
मिट्टी में क्यारी बनाना तथा बोआई
अक्षय तृतीया वर्षा ऋतु के कुछ दिन पूर्व आती है । महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में गुढीपडवा के शुभमुहूर्त पर हल चलाई कृषिभूमि में जोताई पूर्ण करने की प्रथा है । (जोताई अर्थात हल चलाई कृषि भूमि की स्वच्छता कर मिट्टी के स्तर को ऊपर-नीचे करना) इस दिन भूमि में स्थित मिट्टी के प्रति कृतज्ञता का भाव रखकर कुछ किसान पूजन की गई मिट्टी में क्यारी बनाते हैं ।
महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में इस दिन खेत में बीज बोने की प्रथा है । अक्षय तृतीया के मुहूर्त पर बीज बोना आरंभ करने से उन बीजों से प्रचुर मात्रा में अनाज की फसल होती है तथा बीज कभी कम नहीं पडता, यह धार्मिक मान्यता है । (बीज अर्थात मडाई (धान की सफाई) के उपरांत मिले अनाज को खाने की आवश्यकता के अनुसार एक ओर निकालकर, अगली बोआई के लिए निकालकर रखा जानेवाला शेष अनाज !)
महाराष्ट्र्र के कोंकण क्षेत्र में वर्षा अधिक होती है, इसलिए वर्षा आरंभ होने पर उपजाऊ भूमि की चिकनी मिट्टी में क्यारियां बनाकर उसमें बीज बोना संभव नहीं होता । उसके कारण जब वर्षा ऋतु निकट आती है, उस समय जोताई की हुई भुरभुरी मिट्टी में बीज बोना सुलभ होता है । (पहले अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त पर अर्थात वर्षा आरंभ होने से पूर्व बोआई के काम पूरे किए जाते थे । वर्तमान में वर्षा का स्तर अल्प होने के कारण तथा शास्त्र के अनुसार बोआई न करने से भूमि बंजर हो रही हैं तथा पोषणमूल्यों से युक्त अनाज की फसल होना भी अल्प हुआ है ।)
– ज्योतिषी राहुल नारायणराव पुराणिक एवं ज्योतिषी आकाश नारायणराव पुराणिक, जालना, महाराष्ट्र.
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