परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु सगुण रूप में अवतरित सच्चिदानंद स्वरूप निर्गुण’ !

‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की अवस्था ऐसी है कि उन्हें ऊपरवाला ऊपर ही खींच रहा है । (परमेश्वर उन्हें सर्वाेच्च स्थिति में स्थिर कर रहा है ।) आध्यात्मिक स्तर १०० प्रतिशत से अधिक होने पर ऊपर खींचा जाता है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी परमेश्वरीय तत्त्व में विलीन होने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं । उसी प्रकार वे सगुण के भी कारक हैं (उन्हें हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए सक्रिय रहना आवश्यक है); इसलिए वे ऋषि-मुनि बनकर साधकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी संतों से प्रयत्न करवा रहे हैं । इस कार्य के लिए वे नीचे खींचे जा रहे हैं । (उन्हें सगुण में भी रहना पड रहा है) ।

१. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी को सगुण में आना आवश्यक

परात्पर गुरु (स्व.) परशराम पांडे महाराज

समाधि लगाते समय वासना जागृत रखनी होती है । पास में पेडा रखते हैं । मुझे यह पेडा खाना है; इसलिए समाधि अवस्था से नीचे उतरना पडता है । ठीक वैसा ही परात्पर गुरु डॉक्टरजी का है । सगुण कार्य के लिए (हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए) परात्पर गुरु डॉक्टरजी को जीवदशा में आना पडता है ।

२. कलियुग की विकृत परिस्थिति को सत्प्रवृत्त करने के लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का सगुण स्थिति में बद्ध होना अनिवार्य

जीवदशा में आकर सगुण के कार्यों के लिए मार्गदर्शन
‘बाएं  से श्री. प्रकाश सुतार, श्री. सुदीश पुथलत (आध्यात्मिक स्तर ६४ प्रतिशत) और श्री. भूषण केरकर (आध्यात्मिक स्तर ६८ प्रतिशत) से संवाद करते हुए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले’

परात्पर गुरु डॉक्टरजी की स्थिति त्रिशंकु समान हो गई है । ऊपर से कोई उन्हें खींच रहा है । (वे परमेश्वरी तत्त्व में विलीन हो रहे हैं ।) चैतन्य महाप्रभु तत्त्व में विलीन होने हेतु समुद्र में जा रहे हैं । तब उन्हें कोई तो खींचकर लाता है । अंत में दरवाजा बंद कर वे भगवान की मूर्ति के सम्मुख बैठकर उसमें विलीन हो गए । ज्ञानेश्वर महाराज विलीन नहीं हुए, वे समाधिस्थ हुए । मुक्ताबाई, श्रीराम इत्यादि नदी में जाकर जल में समाधिस्थ हो गए; परंतु परात्पर गुरु डॉक्टरजी का कुछ अलग है । वे कार्य हेतु बद्ध हुए हैं । कलियुग की ऐसी परिस्थिति कभी नहीं हुई थी । इतनी भयंकर एवं विकृत परिस्थिति को सत्प्रवृत्त करने तथा उत्क्रांति करने का कठिन कार्य उनके पास आया हुआ है और उसे शांति से, बिना किसी की समझ में आए करना है । जो कार्य परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी सूक्ष्म से कर रहे हैं, वह किसी की भी समझ में नहीं आता ।

३. सूक्ष्म से चल रहे युद्ध के लिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा संसार में विद्यमान चैतन्य के स्रोत श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी के माध्यम से खोले जाना

सूक्ष्म के पांच लोकों में अब तक (वर्ष २०१७ तक) सूक्ष्म युद्ध हुआ, यह कोई जानता नहीं है; परंतु वह हो चुका है । इसलिए आज की परिस्थिति अत्यंत भयावह है । सगुण में भी युद्ध चल रहा है । वह भी सूक्ष्म स्तर पर हो रहा है; इसलिए संसार में चैतन्य के जो स्रोत हैं, वे सद्गुरु अंजली मुकुल गाडगीळजी द्वारा (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी के माध्यम से) खोल रहे हैं । अथर्ववेद के ९वें कांड में बताया गया है कि चैतन्य के कौन-से स्रोत भगवान ने निर्माण किए हैं ?

४. रज-तम के आवरण के कारण ढंके हुए चैतन्य के स्रोत खोलने से समाज का मन-परिवर्तन होगा !

गंगा नदी नहीं, अपितु चैतन्य का स्रोत है । जो आवरण से ढंक गया है, उसे परात्पर गुरु डॉक्टरजी खोल रहे हैं । चैतन्य के स्रोतों के प्रभाव से रज-तम का वातावरण नष्ट होगा और अपनेआप समाज का मन-परिवर्तन होगा । यह एक युद्ध ही है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जो कर रहे हैं, वह सगुण से, शोधनिबंधों पर आधारित व्याख्यानों द्वारा दिखा भी रहे हैं ।

५. कृष्ण की भांति परात्पर गुरु डॉक्टरजी की ओर दैवी बालकों का आकृष्ट होना

दैवी बालकों का आकृष्ट होना
बालसंत पूज्य वामन राजंदेकर को दुलार से खिलाते हुए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

कृष्ण शब्द में, ‘कृष्’ का अर्थ है आकृष्ट होना और ‘ण’ का अर्थ है अन्य । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी कृष्ण समान हैं इसलिए जो नए (दैवी) बालक जन्म ले रहे हैं, वे अपनेआप उनकी ओर आ रहे हैं ।

६. सनातन धर्मराज्य की व्याख्याभगवान के लिए, भगवान का (ईश्वरीय राज्य), भगवान के द्वारा किया राज्य, अर्थात ‘भगवत्राज्य’ अर्थात ‘रामराज्य’ अर्थात ‘सनातन धर्मराज्य !’

हिंदुत्वनिष्ठों के कार्य को प्रोत्साहन देना
‘बांग्लादेश माइनॉरिटी वॉच’ संगठन के पू. अधिवक्ता रवींद्र घोष से भेंट करते हुए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

७. ईश्वरीय राज्य किस हेतु ?

‘फॉर दी पिपल’(अर्थात लोगों के लिए) नहीं । ‘पिपल’ एक वृत्ति है । इस वृत्ति में परिवर्तन लाना अर्थात ईश्वरीय राज्य ! मनुष्य की वृत्ति में परिवर्तन होकर उसका ईश्वर होना, अर्थात ‘नर’ का ‘नारायण’ होना । आज सर्वत्र विकृति, अर्थात मन की विकृति हो चुकी है । इसलिए वह आज मानव है । इसलिए ऐसी घटनाएं हो रही हैं । मानव को ईश्वरीय स्वरूप में प्रकट करना, उसे सत्प्रवृत्त करना, सदाचारी करना, यह बहुत बडा काम है । यही है ईश्वरीय राज्य ! वह भी बिना किसी की समझ में आए, जिससे कोई विरोध नहीं हो ।

८. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा चैतन्य के अंश के माध्यम से कार्य किया जाना

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की शक्ति अन्यों के माध्यम से कार्य करती है । इसलिए हिन्दू राष्ट्र का कार्य हो रहा है । वे स्वयं नहीं करते । ‘आप यह कार्य करें, आप नेपाल जाइए, आप कश्मीर जाइए, व्याख्यान दीजिए’, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी साधकों को ऐसा बताते हैं और कहते हैं, ‘वाह..! वाह..! आप कितने महान हैं, मैं तो कुछ भी नहीं करता ।’

– परात्पर गुरु (स्व.) पांडे महाराज (वर्ष २०१७)