वर्तमान में अनियमित मासिक धर्म आना अनेक स्त्रियों में दिखाई देनेवाली सामान्य; परंतु उपेक्षित समस्या है । मासिक धर्म को स्त्री के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का दर्पण माना जाता है । मासिक धर्म यदि समय पर, पीडामुक्त तथा उचित मात्रा में न आता हो, तो शरीर में कुछ तो असंतुलन होने का वह संकेत होता है । परिवर्तित जीवनशैली, अनियमित आहार, नींद का अभाव तथा ‘हार्मोनल’ (संप्रेरक) परिवर्तनों के कारण यह समस्या बढती हुई दिखाई देती है ।

१. अनियमित मासिक धर्म
सामान्यतः २१ से ३५ दिन के अंतर से मासिक धर्म आना नियमित माना जाता है । कुछ महिलाओं में मासिक धर्म विलंब से आता है, कुछ महिलाओं में बहुत शीघअ आता है, तो कभी कभी पूरे महिने तक आता ही नहीं । मासिक धर्म की अवधि में कुछ स्त्रियों को बडी मात्रा में, तो कुछ महिलाओं को बहुत अल्प मात्रा में रक्तस्राव होता है । मासिक धर्म के समय तीव्र उदरशूल, कमरदर्द, रक्त के थक्के जाना, थकान होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं । इन सभी को एकत्रितरूप से ‘अनियमित मासिक धर्म’ कहा जाता है ।
२. वात, पित्त एवं कफ इन ३ दोषों के संतुलन पर मासिक धर्म की नियमितता निर्भर
आयुर्वेद में मासिक धर्म को ‘आर्तव’ अथवा ‘रज’ कहा जाता है । आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त एवं कफ इन ३ दोषों के संतुलन पर मासिक धर्म की नियमितता निर्भर होती है । वातदोष उत्पन्न होने से मासिक धर्म विलंब से आना, पीडा होना अथवा अल्प रक्तस्राव होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं । पित्तदोष बढने से अधिक रक्तस्राव, जलन, गर्मी एवं चिडचिडाहट प्रतीत होती है । कफदोष बढने से मासिक धर्म विलंब से आना, शरीर में भारीपन, सूजन तथा वजन बढने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं ।
वैद्या (श्रीमती) सारिका नीलेश लोंढे का परिचय

वैद्या सारिका नीलेश लोंढे ‘एम.डी. आयुर्वेद’ एवं योगशिक्षिका हैं तथा वे पिंपरी-चिंचवड, पुणे में कार्यरत हैं । वे आयुर्वेद में अनुभवी एवं परिवार चिकित्सक हैं । उन्हें आयुर्वेद एवं पंचकर्म चिकित्सा का १३ वर्षाें का ‘क्लिनिकल’ (चिकित्सकीय) अनुभव है । वे ‘निर्विकार आयुर्वेद हॉस्पिटल, भोसरी’ इस सुसज्जित आयुर्वेद चिकित्सालय की संस्थापिका एवं निदेशक हैं । इस चिकित्सालय में बाह्य रुग्ण एवं आंतरिक रोगी विभाग, पंचकर्म विभाग, साथ ही ‘सी.जी.एच.एस.’ (सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम – केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजना), ‘ई.सी.एच.एस.’ (एक्स सर्विसमैन काँट्रिब्युट्री हेल्थ स्कीम – पूर्व सैनिक अंशदायक स्वास्थ्य योजना) तथा अन्य अनेक प्रतिष्ठानों की ‘कैशलेस’ (नकदरहित) सुविधा से युक्त पुणे जिले के पिंपरी-चिंचवड का पहला चिकित्सालय है तथा लगभग ५ सहस्र चौरस फुट क्षेत्रफल में वर्ष २०१८ से उक्त सेवाएं दी जा रही हैं ।
स्त्रीरोग, संतानहीनता, दीर्घकालीन बीमारियां एवं पंचकर्म के क्षेत्रों में उनका विशेष कार्य है । उन्होंने ‘आयुर्वेद एवं संतानहीनता’, इस विषय पर डॉक्टरों के लिए व्याख्यान दिए हैं तथा सामान्य लोगों का भी स्वास्थ्य के संबंध में मार्गदर्शन किया है । वे ‘महाराष्ट्र आयुर्वेद सम्मेलन, पिंपरी-चिंचवड’ की उपाध्यक्षा के रूप में कार्यरत हैं । ‘निमा वूमेंस फोरम, पिंपरी-चिंचवड’ की वे संयुक्त सचिव हैं । गैरसरकारी संगठन ‘अविरत श्रमदान’ के सचिव के रूप में वे सामाजिक एवं स्वास्थ्य जनजागरण के कार्य में सक्रिय हैं । वे ‘रोटरी क्लब ऑफ उद्योगनगरी’ की अभिमानी सदस्या हैं ।
३. मासिक धर्म की समस्याओं के लिए आयुर्वेद के उपचारों का मुख्य उद्देश्य
अनियमित मासिक धर्म के संबंध में आयुर्वेद संपूर्ण शरीर का विचार करता है । केवल बच्चेदानी अथवा ‘हार्माेंस’ नहीं, अपितु पाचनक्षमता, रक्त की गुणवत्ता, मन की स्थिति, दिनचर्या एवं आहार इन सभी का एकत्रित विचार किया जाता है । पाचनक्षमता दुर्बल हो, शरीर में आम संग्रहित हुआ हो अथवा निरंतर मानसिक तनाव हो, तो उसका सीधा परिणाम मासिक धर्म पर होता है ।
आयुर्वेद के उपचारों का मुख्य उद्देश्य ‘शरिर में समाहित दोषों को संतुलित करना, पाचनक्षमता में सुधार करना तथा प्राकृतिक पद्धति से मासिक धर्म को नियमित बनाना’ होता है । स्त्रीरोगों के संबंध में आयुर्वेद में ‘अशोक’, ‘लोध्र’, ‘शतावरी’, ‘कुमारी (एलोवेरा) जैसी औषधि वनस्पतियां विशेष उपयोगी मानी जाती हैं । ‘अशोकारिष्ट’, ‘कुमारी आसव’, ‘लोध्रासव’, ‘शतावरी कल्प’ जैसी औषधियां वैद्य के सुझाव से ली जाएं, तो उनसे अच्छा लाभ मिलता है ।
४. मासिक धर्म नियमित आने के लिए घरेलु उपाय
इस समस्या में घरेलु उपाय भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं । सवेरे गुनगुना पानी पीना, आहार में तील एवं गूड का समावेश करना; जीरा, धनिया एवं सौंफ का काढा पीना, रात में गुनगुने दूध में घी डालकर पीना जैसे उपाय मासिक धर्म को नियमित होने में सहायकारी सिद्ध होते हैं । अति ठंडे पदार्थ, जंक फूड (पिज्जा, बर्गर), अति तीखा तथा तैलीय अन्न टालना आवश्यक होता है ।

५. नियमित मासिक धर्म आने के लिए उपयुक्त योगासन
योग, प्राणायाम एवं ध्यान का नियमित अभ्यास करने से मानसिक तनाव अल्प होता है तथा ‘हार्मोनल’ संतुलन में सुधार आता है । भुजंगासन, धनुरासन एवं पवनमुक्तासन जैसे योगासन मासिक धर्म के लिए उपयुक्त माने जाते हैं । पर्याप्त नींद लेना, नियमित दिनचर्या एवं सकारात्मक मानसिकता की भी इसमें बडी भूमिका होती है ।
६. मासिक धर्म प्राकृतिकरूप से नियमित होने हेतु …
कुल मिलाकर अनियमित मासिक धर्म केवल शारीरिक समस्या नहीं है, अपितु वह शरीर एवं मन के असंतुलन का लक्षण है । आयुर्वेद इस समस्या की ओर समग्र दृष्टिकोण से देखता है । उचित आहार, उचित जीवनशैली, मानसिक शांति, आयुर्वेदिक औषधियां एंव घरेलु उपायों का समन्वय किया जाए, तो मासिक धर्म प्राकृतिक पद्धति से होकर स्त्री का स्वास्थ्य अच्छा बना रह सकता है ।
– वैद्या (श्रीमती) सारिका नीलेश लोंढे, निर्विकार आयुर्वेद हॉस्पिटल, भोसरी, पुणे. (४.१.२०२६)
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