हरिद्वार (उत्तराखंड) के योगऋषि रामदेवबाबा ‘योगगुरु’ के रूप में भारत के साथ ही पूरे विश्व के लिए एक चिर-परिचित नाम हैं । वे उत्तराखंड स्थित ‘पतंजलि योगपीठ’ एवं ‘पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड’ के सहसंस्थापक हैं । वे भारत के एक विख्यात एवं जिज्ञासु व्यक्ति हैं तथा भारत की राजनीति एवं आध्यात्मिकता के केंद्र में हैं । उन्होंने देश-विदेश में अनेक योग शिविरों का आयोजन किया साथ ही विविध दूर चित्र वाहिनियों पर उनके योगसत्र प्रसारित होते रहते हैं । इस कारण पूरे विश्व में योग एवं आयुर्वेद पहुंचाने में सहायता मिली । स्वामीजी ने वर्ष २०१० में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान आरंभ किया । उन्होंने ‘योग साधना एवं योग चिकित्सा रहस्य’ साथ ही ‘प्राणायम रहस्य’ नामक दो लोकप्रिय हिन्दी पुस्तकें लिखी हैं । उसमें उन्होंने योग का महत्त्व स्पष्ट किया है । उन्होंने लोगों को सनातन धर्म एवं संस्कृति से जुडने हेतु प्रेरणा दी है । उन्हें ‘कलिंग इन्स्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नॉलॉजी, भुवनेश्वर’ द्वारा मानद ‘डॉक्टरेट’ (डी.लिट) पदवी प्राप्त हुई है । वर्ष २०१७ में ‘इंडिया टुडे’ द्वारा उन्हें ५० ‘सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों’ की सूची में समावेश किया गया । तदनंतर अप्रैल २०२२ में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने भी १०० में से ७८वें ‘सबसे शक्तिशाली भारतीय’ के रूप में उन्हें गौरवान्वित किया था ।
विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज हेतु उनके सैनिकों ने किया हुआ त्याग सर्वोच्च है, उस प्रकार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा हेतु ‘वीर योद्धा’ के रूप में कार्यरत हैं । उनकी तथा हिन्दू धर्मरक्षा के उनके संघर्ष की जानकारी करानेवाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’, इस स्तंभ से अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर उत्साह उत्पन्न होगा !
– संपादक
१. ज्ञानार्जन एवं कठोर तपस्या
योगऋषि रामदेवबाबा का मूल नाम राम किशोर यादव है । उनका जन्म २५ दिसंबर १९६५ को हरियाणा के महेंद्रगढ जिले के अलीपुर में हुआ था । आरंभिक शिक्षा गांव के सरकारी विद्यालय में हुई । १४ वर्ष की आयु में उन्हें कलवा (जिंद, हरियाणा) स्थित गुरुकुल में प्रवेश मिला । वहां उन्होंने संस्कृत एवं योग का अध्ययन किया । आचार्य श्री. बलदेवजी के मार्गदर्शन में उन्होंने संस्कृत व्याकरण, योग, दर्शन, वेद एवं उपनिषदों में विशेष ज्ञान की ‘स्नातकोत्तर (आचार्य)’ पदवी प्राप्त की । महर्षि दयानंदजी के लेखन एवं जीवन से प्रेरित होकर उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ एवं ‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका’, इन दो ग्रंथों का गहन अध्ययन किया । बचपन से ही उन्होंने स्वयं को ब्रह्मचर्य एवं तपस्वी जीवन यापन करने हेतु समर्पित कर दिया था । इस कारण गुरुकुल में ‘योग’, पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ एवं पतंजली के ‘महाभाष्य’ सीखने के उपरांत वे हिमालय स्थित गंगोत्री गुफाओं की यात्रा को चल पडे । उन्होंने गहन ध्यान एवं कठोर तपस्या द्वारा अपना ध्येय निश्चित किया । वर्ष १९९२ में हरिद्वार स्थित कृपालु बाग आश्रम में योग की शिक्षा ली एवं संन्यास लेकर ‘रामदेव’ नाम धारण किया ।
योगऋषि रामदेवबाबा ने सनातन संस्था के गोवा स्थित आश्रम का अवलोकन किया एवं उनके द्वारा व्यक्त गौरवोद्गार !
योगऋषि रामदेवबाबा ने सितंबर २०१८ में रामनाथी, गोवा स्थित सनातन संस्था के आश्रम का अवलोकन किया । इस समय योगऋषि रामदेवबाबा की सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी से भेंट हुई थी ।

सनातन संस्था के कार्य के संदर्भ में गौरवोद्गार व्यक्त करते हुए योगऋषि रामदेवबाबा ने कहा, ‘‘सनातन संस्था बहुत ही प्रामाणिकता एवं नि:स्वार्थ वृत्ति से हिन्दू राष्ट्र स्थापना का कार्य कर रही है । इस कार्य को भले ही थोडा अधिक समय लग जाए, तब भी वह निश्चित रूप से होगा ही । अल्प अहंकार वाला व्यक्ति ही यह कार्य कर सकता है । कुल मिलाकर भागवद्धर्म को मूर्तरूप देने का कार्य ‘सनातन संस्था’ कर रही है ।’’
२. देश-विदेश में योग एवं आयुर्वेद का प्रसार
योग एवं भारतीय आयुर्वेद की औषधियों द्वारा देश को निरोगी, समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाया जा सकता है, यह ध्यान में लेकर उन्होंने पूरे विश्व में योग एवं आयुर्वेद का प्रसार करना, तथा भारत के सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाने का निश्चय किया । उचित समय रहते आचार्य बाळकृष्णजी से उनकी भेंट हुई ।

स्वामीजी ने ‘पतंजली’ योग का रहस्य सामने लाया एवं उसे लोकप्रिय बनाने का दायित्व स्वयं पर लिया, जबकि आचार्य बालकृष्णजी ने आयुर्वेद की औषधि-पद्धतियों के प्रभाव अंतर्गत लोगों का विश्वास पुनर्संचयित करने के कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया । देश-विदेश के लोग योग एवं आयुर्वेद को अपने जीवन यापन के रूप में अपनाएं, इस हेतु उन्होंने वर्ष १९९५ में कनखल, हरिद्वार, उत्तराखंड में ‘दिव्य योग मंदिर (ट्रस्ट)’ की स्थापना की । तदनंतर ‘ब्रह्मकल्प चिकित्सालय’, ‘दिव्य फार्मसी’, ‘दिव्य प्रकाशन’, ‘दिव्य योग साधना’, ‘पतंजलि योगपीठ’, ‘भारत स्वाभिमान (ट्रस्ट)’, आदि के माध्यम से उन्होंने अपना कार्य आगे बढाया ।
हिन्दू राष्ट्र के प्रति योगऋषि रामदेवबाबाजी के विचार !

‘भारत हिन्दू राष्ट्र हो’, योगऋषि रामदेवबाबाजी को ऐसा लगता है । उनके अनुसार ‘भारत सनातन धर्म की संस्कृति एवं मूल्यों पर आधारित राष्ट्र बने । राष्ट्र निर्मिति हेतु प्रथम हिन्दू संस्कृति एवं मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहिए । हिन्दू राष्ट्र केवल एक धार्मिक राष्ट्र होने की अपेक्षा जिसे अपनी संस्कृति, परंपराएं एवं मूल्यों का अभिमान हो, ऐसा राष्ट्र बने ! भारत को एक बलशाली एवं विकसित राष्ट्र बनाने के लिए हमें उसे अपनी जडों से जोडकर हमारी संस्कृति संजोनी चाहिए । हमारा भारत एक ऐसा राष्ट्र बने, जो संपूर्ण विश्व के लिए एक उदाहरण हो ! योगऋषि रामदेवबाबा अपने सार्वजनिक भाषणों में अनेक बार हिन्दू राष्ट्र का उल्लेख करते हैं ।
३. ‘भारत स्वाभिमान अभियान’ के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई
योगऋषि रामदेवबाबाजी को व्यसनमुक्त, शाकाहारी एवं भ्रष्टाचारमुक्त भारत अपेक्षित है । भारत में पनप रहे भ्रष्टाचार का निर्मूलन कर जनता के लिए अच्छे एवं प्रामाणिक समाज का निर्माण करना उनका ध्येय है । इस हेतु उन्होंने ‘भारत स्वाभिमान अभियान’ आरंभ किया है । उसमें अग्रसर होकर लोगों से उन्होंने देश एवं लोकतंत्र को बलशाली बनाने का आवाहन किया है । उन्होंने वर्ष २०११ में विदेश में छुपाए काले धन के विरुद्ध अभियान आरंभ किया, साथ ही भ्रष्टाचार एवं काले धन के विरुद्ध देहली में सत्याग्रह आंदोलन भी किया, जिसे तब की कांग्रेस सरकार ने दबाने का प्रयास किया । इस आंदोलन में उन्होंने ‘काला धन विदेशी बैंकों में संग्रहित करनेवालों को राजद्रोही के रूप में उजागर करने तथा उसे राष्ट्रीय अपराध कहे जाने की मांग की । इस भ्रष्टाचार के अपराध में दोषी पाए गए लोगों को फांसी अथवा आजन्म कारावास का दंड देने की मांग के साथ ही अन्य मांगें भी की गई थीं ।
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स्वामी रामदेव : युद्ध काल में देशवासियों का कर्तव्य !
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४. भारतीय सैनिकों को योग का प्रशिक्षण
‘देश स्वस्थ रहे, इस हेतु सैनिकों को भी योग सिखाना चाहिए’, योगऋषि रामदेवबाबाजी को ऐसा लगता है । इसे ध्यान में लेकर उन्होंने जैसलमेर में सैनिकों को योग सिखाना आरंभ किया । साथ ही देहली में सैनिक एवं उनके परिजनों के लिए भी योग शिविरों का आयोजन किया ।
योगऋषि रामदेवबाबाजी को प्राप्त कुछ सम्मान !

अ. वर्ष २००६ में संयुक्त राष्ट्र परिषद में निर्धनता निर्मूलन पर व्याख्यान देने हेतु योगऋषि रामदेवबाबाजी को आमंत्रित किया गया था ।
आ. वर्ष २००९ में राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति ने उन्हें ‘महामहोपाध्याय’ पदवी से सम्मानित किया ।
इ. वर्ष २०११ में महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल के. शंकरनारायणन् के करकमलों द्वारा उन्हें ‘श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पुरस्कार’, से सम्मानित किया गया ।
ई. वर्ष २०१२ में कर्णावती (गुजरात) में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों द्वारा राष्ट्रीय आयकॉन श्रेणी का ‘युवा क्रांति पुरस्कार’ प्रदान किया गया ।
फ्रांस सरकार को अब ‘शून्य सहनशीलता’ (Zero Tolerance) की नीति अपनानी चाहिए !
Ladki Bahin Yojana : ५ लाख सरकारी कर्मचारी ‘मुख्यमन्त्री माझी लाडकी बहीण’ योजना का अपलाभ ले रहे होने का प्रकरण उजागर !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी