
मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला वास्तव में वाग्देवी का मंदिर है, यह बात भोजशाला के संदर्भ में इंदौर उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से स्पष्ट हो गई है । वास्तव में यह सत्य इतना प्रत्यक्ष है कि कोई अंधा व्यक्ति भी राजा भोज द्वारा निर्मित इस स्थल के पत्थरों को स्पर्श कर इसे मंदिर बता सकता है, किंतु भारतीय लोकतंत्र में यह भी सिद्ध करना पडा। लोकतांत्रिक संघर्ष में अंततः वाग्देवी के भक्तों की विजय हुई । वसंत पंचमी जैसे पावन दिन पर भी हिंदुओं को पूजा के अधिकार हेतु सडक से न्यायालय तक संघर्ष करना पडा । जबकि वहां सरकारी सुरक्षा में नमाज पढी जा रही थी । भारत के हिन्दुओं की यह दयनीय स्थिति माता शारदा ने भी अवश्य देखी होगी । इसलिए वहां के प्रत्येक पत्थर ने देवी सरस्वती के अस्तित्व के प्रमाण प्रस्तुत किए ।

यह न्यायालयीन विजय संयमपूर्वक पूजा-अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले हिन्दुओं, आंदोलनकारियों तथा न्यायालय में लडाई लडने वाले अधिवक्ताओं की है । इसका श्रेय किसी अन्य को नहीं दिया जा सकता । राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो यह बहुत पहले संभव हो सकता था, किंतु आज यह धर्मनिष्ठ हिन्दुओं के संघर्ष के कारण संभव हुआ है । वाग्देवी की मूर्ति वहां पुनः प्रतिष्ठित होने तक यह संघर्ष चलता रहेगा ।
हिन्दुओं ने राम मंदिर अयोध्या के लिए ५०० वर्षों तक संघर्ष किया, भोजशाला के लिए १०० वर्षों तक संघर्ष किया, फिर भी काशी विश्वनाथ मंदिर तथा श्री कृष्ण जन्मभूमि की पूर्ण मुक्ति अभी शेष है । वास्तव में इतने वर्षों तक भोजशाला में हिन्दुओं को सीमित पूजा-अधिकार मिलना एवं वहां नमाज पढी जाना, स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं की आस्था का अपमान है । हिन्दुओं के श्रद्धास्थलों पर अधिकार जमाने में कट्टरपंथियों को भय नहीं लगता, क्योंकि व्यवस्था ही उन्हें ऐसा करने देती रही है । अब तो व्यवस्था की जडता समाप्त हो एवं हिन्दुओं की आस्था के विषय में झूठे अधिकार की बात करने वालों को दंड मिले तथा उन्हें संरक्षण देने वालों पर भी कठोर कार्यवाही हो, यही माता वाग्देवी के चरणों में प्रार्थना है ।
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