स्त्रीरोग एवं आयुर्वेद लेखन
वर्तमान आधुनिक जीवनशैली में स्त्रियों में वजन बढने की समस्या गति से बढती हुई दिखाई दे रही है । यह समस्या केवल बाह्य सौंदर्य तक सीमित नहीं है, अपितु वह स्त्रियों के स्वास्थ्य पर तथा विशेषकर स्त्रीरोगों के बढने का बडा कारण बन रही है । वजन बढने के कारण मासिक धर्म में अनियमितता, मासिक धर्म का बंद होना, ‘पॉलीसिस्टिक ओवैरियन सिंड्रोम (पी.सी.ओ.एस.)’, ‘हार्मोनल’ (संप्रेरक) असंतुलन, गर्भधारणा में समस्याएं, साथ ही मानसिक तनाव की समस्याएं बार-बार दिखाई देती हैं ।

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१. आयुर्वेद के अनुसार वजन बढने के कारण एवं लक्षण
आयुर्वेद के अनुसार ‘वजन बढना शरीर में विद्यमान दोष, धातु एवं अग्नि के असंतुलन के कारण उत्पन्न होनेवाली अवस्था है । आयुर्वेद में वजन बढने को शरीर में मेदधातु का स्तर बढना’ माना जाता है । जब जठराग्नि धीमी पड जाती है, तब अन्न का पूर्णरूप से पाचन नहीं होता व उससे शरीर में आम तैयार होता है । आम तथा कफदोष के बढने के कारण शरीर में चर्बी संग्रहित होने लगती है । ‘चरक संहिता’ में ‘मेद बढने के कारण कफदोष बढता है’, ऐसा स्पष्ट बताया गया है । उसके कारण वजन बढना केवल आहार के कारण नहीं है, अपितु संपूर्ण चयापचय प्रक्रिया में बिगाड होने का लक्षण माना जाता है । स्त्रियों में वजन बढने के कुछ विशिष्ट लक्षण दिखाई देते हैं । बहुत शीघ्र थकान होना, शरीर में भारीपन प्रतीत होना, मासिक धर्म विलंब से आना अथवा अनियमित आना, रक्तस्राव में परिवर्तन होना, चेहरे पर मुंहासे आना, बाल झडना, पेट एवं जंघाओं पर चर्बी बढना, साथ ही गर्भधारण में समस्याएं आना; ये महत्त्वपूर्ण लक्षण माने जाते हैं । अनेक बार ‘पी.सी.ओ.एस.’ अथवा ‘हार्मोनल’ असंतुलन से ग्रस्त स्त्रियों में वजन बढना, यह मुख्य शिकायत होती है ।
आयुर्वेद के अनुसार वजन बढने के पीछे अनेक कारण होते हैं, उदा. भारी, मीठे तथा तले हुए अन्नपदार्थाें का अधिक मात्रा में सेवन करना, शारीरिक गतिविधियों का अभाव, मानसिक तनाव, नींद पूरी न होना, दिन में सोने की आदत एवं अनियमित आहार-विहार, इन कारणों से कफदोष बढता है, साथ ही आर्तव वह स्रोतस एवं मेदोवह स्रोतस में अवरोध उत्पन्न होने से स्त्रीरोग समस्याएं और बढती हैं ।
२. आयुर्वेद के अनुसार चिकित्सा एवं औषधियां

आयुर्वेद चिकित्सा करते समय केवल वजन न्यून करने पर बल नहीं दिया जाता, अपितु वैद्यगण रोगी की प्रकृति, पाचनक्षमता, मासिक धर्म का इतिहास, मानसिक स्थिति, साथ ही ‘हार्मोनल’ लक्षणों का गहन अध्ययन कर उपचार सुनिश्चित करते हैं । आयुर्वेद में दोष असंतुलन एवं अग्नि सुधार, इस उपचार का मुख्य उद्देश्य है । औषधीय उपचार में वैद्यकीय परामर्श से त्रिफला, गुग्गुल, कांचनार गुग्गुल, लोध्र एवं अशोक जैसी औषधियां दी जाती हैं । कुछ रोगियों में शिलाजीत अथवा अन्य औषधीय योगों का उपयोग किया जाता है । पंचकर्म उपचारों में उद्वर्तन, वमन एवं बस्ती, ये प्रक्रियाएं उपयोगी सिद्ध होती हैं । इन उपचारों के कारण शरीर में स्थित कफ एवं मेद अल्प होने में सहायता मिलती है, साथ ही ‘हार्मोनल’ संतुलन में सुधार आता है ।
घरेलु स्तर पर कुछ सुलभ उपाय भी उपयोगी सिद्ध होते हैं । सवेरे गुनगुना पानी पीना, भोजन के पश्चात अल्प मात्रा में त्रिकट चूर्ण लेना, नियमित पैदल चलना अथवा सूर्यनमस्कार करना, रात में शीघ्र भोजन करना तथा दिन में सोना टालना, इनके कारण वजन नियंत्रण में रहने में सहायता मिलती है, साथ ही प्रक्रिया किए हुए पदार्थ, अधिक मात्रा में चीनी एवं ठंडे पेय टालना आवश्यक है । आहार में जवार, बाजरा, हरी सब्जियां, दालें एवं छाछ का समावेश करना लाभकारी सिद्ध होता है । गुनगुना पानी पीने की आदत डालना पाचन सुधारने में उपयुक्त होता है । संतुलित आहार, नियमित व्यायाम एवं उचित दिनचर्या, इन बातों को आयुर्वेद में महत्त्वपूर्ण माना गया है ।
३. वजन नियंत्रण में रहे; इसके लिए…
वजन बढना स्त्रीरोगों की मूल समस्या नहीं है, अपितु वह शरीर में स्थित दोषों के असंतुलन का लक्षण है । आयुर्वेद स्त्री के संपूर्ण शरीर एवं मन के संतुलन पर बल देता है । उचित उपचार, आहार एवं जीवनशैली अपनाने से वजन नियंत्रण में रहता है तथा कुल मिलाकर स्त्रियों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है ।
– वैद्या (श्रीमती) सारिका नीलेश लोंढे, ‘निर्विकार आयुर्वेद हॉस्पिटल’, भोसरी, पुणे
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