संपादकीय : आत्मनिर्भरता से साध्य की गई ‘क्रिटिकैलिटी’ !

तमिलनाडु के कल्पक्कम् के ‘प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर’ ने ‘क्रिटिकैलिटी’ साध्य की है, जो भारत के लिए अत्यंत गर्व का विषय है । परमाणु परियोजना तथा उसके कार्य से संबंधित वैज्ञानिक परिभाषा सामान्य लोगों की समझ में आना थोडा कठिन होता है । उसमें भी ‘किसी परियोजना द्वारा क्रिटिकैलिटी’ साध्य करने से हमारे जीवन में इससे क्या अंतर आएगा ?’, यह उचित प्रश्न भी उठ सकता है । सरल भाषा में बताना हो, तो जब कोई परमाणु भट्टी ‘क्रिटिकल’ बन जाती है, तब माना जाता है कि ‘उसमें स्थित शृंखला प्रक्रिया’ स्वचालित एवं स्थिर हुई है ।’ सरल भाषा में बताना हो, तो यह ऐसी स्थिति होती है, जहां ईंधन से मिलनेवाली ऊर्जा एवं उपयोग की जानेवाली ऊर्जा में संतुलन बनाया जाता है । इससे परमाणु भट्टी स्थिर पद्धति से बिजली का उत्पादन कर सकती है । वर्तमान में अमेरिका एवं ईरान के युद्ध के कारण ईंधन का जो अभाव हुआ, वह सर्वविदित है । उसके कारण भारत बिजली उत्पादन के क्षेत्रों का विस्तार कर रहा है । इस पृष्ठभूमि पर कल्पक्कम् की परमाणु परियोजना ने जो साध्य किया है, वह ऐतिहासिक है । भारत के पास यूरेनियम के भंडार बहुत अल्प हैं । उसका उपयोग बिजली उत्पादन एवं औषधियों की निर्मिति के क्षेत्र में अति आवश्यक है । यूरेनियम अति अल्प होने से हमें अन्य देशों से उसका आयात करना पडता है । भले ही ऐसा हैं; परंतु तब भी विश्व के थोरियम के कुल भंडारों में से २५ प्रतिशत भंडार अकेले भारत के पास है । सामान्य परमाणु भट्टियों में थोरियम का सीधे उपयोग नहीं किया जा सकता । ‘क्रिटिकैलिटी’ साध्य करने का अर्थ नई परमाणु परियोजनाओं में थोरियम का उपयोग करने की दिशा में उठाया गया सबसे बडा कदम है । एक बार जब हमने थोरियम का उपयोग करना आरंभ किया, तो भारत को बिजली उत्पादन के लिए अन्य किसी भी देश पर निर्भर करने की आवश्यकता नहीं होगी । इस प्रक्रिया में परमाणु भट्टियों में जितने ईंधन का उपयोग किया जाएगा, उससे भी अधिक ईंधन इस परियोजना में तैयार होनेवाला है । अब तक केवल रूस ने ही परमाणु कार्यक्रम चलाकर इस प्रकार की ‘क्रिटिकैलिटी’ साध्य की है । इससे हमारे वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों द्वारा इस क्षेत्र में ली गई ऊंची उडान हमारे ध्यान में आएगी ।

भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में रखा यह बडा कदम देखने के लिए आज भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी भाभा होने चाहिए थे । डॉ. होमी भाभा ने वर्ष १९५४ में ‘यूरेनियम के अभाव तथा थोरियम के विपुल भंडार’ की पहेली हल की थी तथा अपनी दूरदृष्टि से ऊर्जानिर्मिति के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए ३ चरणोंवाला परमाणु कार्यक्रम चलाया था । कल्पक्कम् परियोजना में जो साध्य हुआ है, वह परमाणु कार्यक्रम का दूसरा चरण था ।

प्रतिबंधों के नाम पर शोषण

वर्तमान में विश्व भारत की इस सफलता की ओर आश्चर्यचकित होकर देख रहा है; क्योंकि जो कार्य विकसित देशों को करना संभव नहीं हुआ, उसे भारत ने कर दिखाया । इस चरण तक पहुंचने का मार्ग अनेक चुनौतियों से भरा हुआ था । अमेरिका ने अनेक पाश्चात्य देशों को साथ लेकर ‘भारत का यह परमाणु कार्यक्रम परमाणु हथियारों की निर्मिति के लिए है’, यह दुष्प्रचार चलाकर इस कार्यक्रम में बाधा लाने का प्रयास किया । भारत ने वर्ष १९७४ में पहला परमाणु परीक्षण किया । उसके कारण भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए । उसके उपरांत वर्ष १९९८ में दूसरा परमाणु परीक्षण किया गया । भारत की इस क्षेत्र में प्रगति देखकर पाश्चात्यों का खून खौल उठा । परमाणु आपूर्ति समूहों की ओर से भारत पर ‘परमाणु प्रसार बंदी समझौते’ पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया; परंतु भारत इसे घास नहीं डाल रहा है, यह देखकर यह नियम बनाया गया कि ‘विश्व का कोई भी देश भारत को यूरेनियम अथवा परमाणु से संबंधित कोई भी यंत्रसामग्री न बेचे ।’ केवल इतना ही नहीं, अपितु परमाणु भट्टी के लिए आवश्यक विशेष स्टील, अतिप्रगत संगणक एवं ‘फास्ट ब्रीडर रिएक्टर’ के लिए आवश्यक जटिल पुर्जे भारत को मिलने बंद हुए । इसे किसी प्रकार से बनाया जा सकता है; परंतु तकनीक का क्या होगा ? भारतीय वैज्ञानिकों को विदेश जाकर इस तकनीक की शिक्षा लेने पर अथवा वहां की प्रयोगशालाओं का उपयोग करने पर भी प्रतिबंध लगाया गया । इन प्रतिबंधों के कारण भारत को अपनी तकनीक विकसित करने में समय तो लगा; परंतु उसके कारण वर्तमान में भारत किसी देश पर निर्भर नहीं है । भारत के लिए सभी मार्ग बंद हुए; परंतु संगठित रूप से किए गए अपार परिश्रम संयम, दृढता एवं आत्मविश्वास के बल पर भारत ने सभी देशों की नाक में दम कर सफलता प्राप्त की !

दुर्दम्य इच्छाशक्ति

परमाणु अनुसंधान और विद्युत उत्पादन केंद्र

इस परमाणु कार्यक्रम में सबसे बडी चुनौती परमाणु भट्टी की रचना की निर्मिति थी । यह रचना इतनी जटिल थी कि उसमें समाहित ८ विभिन्न इमारतों को एक ही बडी नींव पर खडा करना था । बस हमारे अभियंता एवं विशेषज्ञ इस काम में लग गए ! कल्पक्कम् के ‘इंदिरा गांधी परमाणु शोध केंद्र’ के वैज्ञानिकों ने सहस्रों रातें जागकर इस परमाणु भट्टी का मानचित्र बनाया और उसके उपरांत यह परमाणु भट्टी बनकर तैयार हुई । सोडियम के परिवहन के लिए आवश्यक विशाल पंप भारत में उपलब्ध नहीं थे व अन्य देशों ने भी उन्हें देने से मना कर दिया था । अंततः भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वयं ही ये पंप एवं यंत्रसामग्री विकसित की । इसमें यदि थोडी सी भी त्रुटि रह जाती, तो संपूर्ण परियोजना ही संकट में पड सकती थी ।

भारत के वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों एवं अभियंताओं का परस्पर समन्वय तथा अनेक निजी प्रतिष्ठानों ने दिए उनके साथ के कारण कल्पक्कम् परमाणु भट्टी खडी रही । यह यात्रा वास्तव में रोमांचक एवं अद्भुत थी । ‘लार्सन एंड टुब्रो’ प्रतिष्ठान ने ‘रिएक्टर’ का मुख्य पात्र बनाया । यह पात्र इतना विशाल था कि उसे सडक से ले जाना असंभव था; इसलिए उसे समुद्री मार्ग से कल्पक्कम् ले जाया गया । इसके निर्माण में १ मिलीमीटर की त्रुटि भी अस्वीकार्य थी । इस कार्य में ‘वालचंद नगर इंडस्ट्रीज’, ‘गोदरेज’ प्रतिष्ठान का योगदान भी भुलाया नहीं जा

सकता । इस ध्येय को साध्य करने में अनेक बाधाएं आईं तथा असफलता भी हाथ लगी; परंतु उसे पीछे छोडकर हमारे वैज्ञानिक तथा उनका साथ देनेवाले सभी हताश हुए बिना पुनः नई ऊर्जा के साथ कार्य में जुट

गए । अनेक बार अपनी चूकों से सीखकर व नए सिरे से कार्य प्रारंभ कर उन्होंने सफलता प्राप्त की । ‘देश के लिए कुछ करना है तथा भारत को उच्च शिखर तक पहुंचाना है’, इस ध्येय से प्रेरित होकर असाध्य को भी साध्य कर दिखाया ।

वर्तमान में हमारे देश में फिल्मी अभिनेताओं एवं क्रिकेट खिलाडियों को सिर पर बिठाया जाता है; परंतु हमारा समाज देश के लिए बिना किसी शोर-शराबे के मौन रहकर इस कार्य में अतुलनीय योगदान देनेवाले भारतीय वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों एवं अभियंताओं का मान-सम्मान नहीं करता । जब समाज ऐसे लोगों का मूल्य समझकर उनका आदर्श सामने रखेगा, तभी वास्तविक अर्थाें में भारत का उत्कर्ष होगा !

भारत को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाने के लक्ष्य से यदि हम प्रेरित हो जाएं, तो कुछ भी असंभव नहीं है !