‘प्रारब्ध’ इस ‘यूट्यूब’ वाहिनी के संपादक श्री अवनीश शर्मा ने सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री चेतन राजहंस से देहली स्थित भारत मंडपम् में १३ एवं १४ दिसम्बर को होने वाले सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव की पार्श्वभूमि पर भेंटवार्ता की । इस भेंटवार्ता में श्री चेतन राजहंस ने इस महोत्सव की विस्तृत सूचना प्रदान की । इस भेंटवार्ता का सारांश यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत है ।

१. सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव आयोजित करने की संकल्पना
सनातन संस्था की स्थापना वर्ष १९९९ में हुई । संस्था के २५ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में देहली में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है । यद्यपि संस्था की स्थापना आध्यात्मिक स्तर पर हुई है, कुछ लोगों को ‘सनातन राष्ट्र’ की संकल्पना सांस्कृतिक, राष्ट्रीय तथा राजनैतिक प्रतीत होती है;किंतु संस्था अपने मूल ध्येय के अनुसार अग्रसर है ।
वर्ष १९८७ में संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ॰ जयंत आठवलेजी के जीवन में संत भक्तराज महाराज ‘गुरु’ रूप में आए । उनके मार्गदर्शन में उन्होंने आध्यात्मिक साधना की । वर्ष १९९५ में गुरु के अंतिम क्षणों में उन्होंने शिष्य डॉ॰ आठवले से कहा —
“वर्ष २०१२ के उपरांत तामसिक राजनैतिक शक्तियां परास्त होने लगेंगी । वर्ष २०२० में महामारी आएगी तथा वर्ष २०२५ के बाद भारत में हिन्दू राष्ट्र के लिए अनुकूल काल आरंभ होगा । आपने जो सनातन धर्म का अध्ययन किया है, उसका आधार लेकर राष्ट्ररचना का सिद्धान्त स्थापित करना होगा । अपनी सनातन परंपरा, सनातन संस्कृति एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित करना होगा । इसके लिए वैज्ञानिक पद्धति से अनुसंधान करें ।”
वर्ष १९९५ में उन्होंने ‘ईश्वरी राज्य की स्थापना’ नामक ग्रंथ लिखा, जिसमें यह उल्लेख है । इसी आधार पर वर्ष २०२५ में गोवा में प्रथम ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ सफलतापूर्वक आयोजित हुआ, जिसमें ३० सहस्र से अधिक साधक तथा धर्मनिष्ठ लोग उपस्थित थे । अब देहली में दूसरा महोत्सव हो रहा है । सनातन परंपरा, सभ्यता एवं संस्कृति को पुनर्जीवित करना तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दृढ रूप देना ही इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य है ।

२. शंखनाद महोत्सव के विविध चर्चासत्र एवं संबोधन
अ. १३ दिसम्बर – छत्रपति शिवाजी महाराज एवं संस्कृतिरक्षण :
छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वराज्य मूलतः सनातन राष्ट्र तथा आदर्श राज्य का स्वरूप था । इसी दृष्टि से १३ दिसम्बर को ‘छत्रपति शिवाजी महाराज तथा संस्कृतिरक्षण’ विषय रखा गया है । ‘छत्रपति शिवाजी महाराज की कार्यपद्धति तथा वर्तमान भारत’ विषय पर सनातन संवाद होगा । इसमें भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश उदय ललित, ‘मंदिरमुक्ति संग्राम’ से संबंध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन तथा लेखिका शेफाली वैद्य सम्मिलित होंगी ।
इसी दिन ‘संस्कृति संवाद’ भी होगा, जिसमें भारतीय संस्कृति का ह्रास करने वाले पक्षों तथा सांस्कृतिक जागरण पर चर्चा होगी । इसके साथ ‘मंदिर संवाद’ भी रखा गया है, जिसमें हिन्दू मन्दिरों के संबंध में सम्पन्न एवं शेष कार्यों पर मान्यवर मार्गदर्शन करेंगे ।
आ. १४ दिसम्बर – राष्ट्रीय सुरक्षा :
इस दिन ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ विषय पर चर्चा होगी, जिसका आधार ‘सनातन धर्म की सुरक्षा में भारत की सुरक्षा’ यह विचार है । अंतर्निहित एवं बाह्य सुरक्षा पर रणसंवाद होगा । इसमें थलसेना, वायुसेना, नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी तथा ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन’ के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक सम्मिलित होंगे । नक्सलवाद एवं शहरी नक्सलवाद पर भी चर्चा होगी । साथ ही ‘भारत की प्रगति में सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं तथा व्यक्तियों का अपेक्षित योगदान’ विषय पर भी मार्गदर्शन होगा । अंततः ‘विश्वकल्याणकारी सनातन राष्ट्र की दिशा क्या होनी चाहिए ?’ इस पर परम् पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरी मार्गदर्शन करेंगे ।
३. ‘स्वराज्य का शौर्यनाद’ प्रदर्शन :
१३, १४ तथा १५ दिसम्बर को ‘स्वराज्य का शौर्यनाद’ नामक प्रदर्शनी आयोजित होगी । यह ऐतिहासिक महत्व वाले शस्त्रों का दुर्लभ प्रदर्शन होगा । इसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के कालखंड के शस्त्र रहेंगे — उनके द्वारा प्रयुक्त ८ शस्त्र तथा भवानी तलवार के दर्शन भी मिलेंगे । मराठा साम्राज्य के अन्य सेनापतियों के शस्त्र भी रहेंगे, जैसे सरदार हंबीरराव मोहिते का भाला । महाराणा प्रताप के काल के शस्त्र तथा विजयनगर साम्राज्य के कुछ शस्त्र भी विशेष आकर्षण होंगे ।
४. एक सहस्र वर्ष बाद मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दिव्य अवशेषों का दर्शन :
१२ ज्योतिर्लिंगों में से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित है । सोम अर्थात् भगवान चंद्रमा, अतः नाम ‘सोमनाथ’ है । यह ज्योतिर्लिंग पूर्वकाल में वायु में अवस्थित रहता था । उसमें प्रबल लौह–चुम्बकीय तत्त्व था । वह पृथ्वी के तत्त्वों से नहीं, अपितु चंद्रमा के तत्त्वों से निर्मित था ।
गजनी के महमूद ने लगभग एक सहस्र वर्ष पूर्व इसे नष्ट किया । उसके पश्चात् वहां के पुजारी–कुल ने इसके अवशेष एकत्र कर तमिलनाडु ले जाकर सुरक्षित रखे । वर्ष १९२४ में वे अवशेष कांची के शंकराचार्य को समर्पित करने हेतु पहुंचे, किंतु स्वामीजी ने कहा — “इन्हें अभी १०० वर्ष और सुरक्षित रखें । १०० वर्ष बाद अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर बनेगा, तथा वर्ष २०२५ में प्रयागराज में महाकुंभ होगा । उस कुंभ में इन अवशेषों का स्नान कराएं । उसके पश्चात् हिन्दू राष्ट्र के लिए अनुकूल काल प्रारंभ होगा, तब इनका दर्शन सर्वत्र उपलब्ध कराएं ।”
इस शंखनाद महोत्सव के अवसर पर सर्वप्रथम भारत मंडपम् में इन दिव्य ज्योतिर्लिंग–अवशेषों के दर्शन सभी को प्राप्त होंगे ।
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