संपादकीय : ‘गोमाता’ को न्याय कब मिलेगा ?

७ नवंबर १९६६ ! वह दिन जब बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं का गला घोंटा गया । वह ऐसा समय था, जब हिन्दू-विरोधी कांग्रेसी सत्ता की छाया इस हिन्दू देश पर थी । ‘देशव्यापी गोहत्या बंदी कानून’ बनाने की मांग को लेकर ‘सर्वपक्षीय गो-रक्षण अभियान समिति’ के नेतृत्व में लाखों साधु-संत और धर्मप्रेमी हिन्दू संगठित हुए थे । महात्मा रामचंद्र वीर जैसे कुछ संतों ने पूरे १६६ दिन तक आमरण अनशन किया था । फिर भी केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार ने उनकी न्यायसंगत मांगों को पूरा नहीं किया । लाखों हिन्दुओं ने संसद की ओर कूच किया । कांग्रेस की निर्दयी पुलिस ने इस हिन्दू जनसमुदाय पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं । सरकारी आंकडों के अनुसार ७ – ८ संत मारे गए । अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव थे । कहा जाता है कि ‘इंदिरा गांधी इस विषय को अधिक बढने नहीं देना चाहती थीं, इसलिए रात के अंधेरे में अनेक मृतदेहों को पुलिस ने ठिकाने लगा दिया ।’ तत्कालीन भारतीय जनसंघ ने मृतकों की संख्या २०० बताई, जबकि कई लोग इसे ५ हजार तक बताते हैं । यह हिन्दुओं का नरसंहार ही था, चाहे मृतकों की संख्या ७ हो, २०० हो अथवा ५ हजार; क्योंकि उन्हें ‘हिन्दू’ होने के कारण मारा गया । गोहत्या बंदी के विषय का अध्ययन करने के लिए ‘सरकारी समिति’ बनाई गई; परंतु बाद में उसका विघटन हो गया और उससे कोई भी रिपोर्ट सामने नहीं आई ।

श्री. सतीश कुमार, राष्ट्रीय अध्यक्ष गौरक्षा दल

नि:स्पृह भावना !

कई लोगों को लगेगा कि ६० वर्ष पहले की इस घटना को बताने का क्या उद्देश्य है ? तो यह प्रश्न ही तर्कसंगत नहीं है । १०० करोड हिन्दुओं के देश में स्वतंत्रता को ८ दशक होनेवाले हैं, तब भी हिन्दुओं की प्राणप्रिय गोमाता का राज्यसत्ता द्वारा संरक्षण नहीं हो रहा, यह एक विडंबना है । ‘गोहत्या करनेवाले दिन-दहाडे गायों की अवैध तस्करी करते हैं । कानून-व्यवस्था की रक्षक पुलिस ऐसे समय हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहती है’, ऐसा अनुभव पंजाब गोरक्षक दल के नेता सतीश प्रधान जैसे अनेक लोग कई मंचों से व्यक्त कर चुके हैं । इस कारण सैकडों घटनाओं में हिन्दू भाइयों को अपनी जान जोखिम में डालकर गोहत्या करनेवालों से अपनी मां समान गाय की रक्षा करनी पडती है । अंग्रेजी समाचार-पत्र ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार वर्ष २०१६ में केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही गोरक्षकों के लगभग २०० समूह सक्रिय थे । अनेक बार भारत का तथाकथित ‘इंटेलेक्चुअली एलीट’ (बौद्धिक अभिजात वर्ग) इन गोरक्षकों की निंदा करता है । गोहत्या के संदेह में एक ‘अखलाक’ की कथित सामूहिक हत्या के आधार पर गोरक्षकों को ‘असहिष्णु’ कहा गया और उससे ‘पुरस्कार वापसी’ का नाटक रचा गया, जिसे गौ प्रेमी देश भूल नहीं पाया है । वास्तव में गोरक्षकों के मन की भावना अत्यंत निःस्पृह होती है । ‘मेरी माता, जिसके शरीर में ३३ करोड देवताओं का निवास है, उस गाय की रक्षा होनी ही चाहिए !’ ‘हिन्दुओं की इस आर्त भावना को कानूनी संरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता ?’, ‘हिन्दुओं को अपने ही देश में गाय की रक्षा के लिए कानून हाथ में लेने के लिए विवश क्यों किया जाता है ? इसका दोष गोरक्षकों का है अथवा शासकों का ?’ ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न हैं ।

मोर्चाबंदी !

फिर भी आंदोलन का मार्ग अपनाना, जो लोकतंत्र ने हमें एक साधन के रूप में दिया है, उसे छोडना नहीं चाहिए । कोई भी आंदोलन यदि निष्कपट और निःस्पृह हो, तो उससे व्यापक जागरूकता उत्पन्न होती है । साथ ही उसके सफल होने की संभावना भी बढ जाती है । इसका कारण यह है कि ऐसे आंदोलनों को ईश्वर का समर्थन प्राप्त होता है, ऐसा समर्थ रामदासस्वामीजी ने कहा है । ‘१९८० के दशक के ‘गंगा मुक्ति आंदोलन’ और ‘श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन’ के उपरांत से हिन्दू समाज ने ब्राह्म और क्षात्र तेज से युक्त आंदोलन नहीं देखा’, ऐसा प्रसिद्ध लेखक मयंक जैन कहते हैं । आज हिन्दुओं की गो-रक्षा की मांग पुनः उसी उत्साह के साथ उभर रही है । उस समय की भारतीय जनसंघ आज भाजपा के रूप में देश की सत्ता चला रही है । हिन्दुत्वनिष्ठ भाजपा को अब हिन्दुओं की यह मांग पूरी करनी चाहिए, ऐसा मत कई राज्यों द्वारा व्यक्त किया जा रहा है । इसके लिए भारत के हजारों साधु-संतों ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने हेतु अपना सर्वस्व अर्पित करने की नई मोर्चाबंदी आरंभ कर दी है ।

गौसम्मान होना ही चाहिए !

‘गौसम्मान आवाहन अभियान’ यह इस पूर्णतः अराजनीतिक आंदोलन का नाम है और इसके माध्यम से आज केवल साधु-संत ही नहीं, अपितु हजारों युवक-युवतियां भी इसमें कूद पडे हैं । अभियान से जुडे मथुरा के परम गोभक्त संत पूज्य गोपेश बाबा महाराज ने सनातन प्रभात को बताया कि ‘इस अभियान को हिन्दुओं के देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त है तथा विभिन्न आचार्य, गोसंत, गोभक्त, गोसेवक, गोपालक और गोप्रेमी इसमें सेवा दे रहे हैं ।’

मथुरा के परम गोभक्त संत पूज्य गोपेश बाबा महाराज

इस कार्यकारिणी से स्पष्ट होता है कि यह अभियान ईश्वरीय अधिष्ठान से परिपूर्ण है । इसकी प्रमुख मांगें हैं – ‘गोमाता को राष्ट्रमाता, राष्ट्रदेव का दर्जा दिया जाए’, ‘गोसेवा के लिए केंद्र स्तर पर कानून बनाया जाए’ और ‘भारतवर्ष में गोहत्या पूर्णतः बंद की जाए ।’ यह अभियान देश के ५ हजार तहसीलों में जाकर इस विषय को पहुंचाएगा । २७ अप्रैल २०२६ को देशभर के ५ हजार तहसीलों से तहसीलदारों को उपरोक्त मांगों के ज्ञापन मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नाम सौंपे गए हैं । यदि मांगें स्वीकार नहीं की गईं, तो हर ढाई महीने में क्रमशः जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञापन दिए जाएंगे । इस पर भी यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो गोसंत और गोभक्त आमरण अनशन प्रारंभ करेंगे । इसमें किसी का निधन हो जाता है, तो उनकी जगह अन्य गोसंत-गोभक्त लेंगे । यह अभियान निःस्वार्थ है, क्योंकि इसके लिए किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मांगी गई है । इतना ही नहीं, यदि कोई इस अभियान के नाम पर दान मांगता है, तो उसके विरुद्ध शिकायत करने की व्यवस्था भी की गई है । संक्षेप में, यह भविष्य का एक व्यापक जनआंदोलन है ।

कानूनी दृष्टि से गोहत्या-निषेध कानून के समक्ष कुछ बाधाएं हैं । जैसे, ‘गायों का संरक्षण केंद्र का नहीं, अपितु राज्य का विषय होना’, ‘संविधान के अनुच्छेद ४८ के अनुसार गोरक्षा की व्यवस्था निर्देशात्मक सिद्धांतों में आती है, न कि मूल अधिकारों में’ आदि । तथापि, जो सरकार असंभव प्रतीत होनेवाले अनुच्छेद ३७० को समाप्त कर सकती है, वह गोहत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध भी लागू कर सकती है । यह भी स्मरण रखें कि हिन्दू धर्मदर्शन में गोहत्या को पाप माना गया है । मनुस्मृति, ऋग्वेद, अथर्ववेद, महाभारत आदि धर्मग्रंथों में गाय के दैवीय महत्त्व का वर्णन मिलता है । किसी भी परिस्थिति में अब हिन्दुओं को संगठित होकर सांप्रदायिक भेदभाव को भूलकर गोरक्षा के इस राष्ट्रव्यापी अभियान में स्वयं को समर्पित करना चाहिए । यह केवल समय की मांग ही नहीं, अपितु धार्मिक कर्तव्य भी है । इस राष्ट्रोत्थान के कार्य के लिए यथाशक्ति आगे आएं !

हिन्दुओ, ‘गोमाता’ को न्याय दिलाने के लिए सांप्रदायिक भेदभाव को भुलाकर यथाशक्ति जनआंदोलन में सहभागी हों !