भोईबाडा (मुंबई) पुलिस थाने के पुलिसकर्मियों की संदेहास्पद कार्रवाई !

मुंबई, २७ मार्च (संवाददाता) : धोखाधडी के अपराध में संलिप्त एक आरोपी फरार था, उसकी खोज करने की अपेक्षा शपथपत्र बनाकर देनेवाले अधिवक्ता को इस प्रकरण में फंसाने की विचित्र एवं संदेहजनक कृत्य भोईबाडा पुलिस थाने की पुलिस ने किया । ‘एफ्.आई.आर्.’ (FIR-प्राथमिकी) में इस घटना से दूर-दूर से संबंध न होते हुए भी पुलिस ने अधिवक्ता अनेश परळकर को ३ दिन तक पुलिस थाने बुलाकर घंटों तक बिठा लिया तथा उनके साथ किसी अपराधी जैसा व्यवहार किया । पुलिस ने अनेश परळकर से बलपूर्व उनका चल-दूरभाष लेकर उन्हें गिरफ्तारी का भय दिखाया । इस विषय में हिन्दू विधिज्ञ परिषद के संस्थापक सदस्य अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णीजी, अधिवक्ता प्रकाश संकपाळ एवं अधिवक्ती युतिका संकपाळ ने मुंबई सत्र न्यायालय में अधिवक्ता अनेश परळकर की अग्रीम जमानत के लिए आवेदन किया । उस पर निर्णय लेते हुए हाल ही में न्यायालय ने अधिवक्ता अनेश परळकर को अंतरिम जमातन पारित की है तथा इस पर अगली सुनवाई ३० मार्च को होगी ।
न्यायालय में सुनवाई के समय सरकारी अधिवक्ता अनुपस्थित थे । अधिवक्ता अनेश परळकर का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णीजी ने कहा, ‘अधिवक्ता अधिनियम, १९६१’ के अनुसार अभियोजन पक्ष एवं अधिवक्ता के मध्य का संवाद पुलिस मांग नहीं सकती । अधिवक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए वर्ष २०२१ का नियोजित कानून (प्रपोज्ड लॉ) अर्थात ‘अधिवक्ता संरक्षण कानून’ अधिवक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करनेवाला कानून है ।
घंटो तक पुलिस थाने में बिठाकर गिरफ्तारी की धमकी दी !
‘इस प्रकरण में भोईबाडा पुलिस ने अधिवक्ता अनेश परळकर को १३, १४ एवं १६ मार्च ऐसे ३ दिन तक पुलिस थाने बुलाकर उनके साथ किसी अपराधी जैसा व्यवहार किया तथा इतने तक न रूककर उन्हें बंदी बनाने की, साथ ही उनकी वकालत की अनुज्ञप्ति निरस्त करने की भी धमकी दी, ऐसी जानकारी अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णीजी ने दी ।
क्या है यह घटना ?
वर्ष २०२४ मेंह श्रुती परब नाम की महिला ने मुंबई के ही आशिष मोरे नाम के व्यक्ति को एक सभागार संचालित करने के लिए दिया तथा उसके लिए उनसे ८.५ लाख रुपए लिए । यह सभागार उनके नाम पर है, यह दिखाने के लिए श्रुती परब ने शपथपत्र प्रस्तुत किया; परंतु वास्तव में जब यह सभागार श्रुती परब के नाम पर नहीं है, यह ज्ञात होने पर आशिष मोरे ने श्रुती परब से पैसे वापस करने की मांग की । उस पर श्रुती परब ने आशिष मोरे को धनादेश दिया; परंतु यह धनादेश पारित होने से पहले ही श्रुती परब ने अधिकोष में पत्र भेजकर धनादेश रोका (‘स्टॉप पेमेंट’ किया) । बार-बार पैसे मांग कर भी पैसे न मिलने के कारण आशिष मोरे ने २३ दिसंबर २०२५ को काळाचौकी पुलिस थाने में शिकायत प्रविष्ट की । श्रुती परब द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र में नाम होने के कारण पुलिस ने अधिवक्ता अनेश परळकर को इस प्रकरण में फंसाने का प्रयास किया ।
शपथपत्र पर किए गए हस्ताक्षर के आधार पर अधिवक्ता को बंदी बनाया जाना संदेहजनक ! – अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णीजी, हिन्दू विधिज्ञ परिषद

यह घटना काळाचौकी पुलिस थाने की कार्यकक्षा में घटित होने के कारण आशिष मोरे ने दिसंबर २०२४ में काळाचौकी पुलिस थाने में शिकायत प्रविष्ट की थी । यह शिकायत काळाचौकी पुलिस थाने से भोईबाडा पुलिस थाने में हस्तांतरित नहीं की गई थी, तब भी आशिष मोरे ने डेढ वर्ष उपरांत भोईबाडा पुलिस थाने में यही शिकायत प्रविष्ट की । इसमें विशेष बात यह कि काळाचौकी पुलिस थाने में प्रविष्ट की गई शिकायत का आगे क्या हुआ, इसका उल्लेख भी भोईबाडा पुलिस थाने में की गई शिकायत में नहीं किया गया । आशिष मोरे द्वारा पंजीकृत शिकायत में उनकी पडोसी महिला वंदना गोंधळे ने श्रुती परब से परिचय करवा दिया था, ऐसा उल्लेख किया गया है । वंदना गोंधळे, आशिष मोरे एवं श्रुती परब इन तीनों के मध्य हुए संवाद में अधिवक्ता अनेश परळकर के नाम का किसीप्रकार का उल्लेख नहीं है । उसके कारण पुलिस को यदि अन्वेषण करना है, तो आरोपी क्रमांक २ वंदना गोंधळे का करना चाहिए था; परंतु वैसा न कर वे अधिवक्ता अनेश परळकर को पूछताछ के लिए कैसे बुला सकते हैं ? यह अत्यंत संदेहजनक है । केवल ‘अधिवक्ता’के रूप में कानूनी जानकारी दी अथवा शपथपत्र पर हस्ताक्षर किया; इसके आधार पर क्या पुलिस एक अधिवक्ता को बंदी बनाएगी ? एक अधिवक्ता को पुलिस थाने बुलाकर उसे अपमानित करना अनुचित है ।
गृहमंत्री से शिकायत करेंगे !
कोई धनादेश रोक रहा हो, तो ‘निगोशिएबल इंस्टुमेंट्स एक्ट’ (पैसे देने हैं, तब भी धनादेश रोका गया, तो उस पर कार्रवाई के लिए कानून) के अंतर्गत अपराध पंजीकृत किया जा सकता है । श्रुती परब द्वारा धनादेश रोके जाने पर भी आशिष मोरे ने पुलिस थाने में शिकायत प्रविष्ट न कर भोईबाडा पुलिस थाने में नई शिकायत प्रविष्ट की । ऐसा करना अत्यंत संदेहजनक एवं गंभीर है । इस प्रकरण में मैं राज्य के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री देवेंद्र फडणवीस से शिकायत करनेवाला हूं’, ऐसा अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णीजी ने बताया ।
संपादकीय भूमिका‘सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय’ (सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों का दमन) इस घोषवाक्य के अनुसार सज्जन लोगों को पुलिस का आधार, जबकि अनिष्ट प्रवृत्तिवाले लोगों में पुलिस का भय होना चाहिए; परंतु इसके विपरीत पुलिस यदि अच्छे लोगों का ही शोषण करती हो, तो ऐसे पुलिसकर्मियों को ‘सरकारी पैसों पर पाले जा रहे गुंडे’ ही कहना पडेगा ! |
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