
रामनाथी, २२ जून (वार्ता.) – हिन्दू धर्म दुराचार को अधर्म मानता है । विश्वकल्याण की भावना से काम करना भी धर्म है । योग्य कृति को ही धर्म कहा गया है । अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर अन्यों को पीडा देना, अधर्म है । अभिव्यक्ति स्वातंत्रता की मुख्य अडचन यह है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता अथवा स्वैराचार ? इसे निश्चित कौन करेगा ? अभिव्यक्ति स्वतंत्रता वास्तव में कौनसी है ? इसकी दिशा भारतविरोधी शक्तियों ने निश्चित की है । इसमें वाममार्गीय शक्तियों का गठबंधन है । अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का अनावश्यक प्रसार किया गया है । यह अभिव्यक्ति स्वतंत्रता साम्यवादी, वाममार्गीय, नक्सलवादी जैसी राष्ट्रविरोधी शक्तियों के पक्ष में झुकी है ।
संविधान के अनुच्छेद १९ (१ ए) अनुसार प्रत्येक को अभिव्यक्ति स्वतंत्रता है; परंतु १९ (२) अनुसार भारत के अखंडत्व की दृष्टि से अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को प्रतिबंध भी लगाया गया है । वर्तमान में अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का उपयोग सुविधानुसार किया जा रहा है । शबरीमला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के लिए अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का सूत्र उपस्थित किया जाता है; परंतु अन्य धर्मियों के विषय में ये अभिव्यक्ति स्वतंत्रतावाले मौन साध जाते हैं, ऐसे उद्गार सनातन संस्था के प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस ने किए । वे यहां हो रहे वैश्विक हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन के छठे दिन उपस्थितों को संबोधित कर रहे थे ।
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संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।