मकर संक्रांति

१४ जनवरी २०२६ (माघ कृष्ण ११)

सूर्य देव

त्योहार मनाने की पद्धति :

१. मकर संक्रांति पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक पुण्यकाल रहता है । इस काल में तीर्थस्नान का विशेष महत्त्व है । गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों के किनारे स्थित क्षेत्र में स्नान करनेवाले को महापुण्य का लाभ मिलता है ।

२. मकर संक्रांति से रथसप्तमी तक का काल पर्वकाल होता है । इस पर्वकाल में किया गया दान एवं पुण्यकर्म फलदायी होता है ।

• नए बर्तन, वस्त्र, अन्न, तिल, तिलपात्र, गुड, गाय, घोडा, स्वर्ण अथवा भूमि का यथाशक्ति दान करें । इस दिन सुहागिनें दान करती हैं । कुछ पदार्थ वे कुमारिकाओं से दान करवाती हैं और उन्हें तिलगुड देती हैं ।

तिल का उपयोग :

संक्रांति पर तिल का अनेक ढंग से उपयोग करते हैं, उदा. तिल युक्त जल से स्नान कर तिल के लड्डू खाना एवं दूसरों को देना, ब्राह्मणों को तिलदान, शिवमंदिर में तिल के तेल से दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) ।

(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ – ‘त्योहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)