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र सहित भारत में भी ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ के लिए आवेदन करने वालों की संख्या में बडी वृद्धि हुई है । इस विषय में निर्णय लेने के लिए महाराष्ट्र के सभी शासकीय अस्पतालों में समितियों के गठन का महत्त्वपूर्ण निर्णय महाराष्ट्र सरकार ने लिया है । हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देते समय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी घटनाओं में निर्णय लेने हेतु समितियों के गठन का निर्देश दिया था । इन्हीं निर्देशों के अनुसार महाराष्ट्र सरकार ने यह कार्यवाही की है ।

शासकीय अस्पतालों में अतिरिक्त जिला शल्य चिकित्सक की अध्यक्षता में प्राथमिक चिकित्सा समिति तथा जिला शल्य चिकित्सक की अध्यक्षता में द्वितीय चिकित्सा समिति गठित की जाएगी । निजी अस्पतालों में भी संबंधित अस्पताल के प्रशासक तथा निदेशक की अध्यक्षता में इसी प्रकार की समितियों के गठन के निर्देश राज्य सरकार ने दिए हैं । सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग द्वारा १७ जुलाई को इस संबंध में शासनादेश जारी किया गया है ।

‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ क्या है ?

जब कोई व्यक्ति असाध्य तथा गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाता है, तब वह अनेक बार अचेत अवस्था में रहता है । ऐसी गंभीर रोगावस्था में उस व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता नहीं रहती । भविष्य में यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो, तो मरणासन्न पीडा सहने की अपेक्षा निष्क्रिय अवस्था में मृत्यु प्राप्त हो, इसके लिए व्यक्ति स्वस्थ अवस्था में रहते हुए प्रशासन के पास निष्क्रिय इच्छा मृत्यु हेतु आवेदन करता है । निष्क्रिय इच्छा मृत्यु प्रदान करने के लिए रोग ग्रस्त व्यक्ति को दिया जा रहा कृत्रिम श्वसन तथा अन्य जीवन-रक्षक उपचार बंद कर दिए जाते हैं तथा उसे मृत्यु की ओर जाने दिया जाता है ।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु के विषय में अध्यात्मशास्त्र क्या कहता है ?

अध्यात्मशास्त्र के अनुसार जब शरीर ‘जीर्ण’ हो जाता है (जिसके माध्यम से कोई भी कर्म या साधना करना संभव नहीं रहता), तभी मृत्यु की प्रक्रिया स्वाभाविक मानी जाती है । विज्ञान के अनुसार हृदय का धडकना ही जीवन है, किंतु अध्यात्मशास्त्र के अनुसार चेतना का अस्तित्व अधिक महत्त्वपूर्ण है । जब कोई रोगी कोमा में होता है तथा केवल यंत्रों के सहारे जीवित रहता है, तब धर्मशास्त्र के अनुसार ‘प्राण’ मानो अटक-से जाते हैं । आधुनिक चिकित्सीय उपकरण (वेंटिलेटर) कभी-कभी प्रकृति की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हैं, जिससे जिस जीव की यात्रा समाप्त होनी चाहिए, वह कृत्रिम रूप से लंबी हो जाती है । ऐसे समय कृत्रिम जीवन-रक्षक सहायता हटाना ‘हिंसा’ नहीं, अपितु देहप्रारब्ध के अनुसार ‘मुक्ति’ प्रदान करने का कार्य है ।

हरीश राणा प्रकरण क्या है ?

पंजाब के युवक हरीश राणा वर्ष २०१३ में चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट आई । तब से वे अचेत अवस्था में थे, किंतु जीवित थे । चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि उनकी स्थिति में किसी भी प्रकार का सुधार संभव नहीं था। हरीश राणा की मृतवत अचेत अवस्था को देखते हुए उनके परिजनों ने उन्हें ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ की अनुमति दिलाने के लिए वर्ष २०२४ में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की, किंतु न्यायालय ने उनकी याचिका निरस्त कर दी । इसके बाद वर्ष २०२४ में उनके परिजनों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । ११ मार्च २०२६ को सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा को ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ की अनुमति प्रदान की । २४ मार्च २०२६ को दिल्ली स्थित ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ (एम्स) में हरीश राणा का निधन हो गया ।

हरीश राणा के निष्क्रिय इच्छामृत्यु की घटना पर न्यायालय में निर्णय आने में कई वर्ष लग गए । भविष्य में यदि इस प्रकार का कोई अन्य मामला सामने आए, तो उस पर निर्णय लेने के लिए एक निश्चित कार्यप्रणाली बनाई जाए, ऐसा निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा प्रकरण में दिया था । उसी के अनुसार महाराष्ट्र में इस प्रकार की चिकित्सा समितियों का गठन किया जाएगा ।