धर्मशास्त्र एवं अध्यात्मशास्त्र

सनातन भारत : समाज, राष्ट्र, धर्म एवं अध्यात्म के संदर्भ में प्रासंगिक सूत्रों पर भाष्य करनेवाला स्तंभ

 सनातन संस्था द्वारा आयोजित अध्यात्म संबंधी प्रवचनों में अनेक बार जिज्ञासु पूछते हैं, ‘क्या ‘धर्मशास्त्र’ एवं ‘अध्यात्मशास्त्र’, भिन्न विषय हैं अथवा इन दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है ?’ अध्यात्मप्रसारक साधकों को इन प्रश्नों का उत्तर देना सुलभ हो, यह इस लेख का प्रयोजन है ।  

१. व्याख्या एवं स्वरूप

धर्मशास्त्र एवं अध्यात्मशास्त्र इन दोनों विषयों का अर्थ भले ही भिन्न हो, तब भी वे मनुष्य जीवन की उन्नति के लिए महत्त्वपूर्ण हैं ।

१ अ. धर्मशास्त्र : यह शास्त्र प्रमुखता से समाजव्यवस्था, नैतिकता, नियमों एवं कर्तव्यों से संबंधित है । इसमें व्यक्ति को परिवार में, समाज में एवं राष्ट्र में कैसे आचरण करना चाहिए, इसका मार्गदर्शन होता है । (उदाहरणार्थ पितृधर्म, गृहस्थधर्म, राजधर्म, आपद्धर्म इत्यादि ।) इसमें कर्मकांड, पूजा-अनुष्ठान, त्योहार-उत्सव एवं सामाजिक बंधनों का महत्त्व होता है ।

१ आ. अध्यात्मशास्त्र : यह शास्त्र आत्मा के स्वरूप का बोध कराता है । दृश्य विश्व से परे आत्मा को जान लेना तथा ईश्वर के साथ (परमात्मा के साथ) एकरूप होना, इसका मुख्य उद्देश्य है । इसमें साधना, भक्ति, ध्यान, आत्मचिंतन एवं वैराग्य के द्वारा स्वयं के अंतःकरण में झांका जाता है ।

सरल भाषा में बताना हो, तो धर्मशास्त्र ‘जीवन कैसे जीना चाहिए ?’ अर्थात ‘आचार’ सिखाता है; जबकि अध्यात्मशास्त्र ‘मैं कौन हूं ?’, इसका चिंतन करना अर्थात ‘विचार’ सिखाता है ।

२. तुलनात्मक अध्ययन

३. संबंध एवं समन्वय

धर्मशास्त्र को अध्यात्म की पहली सीढी माना जाता है । जब तक मनुष्य धर्म के अनुसार आचरण नहीं करता (अर्थात वह नीतिमान नहीं बनता), तब तक वह अध्यात्म के मार्ग पर प्रगति नहीं कर सकता । धर्म नींव है, जबकि अध्यात्म उस पर स्थित शिखर है । धर्म के आचरण के कारण चित्तशुद्धि होती है तथा शुद्ध चित्त को ही आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है । संक्षेप में बताना हो, तो समाजव्यवस्था उत्तम रहने के लिए ‘धर्म’ की आवश्यकता होती है; जबकि स्वयं को मुक्त कराने हेतु ‘अध्यात्म’ आवश्यक होता है ।

श्री चेतन राजहंस

‘धर्मशास्त्र नियम बताता है; परंतु अध्यात्मशास्त्र ‘अनुभू ति’ देता है । ‘मैं कौन हूं ? (कोऽहम्)’, इस प्रश्न से आरंभ यात्रा को ‘मैं ब्रह्म हूं (सोऽहम्)’, इस साक्षात्कार तक ले जानेवाला शास्त्र है अध्यात्मशास्त्र !’ – श्री. चेतन राजहंस

४. प्रमुख ग्रंथों के उदाहरण

धर्मग्रंथ प्रमुखता से मानवीय आचरण के नियम बताते हैं; जबकि अध्यात्म के ग्रंथ आत्मसाक्षात्कार एवं मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं ।

टिप्पणी : ‘भगवद्गीता’ एक ऐसा विलक्षण ग्रंथ है, जो धर्म (कर्तव्य) एवं अध्यात्म (ज्ञान) इन दोनों का संगम माना जाता है ।

५. धर्मशास्त्र एवं अध्यात्मशास्त्र का समाज की दृष्टि से महत्त्व

समाजव्यवस्था सुदृढ एवं सुरक्षित रहने हेतु इन शास्त्रों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है । धर्मशास्त्र समाज को एक ‘नैतिक नियमावली’ (Code of Conduct) प्रदान करता है । इसके कारण समाज में अराजकता नहीं फैलती । ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ (जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म (ईश्वर) करते हैं), इस वचन के अनुसार समाज टिका रहता है । धर्मशास्त्र से समाज को प्रामाणिकता, न्याय एवं सामाजिक दायित्व का भान होता है । अध्यात्मशास्त्र सिखाता है कि सभी प्राणिमात्रों में एक ही आत्मा है । यह भावना समाज में भेदभाव अल्प करने तथा वैश्विक बंधुभाव बढाने में सहायता करती है । इसीलिए सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने अध्यात्म पर आधारित राष्ट्ररचना का सिद्धांत रखा है । एक बार राष्ट्र की रचना अध्यात्म के आधार पर हुई, तो उससे समाज में ऊंच-नीच, जात, भाषा, प्रांत इत्यादि भेदभाव न्यून (कम) करने के लिए तथा वैश्विक बंधुभाव बढाने के लिए अलग से प्रयास नहीं करने पडते ।

६. निष्कर्ष

वर्तमान में समाजव्यवस्था उत्तम रखने के लिए धर्मशास्त्र आवश्यक है । धर्मशास्त्र समाज को नियमों में बांध देता है, जबकि अध्यात्मशास्त्र मनुष्य को बंधनों से मुक्त कराता है । भारतीय संस्कृति में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा नहीं है, अपितु ‘धारणा’ (एकाग्रता) है । धर्मशास्त्र मानवीय जीवन की चौखट तैयार कर देते हैं । सत्य बोलना, मातृ-पितृ देवो भव एवं अतिथि-सत्कार जैसे मूल्य धर्मशास्त्रों से ही आए हैं । धर्मशास्त्र नियम बताता है; परंतु अध्यात्मशास्त्र ‘अनुभूति’ देता है । ‘मैं कौन हूं ? (कोऽहम्)’, इस प्रश्न से आरंभ हुई यात्रा को ‘मैं ब्रह्म हूं (सोऽहम्)’, इस साक्षात्कार तक ले जानेवाला शास्त्र है अध्यात्मशास्त्र !’ संक्षेप में कहा जाए, तो अध्यात्मशास्त्र में बाह्य कर्मकांडों की अपेक्षा व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति पर बल दिया गया है ।

– श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था. (७.४.२०२६)