‘श्री गुरु पर श्रद्धा’, यही भवसागर से पार होने की एकमात्र गुरुकुंजी !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

ऐसे महान अवतारी गुरु के श्री चरणों में साधकों की श्रद्धा कैसी होनी चाहिए ? गुरु के अस्तित्व अथवा उनके कार्य पर तनिक भी संदेह न करते हुए, ‘मेरे गुरु जो कर रहे हैं, वह मेरे कल्याण के लिए ही है’, ऐसा दृढ भाव मन में रखना ही श्रद्धा है । ‘किसी भी प्रकार के किंतु-परंतु मन में न लाते हुए गुरु की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना’, यही उनके प्रति श्रद्धा की पराकाष्ठा है । जीवन में संकटों के पहाड टूट पडें अथवा परिस्थिति विपरीत हो जाए, तब भी गुरु के प्रति निष्ठा क्षणभर के लिए भी डगमगानी नहीं चाहिए । हमारी प्रत्येक क्रिया, प्रत्येक विचार एवं प्रत्येक श्वास गुरु को अर्पित करने के भाव से, ‘ईश्वरार्पण बुद्धि’ से जीना चाहिए । जब साधक ऐसी निष्काम, निरपेक्ष एवं अनन्य श्रद्धा रखता है, तब यह निर्गुण गुरुतत्त्व उसे इस भवसागर से सुरक्षित पार ले जाकर अपने अखंड ब्रह्मानंद में सदा के लिए विलीन कर लेता है ।

श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ

‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जैसे महान गुरु हमें प्राप्त होना’, यह हमारे अनंत जन्मों का पुण्य है । उनके जन्मोत्सव के निमित्त हम यह संकल्प लें, ‘ऐसे सर्वव्यापी, निर्गुण एवं अथाह स्वरूपवाले श्री गुरु पर मेरु पर्वत समान अटूट श्रद्धा रखकर अंतिम श्वास तक उनकी सीख के अनुसार आचरण करेंगे !’
– श्रीसत्शक्ति  (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ


गुरुदेव के श्री चरणों में आर्त प्रार्थना ! : ऐसे महान अवतारी गुरु के श्री चरणों में कोटि-कोटि नमन कर आर्त प्रार्थना करें, ‘हे गुरुदेव, हम आपके श्री चरणों में पूर्णतः शरणागत हैं । आपके इस परम शांति प्रदान करनेवाले निर्गुण तत्त्व से एकरूप होने के लिए हमें सभी द्वंद्वों, सभी मायाबंधनों, स्वभावदोषों एवं अहंकार से मुक्त करें । हे कृपालु, अब हमारा हाथ मत छोडिए और हमें आपके आंतरिक सान्निध्य में रखकर अपने श्री चरणों में स्थायी स्थान प्रदान कीजिए !’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ (२१.४.२०२६)