
‘साधकों, आज से और अभी से ईश्वर हम पर प्रसन्न रहें और आपातकाल में हमें उनका सुरक्षा-कवच मिले’; इसके लिए हमें प्रयास करने चाहिए । सर्वप्रथम आपको अगले चार वर्षाें तक दो बार का नित्य प्रसाद मिले (भोजन मिले) और आप पर ईश्वर की कृपा बनी रहे; इसके लिए कुछ सूत्र बता रही हूं । (भाग १)
१. धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के दुष्परिणाम !
२० वर्ष पूर्व हिन्दू महिलाएं रसोईघर में धर्मपालन करती थीं; परंतु आज की महिलाएं वह नहीं करती । उसके दो कारण प्रमुख रूप से मेरे ध्यान में आए । एक तो उनकी माताओं ने अपनी कन्याओं को इसके संस्कार नहीं दिए हैं और दूसरा कारण यह है कि ये महिलाएं आलस के कारण ऐसा नहीं करतीं । अब तो आपातकाल का आरंभ हो चुका है । धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के कारण हम अधिक अपेक्षा नहीं कर सकते, इसका हमने कोरोनाकाल में अनुभव किया है । वास्तव में देखा जाए, तो यदि हमारे राज्यकर्ता धर्मनिष्ठ होते और वे यदि संतों के मार्गदर्शन में राज्य का शासन चलाते, तो आज यह स्थिति नहीं होती; क्योंकि ऐसी कोई भी समस्या नहीं है, जिसका समाधान नहीं निकल सकता । अब तो पानी सिर पर से जा रहा है । अनेक संत बार-बार यह बता रहे हैं कि आनेवाला काल अत्यंत भीषण होगा । उसके लिए अभी से ही साधना कीजिए और करवा भी लीजिए । यदि राजकर्ताओं ने ऐसा किया होता, तो आज कुछ स्थिति अलग होती; परंतु धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में कार्यरत राज्यकर्ताओं को तो आध्यात्मिक दृष्टिकोण ही नहीं हैं !
२. सामान्य घर की अधिकांश स्त्रियों द्वारा रज-तमात्मक आचरण करने से उनके द्वारा बनाया गया भोजन अपवित्र होना
अनेक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण, साधक, संन्यासी और संत सामान्य गृहस्थ के घर में भोजन करने के इच्छुक नहीं होते; क्योंकि उनके घर की अधिकांश महिलाएं स्वयं के रज-तमात्मक आचरण से रसोईघर को अशुद्ध बना देती हैं, अतः उनके द्वारा बनाया गया भोजन अपवित्र होता है ।
३. अन्नपूर्णा कक्ष में ब्रह्मांड का पोषण करनेवाली माता अन्नपूर्णा विराजमान होने से वहां किसी भी बात का अभाव न होना
हमें अपने रसोईघर को ‘अन्नपूर्णा कक्ष’ बना देना चाहिए । रसोईघर में अन्न का अभाव पड सकता है । अन्नपूर्णा कक्ष में संपूर्ण ब्रह्मांड का पोषण करनेवाली माता अन्नपूर्णा विराजमान होती है । उसके कारण वहां कभी भी किसी बात का अभाव नहीं होता । कोरोना काल में घर के अलगीकरण में होने के समय मैने इसकी प्रत्यक्ष प्रतीति की है ।
४. अन्नपूर्णादेवी की कृपा से कोरोना काल में किसी भी बात का अभाव न होने से ‘देवी ने ही सभी वस्तुओं की आपूर्ति की’, ऐसा लगना
इंदौर शहर कोरोना संक्रमण से अत्यधिक प्रभावित था; परंतु हमारे लिए आश्रम में सभी वस्तुएं (शहर से ४७ कि.मी. दूरी पर स्थित) शहर से ही आती थीं । घर के अलगीकरण के कारण वाहनों की आवाजाही डेढ महिना ठप्प थी; परंतु ऐसा होते हुए भी हमें किसी बात का अभाव नहीं हुआ । हमें सबकुछ बडी सहजता से और उचित भाव में मिल रहा था । आश्रम में ‘कोरोना का किसी प्रकार का प्रभाव नहीं है’, ऐसे लगता था । कुछ वस्तुएं तो हमें इस प्रकार से मिलती थीं कि मानो ‘उनकी आपूर्ति अन्नपूर्णा माता ने ही की ।’ मैं अप्रैल २०१३ से ही आश्रम की पूर्णकालीन साधिकाओं और गृहस्थाश्रमी स्त्रियों से धर्मपालन करा लेने का प्रयास कर रही हूं । उसके कारण उस अनुभव के आधार पर यहां एक-एक सूत्र दिया है ।
५. सवेरे अन्नपूर्णा कक्ष में जाने के विषय में कुछ नियम !
अ. सवेरे जागने पर बिना स्नान किए अन्नपूर्णा कक्ष में न जाने का सूत्र घर के सभी सदस्यों पर लागू होता है । उसके कारण आप में सवेरे सूर्याेदय से पूर्व स्नान करने की वृत्ति उत्पन्न होती है, साथ ही ‘अन्नपूर्णा कक्ष तो साक्षात अन्नपूर्णा माता का मंदिर है’, यह भाव भी उत्पन्न होगा ।
आ. यदि पानी गरम करना हो, तो उसे बिना शौच किए गरम करना चाहिए । चाय भी स्नान कर ही पीनी चाहिए ।
संक्षेप में कहा जाए, तो अन्नपूर्णा माता की पूजा किए बिना पानी गरम करने के अतिरिक्त किसी प्रकार का आहार नहीं बनाना चाहिए । आपातकाल में भी अपने घर में चूल्हा कार्यरत रखना चाहिए । अग्निदेव एवं अन्नपूर्णा माता की कृपा होने के लिए इस आचरण का अंगिकार करना चाहिए !
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