नवरात्रि की आदिशक्ति देवी भगवती की पूजा से हिन्दू नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रारंभ होने के पीछे का कारण !

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ‘काल’ अनंत तथा अविभाज्य है, फिर भी हमारे हिन्दू ऋषि-मुनियों ने सांसारिक एवं व्यावहारिक समतुल्य समय को चार युगों (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग), सहस्रयुग, शतक, दशक, वर्ष, मास, दिन, घटी, पल और विपल जैसी विभिन्न इकाइयों में विभाजित करते समय मापन की उचित पद्धति स्थापित की । प्राचीन और ज्योतिषीय ग्रंथों में वर्णन है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ की और समय गणना की पद्धति भी उसी दिन से आरंभ हुई । हिन्दू नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का नवरात्र की आदिशक्ति देवी भगवती की पूजा से प्रारंभ होने का यही मुख्य कारण है ।
आगामी हिन्दू नववर्ष संवत २०८३ !

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ अत्यंत शास्त्रीय, प्राकृतिक, वैज्ञानिक और स्वाभाविक है । इस समय संपूर्ण प्रकृति और सभी जीव नई चेतना, ऊर्जा तथा उत्साह से परिपूर्ण होते हैं । देश के विभिन्न राज्यों और हिन्दू समुदायों में यह पर्व गुडी पडवा (महाराष्ट्र/गुजरात), चेतीचंड (सिंधी समुदाय), युगादि (कर्नाटक), उगादि (आंध्र प्रदेश/तेलंगाना), संवत्सर पडवा (केरल और गोवा के कोंकणी समुदाय), नवरेह (जम्मू और कश्मीर), सजिबू नोंगमा (मणिपुर), बैसाखी (पंजाब/हरियाणा), नववर्ष (बंगाल), ज्योतिष दिवस आदि के रूप में जाना और मनाया जाता है । आगामी हिन्दू नववर्ष (संवत २०८३) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात १९ मार्च २०२६ से प्रारंभ हुआ ।
– आचार्य डॉ. अशोक कुमार मिश्रा, सभापती, विश्व ज्योतिष महासंघ, बिहार
अंकशास्त्र के दृष्टिकोण से आगामी हिन्दू नववर्ष का फल !

अंकशास्त्रीय दृष्टि से इस वर्ष हिन्दू नववर्ष का अंक ४ है (२+०+८+३ = १३, १+३ = ४), जो ज्योतिषीय दृष्टि से राहु से संबंधित है । ९ ग्रहों में राहु को सूर्य और चंद्र का मर्दन करनेवाला ‘अशुभ छाया’ अथवा ‘छद्म’ ग्रह कहा गया है । उसे ‘सिंहिका’ राक्षसी से उत्पन्न ‘अशुभ’ अथवा ‘पापी’ ग्रह माना जाता है ।
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ।। अर्थ : आधे शरीरवाले, अत्यंत पराक्रमी, चंद्र और सूर्य को ग्रसनेवाले, सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न राहु को मैं प्रणाम करता हूं । – आचार्य मिश्रा

राहु राजनीति, संदेह, अचानक उत्थान और पतन, अलगाववाद, अपूर्णता, अशांति, उन्माद, अश्लीलता और कलंक का कारक माना जाता है । उसका स्वभाव शनि के समान होता है । इस वर्ष वह शनि की कुंभ और मकर राशियों में बलवान होकर गोचर करेगा । ऐसी स्थिति में देश सहित विश्व में राजनीतिक अस्थिरता आने की संभावना है । राजनीति का घृणास्पद और असभ्य स्वरूप दिखाई दे सकता है । राजनेता और राजनीति कलंकित होंगे और जनता उन्हें संदेह की दृष्टि से देखेगी । विश्व, भारत और हिन्दू समाज में संदेह, शत्रुता, अलगाववाद और उपर्युक्त प्रवृत्तियां प्रबल रहेंगी । सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों में तीव्र उतार-चढाव संभव है । भू-राजनीतिक स्थिति अनिश्चित और अस्थिर रहेगी । सनातनी हिन्दू समाज पर अलगाववाद, अस्थिरता और परस्पर वैमनस्य का प्रतिकूल प्रभाव पडेगा । राष्ट्रवादी शक्तियों और राष्ट्रप्रेमी-धर्मप्रेमी वर्गों में समन्वय का अभाव दिखाई देगा । इससे राष्ट्र और समाज को एकजुट बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।
– आचार्य डॉ. अशोक कुमार मिश्रा
आगामी हिन्दू नववर्ष में ग्रहों की स्थिति !

१. ‘नए संवत (१९ मार्च २०२६ से) के प्रारंभ के ढाई महीनों तक ग्रहों के गुरु बृहस्पति कालपुरुष की कुंडली में तीसरे भाव में शत्रु राशि मिथुन में स्थित रहेंगे । बृहस्पति की यह स्थिति सांसारिक और आध्यात्मिक दृष्टि से मिश्रित परिणाम दर्शाती है । आर्थिक गतिविधियों में मंदी आने की संभावना है । नए संवत के अगले साढे नौ महीनों तक बृहस्पति कालपुरुष की कुंडली में चौथे भाव में कर्क राशि में रहेंगे । परिणामस्वरूप इस अवधि में हिन्दू समाज धार्मिकता, आध्यात्मिकता और सामाजिक सद्भाव की दिशा में तीव्र प्रगति करेगा । राष्ट्र, हिन्दू समाज और परिवार में समन्वय और एकता की भावना प्रबल होगी ।
२. नए संवत में अनुमानतः पूरे वर्ष कर्माधिपति शनि कालपुरुष की कुंडली में बारहवें भाव में बृहस्पति की मीन राशि में स्थित रहेगा । ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि और राहु राजनीति, कूटनीति, प्रौद्योगिकी व न्याय के कारक माने जाते हैं । आनेवाले हिन्दू नववर्ष में शनि की स्थिति राष्ट्र और हिन्दू समाज के राजनीतिक और तकनीकी सशक्तिकरण का संकेत देती है । हिन्दू समाज, हिन्दू संगठन और संतों को न्याय अथवा न्यायिक राहत प्राप्त होगी । इससे राष्ट्र और हिन्दू समाज मानसिक रूप से सशक्त होंगे । उनका ज्ञान, आध्यात्मिकता व धार्मिक भावना अधिक प्रबल रूप से जागृत होगी ।
३. राहु लगभग पहले ९ महीनों तक कालपुरुष की कुंडली में ११वें भाव में शनि की कुंभ राशि में रहेगा और अंतिम ३ महीनों में कालपुरुष की कुंडली के १०वें भाव में शनि की मकर राशि में रहेगा । केतु भी उपरोक्त समान अवधि में क्रमशः कालपुरुष की कुंडली के ५वें भाव में सूर्य की सिंह राशि में और चौथे भाव में चंद्र की कर्क राशि में स्थित रहेगा । कुंभ और मकर ये दोनों राशियां कर्म और श्रम के अधिष्ठाता ग्रह शनि की राशियां हैं । ज्योतिषशास्त्र में राहु को शनि के समान माना जाता है ।
४. राहु की स्थिति अत्यधिक उतार-चढाव के साथ राजनीति और कूटनीति की पराकाष्ठा को दर्शा सकती है । अंकशास्त्र पर आधारित नए संवत २०८३ के वर्षफल में बताया गया है कि ‘राहु की इस स्थिति के कारण नए और दीर्घकालीन कानूनी विवाद उत्पन्न होंगे । पुराने विवादों के समाधान में विलंब होगा । राहु समाज में तथाकथित राजनीतिक और धार्मिक पाखंड को बढावा दे सकता है । राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्रों में उतार-चढाव की संभावना है । केतु अविवेकपूर्ण कार्य करवानेवाला हो सकता है । भारत सहित पडोसी देशों में आंतरिक अशांति उत्पन्न हो सकती है ।’ – आचार्य मिश्रा
कुंभ और मकर ये दोनों राशियां कर्म और श्रम के अधिष्ठाता ग्रह शनि की राशियां हैं । ज्योतिषशास्त्र में राहु को शनि के समान माना जाता है । – आचार्य मिश्रा
नए वर्ष में हिंदू संगठन को बढाना समय की आवश्यकता है !

राष्ट्र, राज्य, संगठन, परिवार और अन्य सामाजिक समूहों के नेताओं को अपने समूहों को एकजुट और लक्ष्य केंद्रित बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए । बृहस्पति ग्रह से उत्पन्न सकारात्मकता का लाभ उठाकर आध्यात्मिक साधना में संलग्न रहते हुए समाज को अधिक धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास करना चाहिए । प्रतिकूल और अनुकूल दोनों परिस्थितियों में आध्यात्मिक साधना ही सुरक्षा और प्रगति का मूल साधन है । मुझे आशा है कि ग्रहों के मिश्रित संकेतों के बावजूद राष्ट्र और सभी सनातनी हिंदुओं के जीवन में नया हिंदू नववर्ष नई चेतना, नई ऊर्जा और नया उत्साह लाएगा । भारत और हिंदू समाज धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से अपेक्षा के अनुसार अधिक सशक्त और सक्षम बनेगा । कालातीत परंपरा के अनुसार मानवता को नई दिशा प्रदान करेगा ।’
– आचार्य डॉ. अशोक कुमार मिश्रा
राष्ट्र और हिन्दू धर्म पर प्रतिकूल प्रभाव !
२५ अप्रैल २०२६ को युद्ध के कारक ग्रह और ग्रहों में ‘सेनापति’ कहे जानेवाले मंगल के उदय के उपरांत युद्धोन्माद और अशांति बढने की संभावना है । ज्योतिषीय दृष्टि से अन्य ग्रह सूर्य, बुध और शुक्र की स्थिति राष्ट्र और हिन्दू समाज के लिए कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक रहेगी । अर्थात औसतन परिणाम मिश्रित रहेंगे ।
इस प्रकार ज्योतिषीय दृष्टिकोण से संक्षेप में कहा जा सकता है कि नए हिन्दू वर्ष संवत २०८३ में संपूर्ण विश्व, राष्ट्र और हिन्दू समाज में संदेह, वैर और अलगाववाद जैसी प्रवृत्तियां प्रबल रहेंगी । सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों में तीव्र उतार-चढाव संभव है । भू-राजनीतिक स्थिति अनिश्चित और अस्थिर रहेगी । सनातन हिन्दू समाज पर अलगाववाद, अस्थिरता और आंतरिक वैमनस्य का प्रतिकूल प्रभाव पडेगा । राष्ट्रवादी शक्तियों तथा राष्ट्र और धर्म प्रेमी लोगों में एकता का अभाव दिखाई दे सकता है । ऐसी स्थिति में राष्ट्र और समाज को एकजुट बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।
जयतु ! मंगलम् भवतु ! शुभमस्तु !
– आचार्य डॉ. अशोक कुमार मिश्रा, सभापति, विश्व ज्योतिष महासंघ, बिहार.
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