‘वर्ष २०२६ की महाशिवरात्रि से अर्थात १५.२.२०२६ से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने साधकों को श्रीराम की उपासना (नामजप, स्तोत्र का पाठ इत्यादि) करने के लिए कहा है । इस संदर्भ में सूक्ष्म ज्ञान से प्राप्त जानकारी आगे दी गई है ।

१. बडी अनिष्ट शक्तियों के साथ युद्ध करने हेतु श्रीकृष्ण की उपासना, जबकि समष्टि प्रारब्ध भोगने के लिए श्रीराम की उपासना करना पूरक
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का आध्यात्मिक स्तर उच्च है तथा वे समष्टि संत हैं । समष्टि संत साधना करनेवाले समाज को काल के अनुसार साधना की सीख देते हैं ।

१ अ. वर्ष २००१ से वर्ष २०२५ तक बडी अनिष्ट शक्तियों के साथ युद्ध करना महत्त्वपूर्ण होने से उसके लिए श्रीकृष्ण की उपासना करना आवश्यक : हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के (रामराज्य की स्थापना के) कार्य में वर्ष २००१ से वर्ष २०२५ तक आनेवाली विभिन्न बाधाओं में से बडी अनिष्ट शक्तियों के कारण उत्पन्न बाधाओं का अनुपात ६५ प्रतिशत, जबकि समष्टि प्रारब्ध के कारण उत्पन्न होनेवाली बाधाओं का अनुपात ३५ प्रतिशत था । उसके कारण उस काल में सूक्ष्म से बडी एवं मायावी अनिष्ट शक्तियों के साथ लडने के लिए १०० प्रतिशत प्रकट शक्ति तथा १०० प्रतिशत अप्रकट शक्ति से युक्त भगवान श्रीकृष्ण की उपासना आवश्यक थी ।
१ आ. साधकों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की भावपूर्ण उपासना की जाने से उनकी आध्यात्मिक हानि न होना तथा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए समाज में सात्त्विकता उत्पन्न होना : वर्ष २००७ से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में साधकों ने भगवान श्रीकृष्ण की भावपूर्ण उपासना आरंभ की । इसके कारण व्यष्टि स्तर पर बडी अनिष्ट शक्तियों के तीव्र आक्रमणों से साधकों की रक्षा हुई, साथ ही लगभग ९० प्रतिशत साधकों की आध्यात्मिक हानि नहीं हुई तथा समष्टि स्तर पर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए समाज में सात्त्विकता उत्पन्न कर रज-तम नष्ट करने का कार्य अविरत चलता रहा ।
१ इ. काल के अनुसार समष्टि प्रारब्ध का स्तर बढने से तीव्र प्रारब्ध में भी साधना करने की शक्ति प्रदान करनेवाले श्रीराम की उपासना आवश्यक : वर्ष २०२२ से हिन्दू राष्ट्र की (रामराज्य की) स्थापना के कार्य में आनेवाली विभिन्न बाधाओं में से बडी अनिष्ट शक्तियों के कारण उत्पन्न होनवाली बाधाओं का स्तर अल्प होते-होते, समष्टि प्रारब्ध के कारण उत्पन्न होनवाली बाधाओं के स्तर में वृद्धि हुई है । वर्ष २०२६ में बलशाली अनिष्ट शक्तियों के कष्ट के कारण उत्पन्न बाधाओं का स्तर ४० प्रतिशत, जबकि समष्टि प्रारब्ध के कारण उत्पन्न होनेवाली बाधाओं का स्तर ६० प्रतिशत हुआ है ।
व्यष्टि अथवा समष्टि प्रारब्ध भोगना पडता है; परंतु साधना से उसकी तीव्रता न्यून (कम) की जा सकती है । यही लक्ष्य प्राप्त करने हेतु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने साधना करनेवाली समष्टि को भगवान श्रीराम की उपासना करने के लिए कहा है ।
१ ई. बडी अनिष्ट शक्तियों के कष्ट तथा समष्टि प्रारब्ध भोगने की दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण, साथ ही भगवान श्रीराम की उपासना की उपयुक्तता

टिप्पणी : बडी अनिष्ट शक्तियां व्यक्ति पर आक्रमण कर उसे शक्तिहीन बना देती हैं । उसके कारण व्यक्ति को कर्म करना नहीं आता अथवा उसके द्वारा अनुचित कर्म किया जाता है । इसके विपरीत समष्टि प्रारब्ध के कारण व्यक्ति को कर्म करना ही संभव नहीं होता तथा उसकी क्रियमाण शक्ति न्यून (कम) होती है ।
१ उ. युद्ध के लिए श्रीकृष्ण की उपासना, जबकि प्रारब्धभोग भोगकर साधना करने के लिए श्रीराम की उपासना उपयुक्त होना : श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन (जन्म से लेकर अवतार समाप्ति तक) युद्धमय ही था; परंतु इसके विपरीत श्रीराम का संपूर्ण जीवन प्रारब्धमय (अच्छा एवं बुरा) होते हुए भी उन्होंने उसमें भी धर्माचरण एवं साधना का आदर्श स्थापित किया । इसके कारण कहा गया है,
रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः ।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव ।।
– वाल्मीकिरामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ३७, श्लोक १३
अर्थ : भगवान श्रीराम धर्म के मूर्तिवान रूप हैं । वे साधु एवं सत्यपराक्रमी हैं । जिस प्रकार इंद्र देवताओं के राजा हैं, उस प्रकार श्रीराम सभी के राजा हैं ।
‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध एवं उनसे संबंधित शक्तियां एकत्रित होती हैं’, यह अध्यात्म का सिद्धांत है । इसके कारण श्रीकृष्ण की उपासना करनेवालों को भी विभिन्न प्रकार के संघर्ष करने की, साथ ही कठिन काल में संघर्ष करने की अर्थात युद्ध करने की शक्ति मिलती है । इसके विपरीत श्रीराम की उपासना करनेवालों को तीव्र प्रारब्ध के काल में भी स्वयं की आध्यात्मिक स्थिति को हानि न पहुंचाकर तथा असहाय न होकर अपनी साधना जारी रखकर काल का परिणाम सहजता से भोगना संभव होता है । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों को वर्ष २०२६ से साधकों को श्रीराम की उपासना करने के मिले मार्गदर्शन के पीछे अनेक कारणों में से यह भी एक कारण है ।
२. काल के स्तर पर लयतत्त्व बढा है तथा श्रीराम अधिक मात्रा में स्थितितत्त्व से संबंधित होने के कारण श्रीराम की उपासना से साधकों की रक्षा होगी
जिस प्रकार ऋतु में परिवर्तन होकर ग्रीष्म ऋतु आने पर व्यक्ति की देह में स्थित गर्मी में भी वृद्धि होती है तथा उसे इस गर्मी को न्यून करने हेतु अधिक पानी पीना, ठंडे पानी से स्नान करना इत्यादि प्रयास करने पडते हैं, उसी प्रकार किसी काल में लयतत्त्व के बढने पर समाज के सामान्य व्यक्ति पर भी उसका परिणाम होता है तथा उसके शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों में वृद्धि होती है । काल के इन परिणामों को न्यून करने हेतु जीव को जिस देवता में उत्त्पत्ति अथवा स्थिति तत्त्व अधिक होता है, उस देवता की उपासना करना आवश्यक होता है; क्योंकि उसके कारण उस पर काल के अनुसार बढे लयतत्त्व के परिणाम नहीं होते अथवा अति अल्प होते हैं ।
भगवान श्रीराम श्रीविष्णु के अवतार हैं, इसलिए उनमें ‘स्थिति’ का तत्त्व अधिक मात्रा में है । उसी प्रकार उनके द्वार आदर्श रामराज्य की स्थापना करने के कारण उनमें हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु आवश्यक ‘उत्पत्ति’ का तत्त्व भी विद्यमान है । इसके कारण वर्तमान में भगवान श्रीराम की उपासना करने से साधक को उसकी आवश्यकता के अनुसार उत्पत्ति एवं स्थिति, ये तत्त्व भी मिलेंगे तथा उसके कारण उस पर काल के लयतत्त्व का अल्प परिणाम होना अथवा होगा भी नहीं ! इसके कारण वर्तमान में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के बताए अनुसार साधकों द्वारा भावपूर्ण पद्धति से भगवान श्रीराम का नामजप करने से संकटकाल में उनकी रक्षा होनेवाली है, साथ ही इस भावपूर्ण उपासना से साधकों में भगवान श्रीराम का तत्त्व जागृत होने पर वे हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का एक अंश बन सकेंगे ।
३. गुरु का आज्ञापालन करने से गुरु के संकल्प में विद्यमान सामर्थ्य के कारण शिष्य की सभी संकटों में रक्षा होकर उसकी आध्यात्मिक उन्नति होना
अध्यात्म में गुरुमंत्र की अपेक्षा ‘गुरु का आज्ञापालन’ का अधिक महत्त्व होता है । गुरु ने शिष्य को यदि ‘पत्थर’ जप करने के लिए भी कहा, तब भी गुरु के संकल्प में इतना सामर्थ्य होता है कि उसके कारण सभी संकटों में शिष्य की रक्षा होकर उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है । भले ही ऐसा हो, तब भी शिष्य के मन में गुरुमंत्र के संदर्भ में शंका न रहे; इसके लिए गुरु शिष्य को विभिन्न देवताओं के मंत्र अथवा सिद्धमंत्र देते हैं । वास्तव में देखा जाए, तो शिष्य जो प्रयास करता है, उसके कारण नहीं, अपितु गुरु की कृपा के कारण ही देवता शिष्य पर प्रसन्न होते हैं । यही सूत्र समष्टि साधना के संदर्भ में भी लागू है । ‘समष्टि गुरु द्वारा बताई जा रही साधना के संदर्भ में शिष्यों के मन की शंकाएं दूर होकर वे संपूर्ण भक्तिभाव के साथ गुरु का आज्ञापालन करें’, इसके लिए ईश्वर इस प्रकार का ज्ञान देते हैं ।
कृतज्ञता
समाज को काल के अनुसार उचित समष्टि साधना का मार्गदर्शन करनेवाले सनातन के तीनों गुरु (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी, श्रीसत्शक्ति [श्रीमती] बिंदा नीलेश सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी) के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !’
– श्री. निषाद देशमुख (सूक्ष्म से ज्ञान-प्राप्तकर्ता साधक, आध्यात्मिक स्तर ६३ प्रतिशत), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (ज्ञानप्राप्ति का दिनांक : १५.२.२०२६ एवं समय : सवेरे ९.१५ बजे (१ मिनट)
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