‘अपने मन के प्रति अपना दृष्टिकोण कैसा हो ?’, इस विषय पर ज्ञानयोगी पू. अनंत आठवलेजी द्वारा किया अनमोल मार्गदर्शन !

सनातन की साधिका डॉ. (श्रीमती) मधुवंती पिंगळे ने सनातन के १०१वें संत ज्ञानयोगी पू. अनंत आठवलेजी (पू. भाऊकाका, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंतजी आठवले के ज्येष्ठ भ्राता, आयु ९० वर्ष) को जिज्ञासावश एक प्रश्न पूछा । वह प्रश्न और उस पर पू. अनंत आठवलेजी का उत्तर आगे दिया है ।

पू. अनंत आठवलेजी

डॉ. (श्रीमती) मधुवंती पिंगळे द्वारा पूछा गया प्रश्न

आपने अपने कुछ लेखों में ‘मैं’ अर्थात् देह, मन और बुद्धि नहीं तथा ‘‘मैं’ से क्या तात्पर्य ?’, इस विषय में विश्लेषण किया था; किंतु मैं स्वयं को उसके अनुसार नहीं देख पाती । मेरे मन में अलग-अलग विचार सतत आते रहते हैं । बुरी बातों का स्मरण भी होता रहता है । इस कारण मेरे मन की एकाग्रता नहीं हो पाती, साथ ही मैं कभी-कभी इन विचारों से त्रस्त होती हूं ।’’ इस पर उपाय क्या है ?

पू. अनंत आठवलेजी द्वारा दिया गया उत्तर : 

१. मन पर नियंत्रण न रख पाना और भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा बताये उपाय

आपने कहा ‘मेरे मन में अलग-अलग विचार सतत आते रहते हैं । इससे मेरे मन की एकाग्रता नहीं हो पाती, तथा कभी कभी मैं इन विचारों से त्रस्त होती हूं’’। अर्जुन ने भी भगवान् श्रीकृष्ण को यही कहा था –

चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।।

– गीता अध्याय ६ श्लोक ३४

अर्थ – हे कृष्ण ! मन चंचल, उद्दाम, शक्तिमान् और दृढ होता है । उसका निग्रह करना मैं वायु को पकडने जितना ही बहुत कठिन मानता हूं । उसे मान्य कर भगवान् श्रीकृष्ण ने उस पर आगे के उपाय बताये –

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।।  

– गीता अध्याय ६ श्लोक ३५

अर्थ – महाबाहु अर्जुन ! मन निग्रह करने में बहुत कठिन और चंचल है, इसमें कोई संदेह ही नहीं । किंतु अभ्यास से और वैराग्य से उस पर नियंत्रण पा सकते हैं ।

राग अर्थात् अनुराग, प्रीति, सुखदायक विषयों की अभिलाषा । ऐसे सुखों के आकर्षण के कारण उन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य अच्छे-बुरे कर्म करता रहता है । ऐसी अभिलाषाओं को-आकर्षणों को छोडने का, भोगों में रुचि न रहने का अर्थ है वैराग्य । यह जानने पर भी रुचि एक झटके में नहीं छूटती, इसलिए उसका अभ्यास करना होता है ।

२. अन्य उपायाें की आवश्यकता

मन में सतत कोई न कोई विचार आते ही रहते हैं । पुरानी अच्छी-बुरी बातों का स्मरण होता ही रहता है । उन्हें रोक नहीं सकते । ईश्वरप्राप्ति करनी हो अथवा मोक्ष पाना हो, तो मन पर नियंत्रण रखना होगा और उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने ऊपर उत्तम उपाय बताया है । किंतु यह उपाय करना बहुत ही कठिन है । पुराणों में अनेक कथाएं आती हैं कि थोर ऋषि-मुनि, बहुत कडी तपश्चर्या करके सिद्धि प्राप्त किए महात्मा भी, मन पर नियंत्रण नहीं पा सके । कुछ थोडा मन के विरुद्ध हुआ तो वे दूसरों को शाप देते थे । इससे स्पष्ट होता है कि वे क्रोध आदि मन के विकारों पर नियंत्रण नहीं पा सके थे, तब सामान्य मनुष्यों के लिए तो यह बहुत ही कठिन है । पूरा जीवन मन को वश करने में ही बीत जाएगा, तब ईश्वरप्राप्ति का प्रयास कब करेंगे ? इसलिए इस विषय पर कुछ अलग विचार करते हैं ।

मन, बुद्धि और अहंकार, ये तीन केवल करण हैं । हमें उनके अधीन नहीं होना है, तो उनको अपने अधीन रखना है । यह कैसे करना, इसे आगे देखते हैं ।

पू. अनंत आठवलेजी के लेखन में विद्यमान चैतन्य न्यून (कम) न हो, इस हेतु रखा गया ध्यान

पूजनीय अनंत आठवलेजी (पूजनीय भाऊकाका) संत हैं, इसलिए उनके लेखन में चैतन्य है । वह चैतन्य न्यून (कम) न हो, इसके लिए उनके लेखन की पद्धति, भाषा एवं व्याकरण में परिवर्तन नहीं किए गए हैं ।

३. मन, बुद्धि और अहंकार

३ अ. मन का स्वरूप

पहिले, ‘मन’ क्या है, यह समझ लेते हैं ।

‘मन’ शब्द की परिभाषा : ‘सङ्कल्पविकल्पात्मकं मनः ।’

मन में सतत संकल्प, विकल्प आते रहते हैं, अलग अलग विचार आते रहते हैं । संकल्प-विकल्प, विचार, ये ही मन का स्वरूप है ।

३ अ १. मन से संबंधित उपाय

मन, यह केवल साधन है, साध्य नहीं : हमारे शरीर में तेरा साधन हैं । उन्हें ही ‘करण’ कहते हैं । ‘करण’ का अर्थ है कार्य करने में उपयुक्त उपकरण, हथियार । यथा खेती के लिए हल, कुदाली, तसला आदि करण हैं । उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में कार्य करने के लिए पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां, ये दस बाह्य करण हैं । इसके अतिरिक्त मन, बुद्धि और अहंकार, ये तीन करण आंतरिक हैं, उन्हें अंतःकरण कहते हैं । सब मिलाकर, इन तेरह करणों की सहायता से हम शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्रियाएं करते हैं । हम अपने हाथ और पैरों पर अधिक विचार नहीं करते । हम केवल उपयोग तक ही उन पर विचार करते हैं, किंतु हम मन को अधिक महत्त्व देते हैं; इसलिए इससे हमें अधिक कष्ट होता है । तथापि यह बात ठीक से ध्यान में लेनी चाहिए कि तेरह करणों में से मन केवल एक करण अर्थात् साधन है, साध्य नहीं । मन, यह ध्येय नहीं; ईश्वरप्राप्ति यह ध्येय है । विचारों की ही चिंता करते रहें, तो चिंतन किसका होता है ? मन का ! किंतु चिंतन होना चाहिए ईश्वर का (ज्ञानमार्ग में ब्रह्मानुसंधान) ! तब, मन में विचार तो आते ही रहेंगे, उनको महत्त्व न देकर, उनकी उपेक्षा कर चिंतन ईश्वर का करने से मन में अन्य विषयों का महत्त्व घटता जाएगा ।

३ आ. बुद्धि का स्वरूप

‘बुद्धि’ शब्द की परिभाषा : ‘निश्चयात्मिका बुद्धि:’ । निश्चय करना, निर्णय लेना, यह बुद्धि का स्वरूप है । मन के विचारों पर क्या उचित अथवा क्या अनुचित, इसका निर्णय हम बुद्धि से करते हैं, कौनसा कर्म करना इसका निर्णय लेते हैं । इसका अर्थ यह है कि मन से बुद्धि श्रेष्ठ है । भगवान् श्रीकृष्ण ने ‘मनसस्तु परा बुद्धि:’ (गीता अध्याय ६ श्लोक ३५) अर्थात् मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, ऐसा बताया है ।

३ आ १. बुद्धि से करने का उपाय

मन में कोई भी विचार आते रहें, उन पर योग्य क्या है इसका निर्णय हमें बुद्धि से लेना है । मन के विचारों को दबाने का प्रयास किया तो वे अधिक ही उमडकर आते हैं । इसलिए बुद्धि से मन को पछाडकर पाप लगनेवाला कोई भी अनुचित कर्म नहीं करना । विचार मन में आने दो-जाने दो, बुद्धि के उचित निर्णय पर दृढ रहना है, तब मन के विचारों से कोई भी हानि नहीं होगी । जो विचार हानि कर ही नहीं सकते, उनका महत्त्व ही क्या है ?

३ इ. अहंकार न करने का उपाय

अहंकार : अहंकार अर्थात् ईश्वर से अथवा ब्रह्म से अपना अलग अस्तित्व मानना । हम जबतक जीवित रहते हैं, तबतक अपने अस्तित्व का भान रहता है (‘उन्मनी अवस्था’ इसका अपवाद है । इस अवस्था में अपने अस्तित्व का भान नहीं रहता) । इस अहंकार से कर्तृत्व, दातृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व आदि अहंकार निर्मित होते हैं । कई बार ‘मैंने अमुक किया, मैंने तमुक किया, मैंने अमुक की ऐसी सहायता की, मैं दूसरे से अधिक जानता हूं, मैं साधना करता हूं’, ऐसे अहंकार के विचार मन में आते रहते हैं । सत्य जानने से ऐसे अनुचित विचार नहीं रहते । ‘मैंने किया’ ऐसा अहंकार, कर्तृत्व की भावना, न हो तो हमें पुण्य-पाप नहीं लगता । यह विषय आगे ‘पुण्य-पाप’ में अधिक स्पष्ट किया है ।

४. पुण्य और पाप का आधार कर्म हैैं, विचार नहीं

हमारा ध्येय पुनर्जन्म टालकर ईश्वर में विलीन होना, यह है । हमारे कर्मों के कारण पुण्य अथवा पाप लगता है और उसके फल भोगने पडते हैं । शेष पुण्य और पापों के कारण पुनर्जन्म लेना पडता है । ये पुण्य-पाप टाल सकें, तो मन में कोई भी विचार आते रहने पर भी पुनर्जन्म होगा ही नहीं, इसलिए पुण्य-पाप कैसे टालना, यह संक्षेप में देखते हैं ।

४ अ. मन में आये अच्छे-बुरे विचाराें के अनुसार कृति की, तो ही उससे पुण्य अथवा पाप लगता है ! : मन में केवल बुरा विचार आने से ही उससे पाप नहीं लगता । इसलिए उससे चिंतित होने की आवश्यकता नहीं । इस बात को तुरन्त मानना कठिन जाएगा, इसलिए इसको दूसरी ओर से देखते हैं । किसी पर दया आकर ‘उसे दान देते हैं’, ऐसा विचार हमने मन में किया, किंतु प्रत्यक्ष दान नहीं दिया तो क्या दान का पुण्य मिलेगा ? नहीं । क्योंकि हमारे मन में परोपकार करने का केवल विचार आया, परोपकार किया नहीं । हम से वैसी कृति नहीं हुई । तो उसी प्रकार मन में बुरा विचार केवल आया, तो क्या उससे पाप लगेगा ? नहीं लगेगा ! क्योंकि वह केवल विचार था, किंतु वैसी कृति की नहीं है । शास्त्रों में ‘कर्मफल’ बताया है, ‘विचारफल’ नहीं । इसलिए पापकर्म न करें, तब मन के विचारों की चिंता करने की आवश्यकता नहीं । अब मन में आनेवाले अनिष्ट विचारों का, बुरे स्मरणों का, अनावश्यक विचारों का महत्त्व ही कितना है, यह स्पष्ट हुआ होगा ।

४ अ १. पाप : बुरा कर्म किया, तो पाप लगता है । पाप किस प्रकार के कर्म से लगता है, वह संक्षेप में देखते हैं ।

१. ‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।’

अर्थात् दूसरे का हम से जिस प्रकार का आचरण हमें अच्छा नहीं लगेगा, वैसा आचरण हम दूसरे के साथ न करें ।

२.  ‘अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।

परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।’

अर्थात्, व्यासजी ने अठारह पुराणों में जो बताया है, उसका निचोड दो-दो शब्दों में बता सकते हैं (परोपकार-पुण्य, परपीडन-पाप) । दूसरों पर उपकार (दूसरे का हित होगा ऐसा कार्य) किया तो पुण्य, दूसरे को पीडा दी तो पाप । (यह स्थूल मान से बताया है । कर्म और पुण्य-पाप का विषय बहुत ही गहन है । गीता के चौथे अध्याय के सत्रहवें श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने बताया है – ‘गहना कर्मणो गति:’ अर्थ-कर्म की गति बहुत गहन है ।)

४ अ २. पुण्य : पुण्य, यह सत्कर्म से होता है, किंतु वह भी बंधनकारक है और पुनर्जन्म का कारण बनता है । अच्छा कर्म करते समय कर्तृत्व की भावना हो, तो पुण्य लगेगा । ‘मैंने किया’ यह भावना ही न हो, तो पुण्य भी नहीं लगेगा । सत्कर्म भी फल की इच्छा न रखकर निष्कामता से करना चाहिये । पुण्यकर्म करना अच्छा ही है, किंतु उसका कर्तृत्व स्वयं का नहीं मानना । अन्यथा उससे हमें पुण्य लगेगा, वह संचित में जाएगा और पुनर्जन्म का कारण बनेगा । किये कर्म का, कर्तृत्व का, अभिमान न हो, इसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की सीख ध्यान में रखनी चाहिये । वे कहते हैं कि कोई भी कर्म (क्रिया) घटित होने में आगे बताये पांच कारण रहते हैं –

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।

– गीता अध्याय १८, श्लोक १४

अर्थ – आधार और कर्ता, अलग अलग करण अर्थात् साधन, अनेक प्रकार के प्रयास (कर्म) और पांचवां कारण होता है दैव ।

यह स्पष्ट होने के लिए एक उदाहरण देखते हैं । खेती करनी हो तो उसमें कृषक कर्ता होता है, किंतु उसमें खेत-भूमि, इस अधिष्ठान की आवश्यकता रहती है । उसके बिना कृषक खेती कर ही नहीं सकता और वह मिट्टी-भूमि कृषक की बनायी नहीं रहती । खेत जोतने के लिए हल लगता है, तथा कुदाली, फावडा, तसला लगते हैं । ये साधन अर्थात् करण हुए । आगे चलकर बोवाई, खाद देना, पानी देना, कीटनाशक छिडकना, खरपतवार निकालना आदि प्रयास लगते हैं (ये चेष्टा अर्थात् प्रयास, कर्म हैं) । यह सब करने पर भी दैव की अनुकूलता आवश्यक रहती है । यथोचित वर्षा हुई और कोई भी अडचन नहीं आयी, तो उपज अच्छी आती है; किंतु उचित समय पर उचित मात्रा में वर्षा होना अथवा न होना, यह हमारे वश में नहीं है । कीडे लगना, खेत में जानवर घुसना, टिड्डियों के दल का आक्रमण, उपज में रोग, आदि हो सकता है । यह सब हमारे वश में नहीं, अपितु दैव के अधीन है । इसे ध्यान में रखा, तो कर्तृत्व का अभिमान नहीं होगा । ऐसे में ‘मैंने बहुत अच्छी उपज ली’, ऐसा अभिमान रखना अयोग्य होगा । उसी प्रकार प्रत्येक अच्छे अथवा पुण्यकारक कर्म का कर्तृत्व केवल अपना नहीं है, यह विचार रहा तो पुण्य से भी अलिप्त रहेंगे ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने यही आगे बताया –

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति:।।

– गीता अध्याय १८ श्लोक १६

अर्थ – ऐसे में केवल स्वयं को कर्ता मानता है वह निर्बुद्ध, बुद्धि असंस्कृत होने के कारण सच क्या है यह नहीं जानता ।

सब प्रकार के कर्तृत्व का अहंकार न रहने से पुण्य-पाप से अलिप्त होने से मन के विचारों का कोई महत्त्व ही नहीं रहता ।

५. अन्य सामान्य उपाय

मन के विचाराें के स्थान पर मन को दूसरे विचारों में लगाना

मन में विचार तो आते ही रहेंगे, किंतु अनावश्यक और अयोग्य विचार नहीं, अपितु अच्छे विचार आएंगे, ऐसा कर सकते हैं ।

अर्थपूर्ण सुमधुर भक्तिगीत सुनने में रुचि हो, तो वैसे गीत सुनें । इससे केवल उतने समय में ही अनावश्यक विचार रुक जाते हैं ऐसा नहीं है; तो उसके पश्चात् भी कुछ समय तक गीत की पंक्तियां, सात्विक विचार, मन में बसे रहते हैं ।

वाचन में रुचि हो, तो भागवत पुराण, रामचरितमानस अथवा अन्य रुचिकर आध्यात्मिक लेखन पढने से उनके सूत्रों पर मन अपनेआप विचार में लग जाता है ।

जो गा सकते हैं, वे तो भाग्यशाली हैं ! शांति से बैठकर, साथ के लिए वाद्यों की चिंता न कर, श्रोताओं का विचार न कर, स्वयं के लिए अथवा ईश्वर की प्रसन्नता के लिए मध्यम स्वर में भानेवाला भक्तिगीत गाये । गायक तन्मय हो जाता है । गाते समय और तत्पश्चात् भी दीर्घकाल तक अन्य विचार मन में आते ही नहीं ।

अन्य भी कुछ कार्य जिससे हमारा मन दूसरी ओर लगे, ऐसा कर सकते हैं ।

६. मन को स्वच्छंद न होने दें

हम मन नहीं, आत्मा हैं । आत्मा ईश्वर का अंश है । मन में विचार तो आएंगे ही; किंतु उनमेंं अटकना नहीं है । हमारे मन में बुरे विचार आये, तो भी वैसा आचरण नहीं करना है । ‘मन में बुरे विचार आये, तो भी पाप नहीं लगता’, ऐसा बताया था, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि अपने मन को स्वच्छंद छोड दें; अन्यथा मन में सतत मलिन विचार रहने पर बुद्धि उनके अनुसार बुरे विचाराें को ही ध्यान में लेकर अयोग्य कार्य करने का निर्णय ले सकती है और वैसी कृति की जा सकती है । केवल इतना ही कि मन को महत्त्व न दें ।

टिप्पणी

ऐसा प्रश्न किसी को आ सकता है कि मन के विचारों को महत्त्व न देना, क्या यह शास्त्रसंमत उपाय है ? उस पर अथर्ववेद के मुण्डकोपनिषद् का मुण्डक ३, खण्ड १, मन्त्र ३ देखें । सनातन द्वारा प्रकाशित ‘अध्यात्मशास्त्र के विविध विषयों का बोध’, इस लघुग्रंथ में ‘आत्मज्ञान से संचित कर्मफल नष्ट होते हैं’, इस लेख में भी उस उपनिषद् का वही विषय स्पष्ट किया है । वहां प्रतिपाद्य विषय भिन्न होने से शब्दरचना अलग है, तो भी तात्पर्य वही है ।