
रामनाथी, १४ जून (संवाददाता) – ईसाई जब हिन्दुओं का धर्मांतरण करते हैं, तब वे उनमें राष्ट्रविरोधी भावना उत्पन्न करते हैं । उनकी यह नीति केवल भारततक सीमित नहीं है, अपितु ईसाई जिस देश में जाते हैं, वहां वे यही नीति अपनाते हैं । वर्ष १७०० से ईसाई इसी प्रकार की नीति अपना रहे हैं, ऐसा तेलंगाना की येथील भगवद्गीता फाऊंडेशन फॉर वैदिक स्टडीज की सहनिदेशिका श्रीमती एस्थर धनराज ने किया । अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन के तीसरे दिन ‘धर्मांतरण रोकना और घरवापसी की योजना’ इस पहले सत्र में ‘पश्चिमी राष्ट्रों में ईसाईयों की दुर्दशा और भारत पर उसका प्रभाव‘, इस विषय पर वे ऐसा बोल रही थीं ।
उन्होंने आगे कहा …
१. अमेरिका की एक संस्था द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार वहां के ४७ प्रतिशत ईसाई चर्च नहीं जाते । उसके कारण अब ईसाईयों ने अन्य धर्मियों पर अपना ध्यान केंद्रित कर उनका धर्मांतरण करने का काम आरंभ किया है । इसमें हिन्दुओं का ‘ब्रेन वॉश’ किया जाता है ।
२. ईसाई अपने बच्चों को चर्च ले जाते हैं, वैसे ही हिन्दू अभिभावकों को भी अपने बच्चों को हिन्दू धर्म की शिक्षा देना आवश्यक है ।
३. ईसाई यदि चावल की बोरी देकर हिन्दुओं का धर्मांतरण करते हों, तो हिन्दुओं को भी चावल की बोरी देकर धर्मांतरण रोकना चाहिए । (‘ईसाई हिन्दुओं को चावल अथवा अन्य सामग्री का लालच देकर धर्मांतरण करते हों, तो हिन्दुओं को भी गरीब हिन्दुओं के भरण-पोषण का दायित्व लेकर धर्मांतरण रोकना चाहिए ।)
४. हिन्दू संगठनों को जरूरतमंद हिन्दुओं की सहायता करनी चाहिए । आर्थिक सहायता करना संभव न हो, तो दृढतापूर्वक ऐसे हिन्दुओं साथ रहना चाहिए ।
५. धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत, संगठित, संवैधानिक और आध्यात्मिक स्तरों पर लडाई लडनी चाहिए । हमने संगठितरूप से प्रयास किए, तो भगवान को हमें हिन्दू राष्ट्र देना ही पडेगा ।
धर्मनिरपेक्ष भारत का ५० प्रतिशत कर मुसलमान एवं ईसाइयों पर व्यय किया जाता है ! – एम्. नागेश्वर राव, भूतपूर्व प्रभारी महासंचालक, सीबीआई

अपना संविधान धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी सरकार के पास कर रूप में जमा होनेवाली धनराशि निर्धारित लोगों को ही दी जाती है । अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो रहा है । केंद्र सरकार की विविध योजनाओं के अंतर्गत ३७ सहस्र ६६९ करोड रुपये अल्पसंख्यकों के लिए व्यय किया जा रहा है । विविध राज्यों में अल्पसंख्यकों के लिए व्यय की जानेवाली निधि भी यदि इसमें जोड दी जाए, तो यह आंकडा दुगुना होगा । धर्मनिरपेक्ष भारत का ५० प्रतिशत से भी अधिक कर, मुसलमान एवं ईसाइयों पर व्यय किया जा रहा है । विशिष्ट समाज पर ही सुख-सुविधाएं लुटानेवाला देश धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकता है ? अल्पसंख्यकों के हितों के लिए केंद्र सरकार ने ‘नैशनल कमिटी ऑफ मायनॉरिटी’, ‘वक्फ मंडल’, ‘हज समिति’, ‘नैशनल मायनॉरिटी फायनानशियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’, ‘नैशनल वक्फ डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’, ‘मौलाना आजाद एज्युकेशन कार्पोरेशन’ आदि विविध संस्थाएं अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए स्थापित की हैं । हज यात्रा के लिए अनुदान दिया जाता है । हिन्दुओं को मानसरोवर (मानससरोवर) जाने के लिए कितने कष्ट होते हैं ?; परंतु उन्हें अनुदान नहीं दिया जाता । अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए केंद्र सरकार ने स्वतंत्र मंत्रालय स्थापित किया है ।
हिन्दुओं के ही कर से हिन्दू संस्कृति नष्ट करने का काम !
अल्पसंख्यकों को दी जानेवाली सहूलियतों में जैन, बौद्ध, सिक्ख एवं पारसी, इनका भी समावेश किया गया है; परंतु वह केवल विरोध कम करने के लिए है । औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जीजिया कर लागू किया । उसीप्रकार आज भी हिन्दुओं से उनकी कमाई का कुछ भाग जो सरकार की तिजोरी में जाता है, वह ईसाई एवं मुसलमानों के लिए उपयोग किया जाता है । यह पैसा हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिए ही उपयोग किया जाता है । मुसलमान विद्यार्थी को धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक के रूप में छात्रवृत्ति मिलती है; परंतु उसी वर्ग के आर्थिकदृष्टि से दुर्बल हिन्दू विद्यार्थी को छात्रवृत्ति नहीं मिलती । यदि वह हिन्दू विद्यार्थी इस्लाम स्वीकार ले, तो उसे छात्रवृत्ति मिल सकती है । सरकार इसप्रकार ईसाई धर्मप्रसारकों समान धर्मपरिवर्तन का काम कर रहा है । हिन्दुओं के कर से हिन्दुओं की ही संस्कृति नष्ट करने के लिए पैसे दिए जा रहे हैं ।
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