स्वदेशी उत्पादों की निर्मिति, देव-देश-धर्म को श्रेष्ठ मानकर धर्मकार्य हेतु कार्यरत ठाणे के समर्पित उद्योगपति डॉ. रवींद्र प्रभुदेसाई !

ठाणे के ‘पितांबरी उद्योग समूह’ के सबकुछ डॉ. रवींद्र प्रभुदेसाई की उद्योगपति के रूप में सामाजिक प्रतिबद्धता सर्वविदित है; परंतु ‘देव, देश एवं धर्म’ त्रिसूत्रों पर निष्ठा रखकर हिन्दुत्व संजोनेवाले, धर्मरक्षा हेतु तत्पर एवं राष्ट्रसेवा को ही सर्वोच्च माननेवाले वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सच्चे स्वयंसेवक साथ ही कट्टर राष्ट्रभक्त भी हैं । बचपन से ही उन्हें संघ विचारों का विचारधन प्राप्त हुआ । उनके नेतृत्व में ‘पितांबरी’ उद्योग व्यावसायिकता के साथ ही सत्शीलता, संस्कृति एवं राष्ट्रीय मूल्यों की श्रेष्ठता संजो रहा है । ‘व्यवसाय’ एवं ‘राष्ट्रसेवा’ क्षेत्रों में संतुलन बनाए रखनेवाले डॉ. प्रभुदेसाई का कार्य, अर्थात नवभारत निर्मिति में सहयोग देनेवाले आदर्श राष्ट्रभक्त की प्रेरणादायी कथा है । इस तेजस्वी व्यक्तित्व का राष्ट्रप्रेम उजागर करनेवाला यह लेख !

डॉ. रवींद्र प्रभुदेसाई

विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज हेतु उनके सैनिकों ने किया हुआ त्याग सर्वोच्च है, उस प्रकार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा हेतु ‘वीर योद्धा’ के रूप में कार्यरत हैं । उनकी तथा हिन्दू धर्मरक्षा के उनके संघर्ष की जानकारी करानेवाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’, इस स्तंभ से अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर उत्साह उत्पन्न होगा !

– संपादक

१. धर्मप्रसार एवं राष्ट्रकार्य में कार्यरत रहे सभी लोगों को सर्व दृष्टि से सहायता करना, यही सच्चा धर्मकार्य !

रवींद्रजी के पिताजी (स्व.) वामनराव प्रभुदेसाई संघ के कट्टर कार्यकर्ता थे । इस कारण संघ शाखा रवींद्रजी के बचपन से ही आयुष्य का अविभाज्य अंग बन गया था ।  संघ की शाखा, अर्थात व्यक्तित्व घडाने की कार्यशाला ! इस कारण शाखा में जाना यदि न हुआ, तो नीचे झुककर खडा रहना अथवा भूखे रहना, ऐसा दंड उनके पिताजी उन्हें देते थे । बचपन से ही हुए संघ संस्कारों के कारण अनुशासन का पालन करना, राष्ट्रकार्य को प्रधानता देना, यह उनका स्थायीभाव बन गया । रवींद्रजी पूर्व में शाखा में बिगुल बजाते थे । आज सचमुच इस बिगुल का विजयी नाद ‘पितांबरी’ उद्योगसमूह  के माध्यम से वैश्विक स्तर पर गूंज रहा है । ‘पितांबरी’ का उद्योग सत्शीलता की ओर झुक गया एवं सफल हुआ । स्वयं का उद्योग सम्हालते हुए उन्होंने संघ का कार्य निरंतर जारी रखा है । वर्तमान में ‘हिन्दुत्व’ एवं ‘राष्ट्रवाद’ ऐसे विषय अग्रसर हो रहे हों, तब अनेक उद्यमी ऐसे संवेदनशील सूत्रों से स्वयं को दूर रखना ही पसंद करते हैं, अर्थात वह उनकी व्यावसायिक आवश्यकता भी नहीं होती; परंतु रवींद्र प्रभुदेसाई हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता सूत्रों की ओर गौर से देखते हैं । उनको उचित लगनेवाली भूमिका वे निष्ठापूर्वक प्रस्तुत करते हैं । ‘हिन्दुत्व’ संघ के विचारों की नींव है एवं हिन्दुत्व के लिए  सबकुछ करने की तैयारी भी उनकी रहती हैं । इसके लिए यथा संभव आर्थिक समर्थन  एवं उसके साथ ही वैचारिक समर्थन वे हमेशा देते रहते हैं ।

अ. इसी के उदाहरण के अंतर्गत बाबरी ढांचा गिराने के लिए ठाणे से साथ ही ‘पितांबरी’ के कर्मचारियों को कारसेवकों को उन्होंने समर्थन, प्रोत्साहन एवं सभी दृष्टि से सहायता की थी । अयोध्या का श्रीराममंदिर निर्माण करने हेतु भी उन्होंने पर्याप्त से अधिक अर्पण दिया था ।

आ. स्वातंत्र्यवीर सावरकर के विचार अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए श्री. सुधीर फडके का ‘वीर सावरकर’ चलचित्र बजरंग दल के सभी स्वयंसेवकों को निःशुल्क दिखाने हेतु उन्होंने ठाणे स्थित ‘आराधना’ चलचित्र गृह (थिएटर) आरक्षित किया था । उस समय में ठाणे में अनेक बार सामाजिक एवं धार्मिक कारणों से बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को बंदी बनाया गया था । अनेक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध झूठे पुलिस परिवाद  कर उनका जीवन नष्ट करने का प्रयास किया गया था । उस समय जामिन (प्रतिभू) हेतु नकद राशि देकर कार्यकर्ताओं को तुरंत छुडाने के लिए वे अग्रसर थे । रवींद्रजी कार्यकर्ताओं का समर्थन दृढता से करेंगे, यह निश्चित था, इस कारण ठाणा के बजरंग दल का कार्यकर्ता सामाजिक-धार्मिक समस्याओं का प्रतिकार दृढता से कर सकता है, साथ ही अनेक कार्यकर्ताओं को उन्होंने ‘पितांबरी’ उद्योगसमूह में नौकरी भी दीं ।

श्री. रणजीत सावरकर एवं सौ. मंजिरी मराठे द्वारा ‘ओम् प्रमाणपत्र’ का स्वीकार करते हुए श्री. रवींद्र प्रभुदेसाई

इ. छत्रपति संघ शाखा के स्वयंसेवक, विश्व हिन्दू परिषद के कोकण प्रांत के उपाध्यक्ष, ‘संस्कार भारती’ के ठाणे शहर के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं संरक्षक इस प्रकार विविध पदों पर रहकर उन्होंने उत्तरदायित्व बखूबी से निभाया है । उसी प्रकार सनातन संस्था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, संस्कार भारती, अखिल भारतीय साहित्य परिषद जैसी अनेक संस्थाओं से वे जुड गए हैं ।

ई. धर्मप्रसार एवं राष्ट्रकार्य में सक्रिय संस्थाओं को ‘सत्पात्र दान’ कर वे कार्य हेतु आर्थिक एवं वैचारिक समर्थन देने हेतु सदैव तत्पर रहते हैं । कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने  विश्व हिन्दू परिषद के नए कार्यालय का निर्माण, रक्तपीढियां, हिन्दू जनजागृति समिति, ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के अनुसंधान केंद्र की स्थापना हेतु, साथ ही सनातन संस्था के शंखनाद कार्यक्रम हेतु उन्होंने अर्पण दिया है । महाराष्ट्र के विविध देवालयों के जीर्णोद्धार हेतु सहायता करना, साथ ही ताम्हाणे-साखळोली में सनातन संस्था के माध्यम द्वारा सत्संग का आयोजन, इस प्रकार विविध आध्यात्मिक एवं धार्मिक उपक्रमों को वे प्रोत्साहन देतें हैं । इसके अतिरिक्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ संकल्पना का अंगीकार कर ‘यह  विश्व ही मेरा घर’, ऐसा व्यापक दृष्टिकोण रखकर महानगर को गौरवान्वित करने में  कार्यरत संस्थाएं एवं संगठनों को उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार गतिशील करने हेतु प्रयास किए हैं । इसके अंतर्गत भारतीय त्योहार, परंपरा, उत्सव पर आधारित कार्यक्रम नाट्य, नृत्य, गायन, कथाकथन, रंगोली, नववर्ष स्वागतयात्रा, गुढीपाडवा (नववर्ष संवत्सरारंभ), गोकुलाष्टमी, दिवाली, साथ ही विज्ञाननिष्ठ, ऐतिहासिक एवं पर्यावरण आधारित उपक्रमों में वे अनेक वर्षों से आर्थिक समर्थन दे रहे हैं तथा स्वयं भी उसमें सहभागी होते हैं ।

उ. ‘राष्ट्र औद्योगिक स्तर पर प्रगति करे एवं नए उद्यमी अग्रसर हों, नौकरी मांगनेवालों की अपेक्षा, देनेवाले हों’, उनकी यह तडप सदैव देखने को मिलती है । इसीलिए ‘सैटर्डे क्लब’, ‘उद्योग अनुभव प्रतिष्ठान’, ‘कर्‍हाडे ब्राह्मण बिजनेस फोरम’, ‘लघुउद्योग भारती’ नामक संस्थाओं से वे सक्रियता से जुड गए हैं । आज अनेक ब्राह्मण युवक पौरोहित्य, खेती, नौकरी छोडकर उद्योजकता की ओर मुड रहे हैं, इसके पीछे प्रेरणा के रूप में भी रवींद्रजी का नाम लिया जा रहा हैं ।

अपनी राष्ट्रकार्य की भावना स्पष्ट करते हुए रवींद्रजी कहते हैं, ‘देव, देश एवं धर्म से अधिक श्रेष्ठ कुछ भी नहीं । इस कारण जो संस्थाएं अथवा कंपनियां धर्मप्रसार एवं राष्ट्रकार्य करने में कार्यरत होती हैं, उन्हें सभी दृष्टि से सहायता करना, यही सच्चा  धर्मकार्य है, ऐसी मेरी ठोस धारणा हैं ।’’

२. पितांबरी की यात्रा : स्वदेशी से आत्मनिर्भरता की ओर !

छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘स्वदेश’, ‘स्वभाषा’ एवं ‘स्वराज्य’ इन ३ स्तंभों पर ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की स्थापना की । इसी विचारों के आधार पर डॉ. रवींद्र प्रभुदेसाई ने  ‘पितांबरी ब्रैंड’ पूर्णतः स्वदेशी रखने का संकल्प किया है । ‘पितांबरी’ के सभी उत्पाद भारतीय ज्ञान, भारतीय लोगों का सहभाग एवं भारतीयों के लिए ही तैयार किए जाते हैं । ‘पितांबरी’ ने अपनी स्थापना से ही स्वदेशी की आत्मीयता संजोई हैं । उसके लिए निरंतर प्रयास किए हैं । इसका उत्तम उदाहरण, अर्थात पुष्पों के नैसर्गिक अर्क से तैयार की गई ‘देवभक्ति अगरबत्ती’ । इस अगरबत्ती हेतु आवश्यक बांस की सली विएतनाम एवं चीन से आयत करनी पडती थी । इस कारण निर्मिति का मूल्य बढ रहा था । इसके अतिरिक्त यह संपूर्ण प्रक्रिया बहुत समय ले रही थी । इस पर उपाय ढूंढते समय  ‘ईशान्य भारत बांस घास श्रेणी में वन एवं खेती उत्पादों हेतु महत्त्वपूर्ण है’, यह जानकारी मिलते ही डॉ. प्रभुदेसाई ने आरंभ में गुवाहाटी के निकट भूमि क्रय कर वहां बांस की खेती एवं उससे ‘देवभक्ति अगरबत्ती’ का उत्पाद भी आरंभ किया । इस कारण  आयत करनेपर व्यय होनेवाला धन देश में ही रहा । अभीतक रत्नागिरी जिले के राजापुर तालुक के ताम्हाणे, तळवडे, साथ ही दापोली तालुक के साखळोली में बडी मात्रा में बांस की खेती उन्होंने की है । अगरबत्ती के लिए आवश्यक यंत्रसामग्री भी पूर्णतः स्वदेशी है । इस प्रकार सुगंध की निर्मिति को लेकर तैयार अगरबत्ती तक ‘पितांबरी’ प्रतिष्ठान संपूर्णतः ‘आत्मनिर्भर’ बन गया है । इस अगरबत्ती उद्योग के माध्यम से  १०० से अधिक परिवारों को रोजगार भी उपलब्ध हुआ है ।

🔴पितांबरीची Success Story🔴Ravindra Prabhudesai🔴Pitambari Success Story🔴Pitambari

(सौजन्य : UNTOLD STORIES) 

३. ग्राहक स्वतंत्रता हेतु दृढ कदम उठाना – ‘ओम्’ प्रमाणित उत्पादों का निर्धार !

राष्ट्र-निर्मिति हेतु कार्य में रवींद्रजी द्वारा उठाया गया दूसरा महत्त्वपूर्ण कदम है  ‘ओम्’ प्रमाणपत्र अपनाना ! खाद्य पदार्थों से लेकर वस्त्र, औषधियां, सौंदर्यप्रसाधन आदि सभी उत्पादों के लिए व्यावसायिकों को ‘हलाल’ प्रमाणपत्र (इस्लामनुसार जो वैध वह) लेना पडता है । हलाल प्रमाणित ये उत्पाद विवश होकर हिन्दुओं को भी लेने पडते हैं । इस हलाल थोपेजाने का विरोध कर रवींद्रजी ने कुछ दिन पूर्व ही स्वतंत्रतावीर सावरकर स्मारक, दादर में स्वातंत्र्यवीर सावरकर के महान पोते (पोते के बेटे) श्री. रणजीत सावरकर के समक्ष ‘ओम् प्रमाणपत्र’ का स्वीकार कर ‘पितांबरी’ के उत्पाद ‘ओम् प्रमाणित’ करने हेतु साक्ष दी । हलाल थोपना यह भारतीय संविधान द्वारा दी गई धर्मस्वतंत्रता एवं हिन्दू ग्राहक अधिकार के विरुद्ध है । यह थोपे गए प्रमाणपत्र की अनदेखी कर इससे आगे ‘पितांबरी’ ‘ओम् प्रमाणित’ उत्पादों के माध्यम से ‘हिन्दुओं से लेकर हिन्दुओं तक’ यह नीति यशस्वी पद्धति से कार्यान्वित करेगी । ग्राहकहित संजोए रखने में अग्रसर होने के कारण रवींद्रजी ने ‘ग्राहक देवो भव:’ यह स्वयं की एवं ‘पितांबरी’ की विचारधारा को पुनः एकबार कृति में लाया है ।

आध्यात्मिक साधना द्वारा हिन्दू संस्कृति की कोख से उत्पन्न कार्यसंस्कृति !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

उद्योग से प्राप्त धन का उपयोग राष्ट्ररक्षा, धर्मजागृति एवं सांस्कृतिक कार्य हेतु  करना, साथ ही समाज की संस्थाओं को प्रचुर मात्रा में सहायता करना, ये सद्गुण उनमें वृद्धिंगत हुए, इसका श्रेय रवींद्रजी आध्यात्मिक साधना को देते हैं । तन, मन, धन अर्पित कर साधना एवं ‘जो कुछ मेरा है, वह सभी ईश्वर का ही है’, यह भाव मन में रखकर अर्पण करने की वृत्ति उन्होंने संजोई है । 

‘भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनें’, एवं अधिकाधिक लोगों द्वारा यदि ‘हिन्दू’ शब्द के अनुसार जीवनशैली का स्वीकार हो, तो समाज में सुख, संतोष एवं आनंद का वातावरण निर्मित होगा । ‘यदि प्रत्येक व्यक्ति साधना करनेवाली हो एवं उसके द्वारा वह सच्चे अर्थ में सुखी होगी; परंतु यह हिन्दू राष्ट्र घडाने के लिए हम सभी को प्रयास करने पडेंगे तथा ये प्रयास आध्यात्मिक साधना द्वारा ही संभव होंगे’, ऐसा उनका दृढ विश्वास है ।  इसी दिशा में एक कदम बढाने के रूप में ‘पितांबरी ने ‘व्यवसाय वृद्धि के १२ अध्यात्मिक मंत्र एवं तंत्र’ विषय पर आधारित विशेष ‘दैनंदिनी’ तैयार की है, जिससे प्रत्येक को अध्यात्म के माध्यम से व्यावसायिक प्रगति साध्य करने के लिए मूलमंत्र मिलेगा एवं व्यक्ति इस व्यक्तिगत प्रगति द्वारा राष्ट्र की भी उन्नति साध्य कर सकेगा  ।

इतना ही नहीं, जबकि ‘पितांबरी’ समूह में काम करनेवाले प्रत्येक सहकारी को  आध्यात्मिक साधना का लाभ प्राप्त हो, इस हेतु उन्होंने सनातन संस्था के मार्गदर्शन में  सहकारियों के लिए सत्संगों का आरंभ किया । पितांबरी कार्यालय में दैनंदिन कामकाज का प्रारंभ प्रतिदिन सवेरे प्रार्थना एवं नामस्मरण से किया जाता है । इतनाही नहीं, अपितु ‘पितांबरी’ के ग्राहकों को भी साधना का महत्त्व समझ में आएं, इसलिए अगरबत्ती अथवा पूजा-सामग्री के साथ ही ‘साधना कैसे करें ?’, इसकी जानकारी भी दी जाती है । हिन्दू संस्कृति की कोख से निरंतर जुड जाने हेतु कार्यालय में प्रत्येक हिन्दू त्योहार मनाया जाता है । ऐसे त्योहार के अवसर पर विविध कार्यक्रम सांस्कृतिक मंडल के माध्यम से आयोजित किए जाते हैं । छत्रपति शिवाजी महाराजजी की कार्यप्रणाली से डॉ. रवींद्रजी बहुत प्रभावित हैं । इस कारण स्वयं के प्रतिष्ठान में वही  पद्धति अपनाने में वे सदैव अग्रसर रहते हैं । छत्रपति शिवाजी महाराजजी के ‘मैनेजमेंट’ का (प्रबंधन का) अनुकरण कंपनी में किया जाता है ।

नाम, सत्संग, सत्सेवा, त्याग ये सनातन धर्म की गुरुकुंजी के अनुसार साधना करने से व्यवसायवृद्धि के लिए उसका उपयोग कैसे होता है ?, साथ ही प्रारब्ध (नसीब) पर मात कर किस प्रकार प्रगति साध्य कर सकते हैं ? इसकी अनुभूति स्वयं को हुई है । जिस प्रकार सृष्टि पंचमहाभूतों पर (पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश) आधारित है, उसी प्रकार सफल व्यवसाय भी ‘५-एम्स’ पर (5 M’s) आधारित हैं । इन ५ तत्त्वों की  ५ देवताएं होती हैं एवं उनमें से ‘कुलदेवता’ का नामस्मरण करने से सभी देवता प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार व्यवसाय के ‘५- एम्स’ में योग्य समन्वय बनाए रखने से सफलता निश्चित मिलती हैं ।

उद्योग की भाषा में ये ‘५- एम्स’ अर्थात 

अ. ‘मटेरियल’ (Material) (पृथ्वी) : उत्पादन हेतु आवश्यक ऐसी मूल सामग्री

आ. ‘मनी’ (Money) (आप) : पूंजी, जो प्रत्येक व्यवसाय की आर्थिक ऊर्जा होती है

इ. ‘मॅनपॉवर’ (Manpower) (तेज) : (संसाधन) कर्मचारियों का कौशल्य एवं कर्तव्यनिष्ठा

ई. ‘मशीन’ (Machine) (वायू) : आधुनिक तंत्रज्ञान एवं परिवर्तित काल के अनुसार  प्रक्रिया

उ. ‘मार्केट’ (Market) (आकाश) : योग्य बाजार का चयन एवं विस्तार ।

इन ‘५- एम्स’ का उचित संतुलन संजोकर व्यवसाय में निश्चित सफलता प्राप्त हो सकती है, यह अनुभव उन्होंने लिया है ।

यह लाभ अन्य उद्यमियों को भी हों, इस हेतु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में ‘आध्यात्मिक साधना द्वारा व्यवसाय वृद्धि’ इस विषय पर वे व्यावसायिक एवं नए उद्यमियों के लिए सत्संग ले रहे हैं । राष्ट्र में अच्छे उद्यमी घड पाएं, इस उद्देश्य से उन्होंने अबतक गोवा के म्हापसा, फोंडा, पणजी, साथ ही कोकण के कुडाळ, मालवण, रत्नागिरी एवं दापोली में भी व्याख्यान लिए हैं । शीघ्र ही डॉ. प्रभुदेसाई का देवगढ में भी व्याख्यान होगा । ‘हिन्दुत्व के कट्टर समर्थक’ रहे रवींद्रजी अब ‘डॉक्टर रवींद्र प्रभुदेसाई’ बन गए हैं । ‘कोकण में ३ सत्संग लेने के उपरांत घर वापस आनेपर मुझे टिळक विश्वविद्यालय से ‘डी.लिट्.’ पदवी प्राप्त होगी’, ऐसा ज्ञात हुआ तथा पुनः एकबार ‘गुरुकृपा से परमेश्वर हमें समर्थन दे रहे हैं’, ऐसी गहन अनुभूति प्राप्त हुई’, ऐसा डॉ. रवींद्रजी कृतज्ञतापूर्वक कहते हैं ।

गोशाला में गोमाता की सेवा करते हुए गोप्रेमी श्री. रवींद्र प्रभुदेसाई

४. ‘गौ-संस्कृति राष्ट्र की पहचान है’, जबकि गोमाता सनातन संस्था का गौरव  !

गोपालन, गोरक्षा, गो-उत्पादन ये सभी डॉ. रवींद्र प्रभुदेसाई के आत्मीय विषय हैं ।  नि:स्वार्थ सेवाभाव से गोमाताओं की सेवा एवं सुरक्षा करने हेतु रवींद्रजी कटिबद्ध हैं । इसी आत्मीयता द्वारा आज विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्गत स्थापन हुई ‘गोसेवा संवर्धन न्यास’ के वे माननीय अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं । मराठवाडा में कुछ वर्ष पूर्व आए अकाल में पशुओं के लिए चारा छावनी की निर्मिति करना आवश्यक बन गया था । उस समय एक सामान्य गोसेवक ने उन्हें सहायता हेतु पत्र लिखा था । रवींद्रजी ने बिना समय गंवाए आपातकालीन आवश्यक धन-राशि सीधे उनके खाते में जमा कर सहायता की थी । सनातन संस्था के पनवेल आश्रम के (स्व.) परात्पर गुरु पांडे महाराजजी ने कहे अनुसार उन्होंने गायों की सेवा करना आरंभ किया । गायों का आध्यात्मिक एवं स्वास्थ्यप्रद महत्त्व ध्यान में आने के पश्चात आनगाव, तळवडे, दापोली में उन्होंने गोशालाओं की निर्मिति की । इन में कुल मिलाकर ६८ गोधन हैं । इसके द्वारा गौ-सेवा का महत्त्वपूर्ण कार्य उनके करकमलों द्वारा हो रहा है । गायों के गोबर से ‘पितांबरी गोमय गोबर-खाद (उर्वरक)’, विविध बीमारियों पर गुणकारी गोमूत्र से निर्मित ‘पितांबरी गोमूत्र प्लस कैप्सूल’, रोगप्रतिकार शक्तिवर्धक ‘पितांबरी गोपीयुष टैब्लेट्स’ जैसे विविध उत्पादों की निर्मिति उन्होंने की है । गायों द्वारा उपलब्ध पंचगव्य से अन्य उत्पादों के निर्माण सह गोवंश संवर्धन का बडा कार्य वे कर रहे हैं । आगामी काल में देशी गायों पर गहन अनुसंधान करने का उन्होंने निर्धार किया है ।