पिछले अनेक दशकों से हिन्दू धर्म और हिन्दुओं को पाश्चात्य जगत में हीन भावना से देखा जाता था । हिन्दू धर्म के विरोध में झूठी नीच कहानियां रचकर उसे अमानवीय, जंगली कहकर कीचड फेंका जाता था । ऐसे वातावरण में भी अमेरिका में रहकर हिन्दू धर्म के वैचारिक पुनरुत्थान के वर्तमान काल के जनक के रूप में श्री. राजीव मल्होत्रा कार्य कर रहे हैं । उन्होंने अत्यंत परिश्रम कर हिन्दुओं को उनके धर्म का महत्त्व बताया और हिंदूविरोधकों का षड्यंत्र विफल किया । ३ दशकों में उन्होंने धर्म के लिए अति व्यापक वैचारिक कार्य किया है । इस लेख के माध्यम से उनके व्यापक कार्य को समझने का एक छोटा-सा प्रयास सनातन प्रभात कर रहा है !

विशेष सदर

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिन्दवी स्वराज हेतु जिस प्रकार उनके सैनिकों एवं सेनापतियों का त्याग सर्वोच्च है, उस प्रकार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक हिन्दू धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा हेतु ‘सैनिक’ के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु उनके संघर्ष की जानकारी देनेवाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस लेख द्वारा अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी !
– संपादक
१. टेकनिकल क्षेत्र के नामांकित व्यावसायिक से धर्मनिष्ठ योद्धा तक की यात्रा !
‘सफल टेकनिकल इंजीनीयर और व्यावसायिक’ से लेकर ‘हिन्दू संस्कृति के प्रचारक’ तक की श्री. राजीव मल्होत्राजी की यात्रा विलक्षण और प्रेरणादायी है । मल्होत्राजी का जन्म वर्ष १९५० में हुआ और देहली स्थित ‘सेंट स्टीफन्स कॉलेज’ से भौतिकशास्त्र से शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत अमेरिका के सिराक्यूस विश्वविद्यालय से उन्होंने संगणकशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की ।

मल्होत्राजी ने अनेक देशों में लगभग २० से अधिक इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कंपनियों की स्थापना की है । विलक्षण नेतृत्व क्षमतावाले मल्होत्राजी ‘फॉर्च्युन १००’ कंपनी के वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे । वर्ष १९९० के आरंभ में वे अपने व्यावसायिक जीवन के शिखर पर थे । किसी को लग सकता है कि इतनी अल्प आयु में उन्होंने सबकुछ प्राप्त कर लिया; परंतु उस समय मल्होत्राजी ने एक अत्युच्च और अलौकिक ध्येय प्राप्त करने के लिए ऐसा निर्णय लिया, जिसका कोई विचार भी नहीं कर सकता । वर्ष १९९४ में, आयु के ४४वें वर्ष में उन्होंने स्वेच्छानिवृत्ति ली और ‘हिन्दू संस्कृति तथा तत्त्वज्ञान’ के रिसर्च के कार्य में स्वयं को झोंक दिया । उसी समय वे एक ‘वैचारिक क्षत्रिय’ (An intellectual kshatriya) के रूप में उदित हुए ।
उसी वर्ष उन्होंने न्यू जर्सी स्थित प्रिन्स्टन में ‘इन्फिनिटी फाउंडेशन’ नामक संस्था की स्थापना की । इसी वर्ष २०२५ में इस संस्था के ३० वर्ष पूर्ण हुए हैं । एक दिव्य वातावरण में यह समारोह मनाया गया । इस कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री मोदीजी ने भी उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं दीं ।

३ दशकों की इस लंबी यात्रा में अनेक अडचनें आईं; परंतु तब भी संस्था ने धर्म के कार्य हेतु नि:स्वार्थ एवं समर्पित भाव से निरंतर प्रयास किए हैं ।

संस्था की भूमिका आरंभ से ही स्पष्ट थी : प्राचीन भारतीय परंपराओं का विकृतीकरण रोकना और ‘हिन्दू भारत द्वारा संसार की संस्कृति को दिए योगदान पर प्रकाश डालना !
मल्होत्राजी के ध्यान में आया कि २१वीं शताब्दी में हिन्दुत्व की लडाई तलवार से नहीं, अपितु विद्वता से, मीडिया के माध्यम से और चर्चा से लडी जाएगी । उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित शास्त्रशुद्ध अध्ययन को प्रोत्साहन देने लिए धनराशि एकत्रित करना आरंभ किया । पिछले ३ दशकों में ‘इन्फिनिटी फाउंडेशन’ ने वैश्विक स्तर पर रिसर्च, शिक्षा एवं सामुदायिक परियोजनाओं (कम्युनिटी प्रोजेक्ट्स) के लिए ४०० से अधिक ग्रैंट्स दिए हैं ।
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दीर्घकाल तक चलनेवाले हिन्दू पुनरुत्थान के लिए मल्होत्राजी ने भारतीय दृष्टिकोण को मुख्य प्रवाहवाले शिक्षासंस्थाओं में स्थान दिलवाया । एक चरित्र लेख में दिए अनुसार – धर्म और भारत के विषय में नई और दृढ भूमिका प्रस्तुत कर मुख्य प्रवाहवाले ‘नैरेटिव’ को हिलाकर रख दिया ।
मल्होत्राजी की कौन-सी पुस्तक प्रथम पढें ?‘सनातन प्रभात’ के प्रतिनिधि ने मल्होत्राजी से पूछा, ‘‘आपके साहित्य का अध्ययन और हिन्दू धर्म पर हो रहे वैश्विक ‘नैरेटिव’ की योग्य जानकारी मिलने के लिए कौन-सी पुस्तक सबसे पहले पढनी चाहिए ?’’ मल्होत्राजी ने उत्तर दिया, ‘‘बीईंग डिफरंट’ से आरंभ करें – धीरे-धीरे पढें और विस्तृत रूप से पढें !’’ |
२. ‘इन्फिनिटी फाउंडेशन’ का ध्येय : पाश्चात्य ‘नैरेटिव’ को खुली चुनौती !
‘इन्फिनिटी फाउंडेशन’ मल्होत्राजी की बौद्धिक प्रयोगों की कर्मभूमि बन गई । इस संस्था में मल्होत्राजी को छोडकर अन्य कोई भी पूर्णकालीन कार्यकर्ता न होते हुए भी संस्था ने अपनी प्रभावशाली उपस्थिति सिद्ध कर दी । संस्था के उद्देश्य दृढ और स्पष्ट हैं – ‘हिन्दू धर्म की विकृति को रोकना और भारत के वैश्विक योगदान का डॉक्यूमेंटेशन करना ।’
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पाश्चात्य विचारों के सामने पराभव स्वीकार करने की अपेक्षा मल्होत्राजी ने उन्हीं के दायरों में रहकर शोध कार्य एवं अध्ययन के लिए धनराशि देते हुए, उन्हीं की भाषा में भारतीय परंपराओं को प्रस्तुत करना आरंभ किया । इस कारण शिक्षा क्षेत्र में अनेक लोगों को यह चुभने लगा; परंतु धर्मशास्त्रज्ञों को ये संस्था हिन्दू धर्म के लिए ‘एक दक्ष प्रहरी’ समान लगने लगी । मल्होत्राजी ने भारतीय-अमेरिकन दानकर्ताओं और विद्वानों का ‘गृहसंघ’ (home team) तैयार करने के लिए आवाहन किया । इस माध्यम से उन्होंने ‘भारतीय अध्ययन’ को विदेशी दृष्टिकोण से नहीं, अपितु स्वदेशी दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रोत्साहित किया ।
इस स्पष्ट ध्येय के कारण उनके कार्य को ठोस दिशा मिली । उन्होंने अनेक भारतीय युवाओं एवं हिन्दू यात्रियों को प्रेरित किया है । ‘इन्फिनिटी फाउंडेशन इंडिया’ के माध्यम से मल्होत्राजी युवा अभ्यासकों का सक्रिय मार्गदर्शन कर रहे हैं ।
संस्था ने ‘स्वदेशी इंडोलॉजी परिषद’ और ‘वैचारिक क्षत्रिय व्यासपीठ’ जैसे उपक्रम आरंभ किए हैं । ये ऐसे व्यासपीठों में से हैं, जहां उदयोन्मुख अभ्यासक, सबूतों के आधार पर पाश्चात्य ‘नैरेटिव’ को चुनौती देते हैं । इन उपक्रमों के माध्यम से मल्होत्राजी वैचारिक योद्धाओं अर्थात ‘इन्टेलेक्च्युल वॉरियर्स’ की सेना तैयार कर रहे हैं । ये योद्धा शोध कार्य में निपुण हैं और सांस्कृतिक अभिमान से भरे हुए हैं । इनके कारण शिक्षा संस्था और मीडिया में हिन्दू संस्कृति का महत्त्व दृढता से प्रस्तुत किया जा रहा है ।
३. ब्रेकिंग इंडिया : अंतर्बाह्य खतरों का पर्दाफाश करनेवाला ग्रंथ !
मल्होत्राजी के कार्यों से परिचित होते समय उनके परिवर्तनकारी ग्रंथों का उल्लेख करना अनिवार्य है । उनके प्रत्येक ग्रंथ ने ‘हिन्दू’ भारत की सांस्कृतिक आत्मा की रक्षा के युद्ध का निर्णायक नेतृत्व किया । अरविंदन् नीलकंदन्जी के साथ सहलेखन में प्रकाशित उनका एक और सुप्रसिद्ध ग्रंथ है ‘ब्रेकिंग इंडिया’ (वर्ष २०११) ।
| Snakes In The Ganga – Breaking India 2.0 | Rajiv Malhotra, Vijaya Viswanathan, Vibhuti Jha
(सौजन्य : Jaipur Dialogues) |




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