भारतीय संस्कृति एवं (हिन्दू) धर्म भारत की आत्मा हैं ! – Karnataka High Court

  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने शंकराचार्य जयंती हेतु सभागार न देने वाली बेंगलुरु महानगरपालिका को फटकारा

  • धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत में (हिन्दू) धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध न होने के कारण निर्णय देते हुए कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति प्रदान की

बेंगलुरु (कर्नाटक) – शंकराचार्य भारत के सर्वाधिक आदरणीय आचार्यों में से एक हैं तथा उनके द्वारा प्रसारित ‘अद्वैत दर्शन’ देश की अग्रणी दार्शनिक परंपराओं में से एक है । वर्तमान स्थिति में श्री शंकराचार्य जयंती मनाना ‘धार्मिक’ एवं ‘सांस्कृतिक’ दोनों स्वरूपों का माना जाना चाहिए । भारत यद्यपि एक धर्मनिरपेक्ष देश है, तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के (हिन्दू) धार्मिक एवं सांस्कृतिक उपक्रमों को स्थान नहीं दिया जा सकता, ऐसा कहते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बेंगलुरु पश्चिम नगर महानगरपालिका के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मल्लेश्वरम ब्राह्मण सभा को शंकराचार्य जयंती मनाने हेतु सभागार उपलब्ध कराने से मना किया गया था ।

न्यायालय ने महत्वपूर्ण निरीक्षण अंकित करते हुए कहा कि हिन्दू धर्म तथा भारतीय संस्कृति कभी भी असंवैधानिक अथवा अवैध नहीं हो सकते । भारतीय संस्कृति एवं (हिन्दू) धर्म भारत की आत्मा हैं ।

महानगरपालिका का हिन्दूद्वेषी तर्क !

महानगरपालिका ने कहा था कि सभागार का उपयोग धार्मिक कार्यों हेतु नहीं किया जा सकता; क्योंकि सभागार का उपयोग योग एवं उससे संबंधित कार्यक्रमों के लिए किया जाता है । (वास्तव में योग भी हिन्दू धर्म की ही देन है । इसे ‘सेक्युलर’ समझने वाली महानगरपालिका का जितना निषेध किया जाए, उतना न्यून है ! – संपादक)

भारतीय संविधान में भारतीय परंपराओं से संबंधित चित्र ! – उच्च न्यायालय

पालिका के तर्क पर न्यायालय ने कहा कि :

१. शंकराचार्य जयंती केवल धार्मिक नहीं, अपितु एक सांस्कृतिक उपक्रम भी है । वास्तव में, भारतीय संस्कृति की महानता यहां के धार्मिक एवं सांस्कृतिक उपक्रमों से ओतप्रोत है तथा उन्हें पृथक करना देश की आत्मा को निकालने के समान है । यह कार्यक्रम प्रतिबंधित नहीं है, अर्थात इसे अनुमति प्राप्त है ।

२. भारत के संविधान में स्वयं भारतीय संस्कृति की मुद्राएं, भारतीय शिक्षा पद्धति का अविभाज्य अंग ‘गुरुकुल’, रामायण, भगवद्गीता, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी एवं इसी प्रकार की अन्य परंपराओं के चित्र विद्यमान हैं । अतः भारतीय संस्कृति का उत्सव मनाना, जो धार्मिक उपक्रमों के सुसंगत है, उस पर राज्य सरकार अथवा उनके क्षेत्राधिकार में आने वाली संस्थाओं के स्थान पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता ।