धर्म का कारण बताकर ‘ग’ से ‘गणपति’ पढ़ाना बंद किया गया और उसके स्थान पर ‘ग’ से ‘गधा’ पढ़ाया जाने लगा ।

जयपुर (राजस्थान) – पहले जब हम अक्षर सीखते थे, तब ‘ग’ से ‘गणपति’ सिखाया जाता था; लेकिन अब कई लोगों ने इस पर आपत्ति की एवं कहा कि “गणपति एक धार्मिक शब्द है और वह एक विशेष धर्म से संबंधित है, यह स्वीकार्य नहीं है ।

” ‘गधा’ चलेगा लेकिन ‘गणपति’ नहीं चलेगा – इस प्रकार की सोच रखने वाले लोग देश में हैं और पाठ्यपुस्तक बनाने वाले लोग भी इसी प्रकार के हैं । इस तरह के शब्दों में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने भारत के शैक्षणिक पाठ्यक्रम पर आलोचना की । वे एपीक्स विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे ।
राज्यपाल बागडे ने आगे कहा –

१. हमारी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को ब्रिटिशों ने नष्ट कर दिया । हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली को अंग्रेजों ने नष्ट कर दिया । उस समय मैकाले गवर्नर था । एक बैठक में उसने कहा था कि अगर भारत को नियंत्रण में रखना है, तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को बदलना होगा । और उसने वही किया । हमारी पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को समाप्त कर अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया ।
२. न्यूटन से पहले ही भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के बारे में बताया था !
न्यूटन ने वर्ष 1530 में गुरुत्वाकर्षण पर अनुसंधान किया था । परन्तु उससे भी पहले, वर्ष 1150 में भास्कराचार्य ने ‘लीलावती’ नामक पुस्तक में गुरुत्वाकर्षण का उल्लेख किया था । भास्कराचार्य की बेटी का नाम लीलावती था । वह विधवा थी और उनके साथ रहती थी । लीलावती ने भास्कराचार्य से पूछा था , “पिताजी, आप कहते हैं कि सूर्य स्थिर है, पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है, चंद्रमा उसकी परिक्रमा करता है – तो वे नीचे क्यों नहीं गिरते ?” इस पर भास्कराचार्य ने उत्तर दिया था कि वे एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं और खींचते हैं, इसलिए वे नहीं गिरते । एक-दूसरे को आकर्षित करना और गुरुत्वाकर्षण एक ही बात है ।
३. नकल करके या याद करके पास होना शिक्षा नहीं है ! शिक्षा का उद्देश्य बच्चों की बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना है । केवल नकल करके या रटकर पास होना शिक्षा नहीं है । शिक्षा का मतलब है जो कुछ भी आपने पढ़ा है, उसे समझना और फिर अपने विचार व्यक्त करना । नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों की शैक्षणिक स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है । यह नई नीति एक सुसंस्कृत समाज बनाने की दिशा में है । शिक्षा में व्यावसायिकता के स्थान पर समाज की उन्नति की भावना होनी चाहिए ।
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