भारत पहले से ही जिस जीवन-पद्धति का पालन करता आया है, वही अब पाश्चात्य देश खोजकर अपना रहे हैं !

यह स्वास्थ्यविज्ञान मेरे लिए प्रयोगशाला में आरंभ नहीं हुआ था । इसका आरंभ मेरी अपनी दादी की शांत अनुशासित दिनचर्या से हुई थी । प्रतिदिन वे प्रातः ४ बजे से पहले उठ जाती थीं । उन्होंने पिछली संध्या को सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं खाया होता था । सामान्यतः वे सायंकाल लगभग ६ बजे भोजन करती थीं और प्रतिदिन उनका लगभग १७ घंटे का उपवास हो जाता था । सूर्योदय से पूर्व की शांति में वे ध्यान के लिए बैठती थीं और उसके बाद पैदल मंदिर जाती थीं । स्नान के पश्चात ही लगभग ११ बजे वे धीरे-धीरे अपना उपवास तोडती थीं । कोई ‘फिटनेस ऐप्स’ (शरीर को तंदुरुस्त रखने की प्रणालियां) नहीं थीं, ‘ग्लूकोज मॉनिटर’ (शरीर में मधुमेह मापने का यंत्र) नहीं थे, दीर्घायु के लिए ‘पॉडकास्ट’ (छोटी वार्ताएं) नहीं थीं । ‘बायोहैकिंग’ शब्दावली नहीं थी । सिलिकॉन वैली के कोई गुरु ‘सकेर् डियन रिदम’ (प्राकृतिक जैविक घडी का तालमेल) अथवा ‘चयापचय लचीलापन’ समझाने नहीं आते थे । केवल जीवन का अनुशासन था ।

१. पुराने ज्ञान के नए नाम

श्री. मयंक जैन

भारतीय संस्कृति से अनेक ऐसी प्रथाएं उत्पन्न हुई हैं । वे पारिवारिक आदतों, आध्यात्मिक अनुशासन और सामुदायिक परंपराओं के माध्यम से शताब्दियों तक सुरक्षित रखी गईं । फिर किसी मोड पर आधुनिक भारतीयों ने उन्हें पुराना और अप्रासंगिक समझकर उनका उपहास करना आरम्भ कर दिया । कुछ दशकों बाद पाश्चात्य देशों ने उन्हें पुनः ढूंढ निकाला, उनके नाम बदल दिए, उनका अध्ययन किया, उनका ‘पैकेजिंग’ किया और महंगी शब्दावली के साथ उन्हें हमें ही पुनः बेचने लगे । सूर्योदय से पूर्व उठनेवाली दादी ‘सकर्ेडियन ऑप्टिमाइजेशन’ (प्राकृतिक जैविक घडी का संतुलन बनाए रखनेवाली) बन जाती हैं । श्वास-प्रश्वास का मार्गदर्शन करनेवाला योग शिक्षक ‘पैरासिम्पेथेटिक एक्टिवेशन’ (विश्राम और पाचन प्रणाली को सक्रिय करनेवाला) बन जाता है । ध्यान ‘माइंडफुलनेस’ (सजगता) बन जाता है । सरल प्रारंभिक भोजन ‘समय-सीमित भोजन’ बन जाता है । नियंत्रित आहार ‘चयापचय लचीलापन’ बन जाता है । उपवास ‘ऑटोफैगी सक्रियण’ (शरीर की क्षतिग्रस्त अथवा मृत कोशिकाओं को नष्ट कर नई स्वस्थ कोशिकाएं बनाने की प्राकृतिक प्रक्रिया) बन जाता है । भावनात्मक स्थिरता ‘तंत्रिका तंत्र का नियमन’ बन जाती है और अनियमित नींद, क्रोध, अतिभोजन तथा मानसिक अस्थिरता के विरुद्ध आयुर्वेद की चेतावनी अचानक ‘कोर्टिसोल’ (तनाव संबंधी हार्मोन), सूजन और तनाव-जीवविज्ञान की ‘फैशनेबल’ भाषा के रूप में लौट आती है । शब्दावली बदल जाती है । सफेद कोट आ जाता है । ‘पॉडकास्ट’ दिखाई देने लगते हैं । सिलिकॉन वैली इस प्रवृत्ति को अपना लेती है और अचानक अनेक शिक्षित भारतीय अपनी ही संस्कृति द्वारा शताब्दियों से जी गई जीवन-पद्धति का सम्मान करने लगते हैं ।

यह आधुनिक विज्ञान के विरोध में तर्क नहीं है । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मानवजाति की महान उपलब्धियों में से एक है । प्रतिजैविक, शल्यचिकित्सा, ‘इमेजिंग’, आपातकालीन चिकित्सा, विभिन्न टीके, अतिदक्षता सेवाएं और प्रमाण-आधारित औषधि विज्ञान ने करोडों लोगों के प्राण बचाए हैं । साथ ही यह प्रत्येक प्राचीन दावे की आंख मूंदकर प्रशंसा करने का भी आग्रह नहीं है । प्रत्येक पारंपरिक मान्यता स्वतः वैज्ञानिक नहीं हो जाती । प्रत्येक पुरानी प्रथा उचित हो, यह आवश्यक नहीं । प्रमाण महत्त्वपूर्ण है । सत्यापन और परीक्षण महत्त्वपूर्ण हैं; किन्तु इसका विपरीत अहंकार भी उतना ही मूर्खतापूर्ण है कि जब तक पाश्चात्य देश किसी बात का मापन न करें, तब तक उसका कोई मूल्य ही नहीं है । पहली ‘स्मार्टवॉच’ (मोबाइल जैसी तकनीकी सुविधाओंवाली घडी) के आविष्कार से हजारों वर्ष पहले संस्कृतियों ने मानव स्वास्थ्य का अवलोकन किया था । उन्होंने शोध-पत्रिकाओं से नहीं, अपितु अनुशासित जीवन से अनेक अंतर्दृष्टियों को सुरक्षित रखा । दादी को संभवतः जैवरासायनिक मार्ग ज्ञात न हों; पर उन्हें जीवन की लय का ज्ञान था ।

प्राचीन लय और आधुनिक विज्ञान

अनेक वर्षों बाद ‘द एविडेंस-मीट किल्स’ नामक अपने वृत्तचित्र के लिए, पोषण विज्ञान के विचारों में गहराई से डूबा हुआ था, तब यह स्मृति नए उत्साह के साथ मेरे मन में उभर आई । मुझे नई दिल्ली स्थित ‘एम्स’ अस्पताल की डॉ. रीमा दादा की प्रयोगशाला से एक शोध प्राप्त हुआ । इस शोध में जैविक वृद्धावस्था पर योग-पद्धति और प्राणायाम के प्रभाव का परीक्षण किया गया था । प्राणायाम और ध्यान जैसी पद्धतियों सहित योग-आधारित जीवनशैली हस्तक्षेप ‘टेलोमीयर’ (हमारी कोशिकाओं में गुणसूत्रों के सिरों पर स्थित ‘डी.एन.ए.’ की एक सुरक्षात्मक संरचना) की लंबाई, ‘टेलोमेरेज’ की क्रिया, ‘ऑक्सिडेटिव’ तनाव, सूजन और ‘डी.एन.ए.’ की सुधारना पर किस प्रकार प्रभाव डाल सकते हैं, इसका अध्ययन उनके समूह के शोधकर्ताओं ने किया है (संदर्भ : ‘टोलाहुनास एट अल., २०१७’; ‘शर्मा एट अल., २०२२’) । मेरे लिए यह एक परिचित क्षण था । भारत की प्रमुख चिकित्सा संस्था आधुनिक आणविक जीवविज्ञान की भाषा का उपयोग कर यह प्रमाणित कर रही थी कि भारतीयों की कितनी ही पीढियों ने अपने घरों, मंदिरों, आश्रमों और दैनिक जीवन में शांतिपूर्वक क्या आचरण किया था । मेरी दादी ने कभी ‘टेलोमीयर’ शब्द का प्रयोग नहीं किया होता । उन्हें कोशिकीय वृद्धावस्था की भाषा ज्ञात नहीं थी; किन्तु जीवन के अनुभव से वे कुछ गहन सत्य जानती थीं । श्वास, भोजन, निद्रा, संयम, लय और आंतरिक शांति जीवन के अलग-अलग विभाग नहीं थे, अपितु वे एक अनुशासित जीवन का आधार थे । भारतीय स्वास्थ्य परंपरा की यही मौन प्रतिभा है ।

– श्री. मयांक जैन

२. योग की पुनर्वापसी

योग इसका संभवतः सबसे स्पष्ट उदाहरण है । अनेक दशकों तक भारत के अंग्रेजी भाषी अभिजात वर्ग के बडे भाग ने योग को पुरातन, रहस्यमय अथवा लज्जाजनक समझकर अस्वीकार किया । फिर अमेरिकी योग स्टूडियो, प्रसिद्ध हस्तियों का समर्थन, ‘न्यूरोसाइंस’ (तंत्रिका विज्ञान) के अध्ययन, ‘मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एम.आर.आई.)’ की पुष्टि और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी ‘ब्रांड’ सामने आए ।

अचानक योग वैश्विक हो गया । जिसे कभी पिछडा समझा जाता था, वही अब ‘प्रीमियम’ बन गया । ध्यान ने भी यही मार्ग अपनाया ।

कॉर्पोरेट जगत के थकावट को पहचानने से बहुत पहले भारतीय परंपराएं शांति, एकाग्रता, श्वास और मानसिक अनुशासन की कला का संवर्धन कर चुकी थीं । जब सम्पन्न लोगों में तनाव महामारी बन गया, तभी ‘माइंडफुलनेस’ शब्द लोकप्रिय हुआ । जो अधिकारी कभी ध्यान का उपहास करते होंगे, वे आज विलासी विश्रामगृहों में ध्यान के माध्यम से शांति प्राप्त करने के लिए अच्छा-खासा धन व्यय करते हैं ।

३. जैन उपवास की परंपरा

उपवास ने भी इसी प्रकार की यात्रा की है । विशेष रूप से जैन परंपराओं में संयम, शीघ्र भोजन करना, पाचन को विश्राम देना, सादगी और रात्रि में देर से भोजन करने से बचना, ये सिद्धांत बहुत पहले से समाहित हैं । आधुनिक ‘वेलनेस’ उद्योग में सुधारों के आने से बहुत पहले जैन परिवारों को कम भोजन करना, समय से भोजन करना और सजगतापूर्वक भोजन करना, नैतिक और शारीरिक अनुशासनों का ज्ञान था । इसके बाद शरीरविज्ञान अथवा चिकित्सा विज्ञान का वर्ष २०१६ का ‘नोबेल’ पुरस्कार आया । यह पुरस्कार जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओहसुमी को ‘ऑटोफैगी’, अर्थात शरीर की ‘सेल्युलर रिसाइक्लिंग’ (कोशिकाओं के पुनर्चक्रण) और सफाई की प्रक्रिया से संबंधित शोध के लिए प्रदान किया गया (शरीरविज्ञान अथवा चिकित्सा का ‘नोबेल’ पुरस्कार, २०१६) । आधुनिक विज्ञान ने जिस तथ्य को अब सुंदर ढंग से स्पष्ट किया था, उसका उत्सव मनाया; किन्तु अनेक भारतीय घरों में इस ज्ञान का कोई-न-कोई रूप पीढियों से दैनिक आचरण का भाग रहा था । इससे ‘नोबेल’ पुरस्कार के महत्त्व में कमी नहीं आती, अपितु विज्ञान और परंपरा – दोनों के प्रति हमारी कृतज्ञता और अधिक दृढ होती है । विज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट करता है, जबकि परंपरा प्रायः व्यवहार को सुरक्षित रखती है ।

४. प्राकृतिक वनस्पति-आधारित और तेलमुक्त (होल फूड्स प्लांट बेस्ड नो ऑयल) आहार की जडें भारत में !

मेरा अपना अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा । ‘द एविडेंस-मीट किल्स’ नामक वृत्तचित्र बनाते समय मैं स्वयं को पोषण संबंधी शोध में डुबो बैठा और धीरे-धीरे संपूर्ण प्राकृतिक वनस्पति-आधारित तथा तेलमुक्त जीवनशैली की ओर मुड गया । यह कोई फैशन नहीं था, प्रमाणों पर आधारित निर्णय था । डॉ. माइकल ग्रेगर, डॉ. जॉन मैकडॉगल, डॉ. कैल्डवेल बी. एस्सेलस्टीन और डॉ. नील बर्नार्ड जैसे चिकित्सकों एवं शोधकर्ताओं का, साथ ही अतिरिक्त आहार वसा, पशु-उत्पादों, ‘एंडोथीलियल डिसफंक्शन’ (रक्तवाहिनियों की भीतरी पतली परत को क्षति पहुंचने अथवा उसके समुचित रूप से कार्य न कर पाने की स्थिति) और दीर्घकालिक रोगों के बीच संबंध दर्शानेवाले बढते शोधों का मुझ पर प्रभाव पडा ।

यहां भी भारत की कुछ उत्तरदायी परंपराएं हमारी आंखों के सामने ही विद्यमान थीं । जिसे हम आज संपूर्ण प्राकृतिक वनस्पति-आधारित और तेलमुक्त भोजन कहते हैं, वह भारत के लिए उतना विदेशी नहीं है, जितना लोग समझते हैं । पाश्चात्य देशों में ‘होल फूड्स प्लांट बेस्ड नो ऑयल’ शब्द प्रचलित होने से बहुत पहले अनेक भारतीय रसोइयों ने तेलरहित, भाप में पकाए हुए, किण्वित और संपूर्ण खाद्य पदार्थों को अपने जीवन का अंग बना लिया था ।

(क्रमशः)

लेखक : श्री. मयांक जैन

(श्री. मयांक जैन वृत्तचित्र निर्माता तथा ‘रूट स्टॉक फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक हैं । ‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’ उनका नवीनतम वृत्तचित्र है, जो दक्षिण एशिया और यूरोप में कट्टरतावाद पर दो दशकों के क्षेत्रीय कार्य पर आधारित है ।)