
नई दिल्ली – मंदिरों के फंड को संकटग्रस्त सहकारी बैंक में रखकर बैंक को सहारा देना उचित नहीं है । यह निधि सुरक्षित, संरक्षित रहकर केवल मंदिर के हित के लिए ही उपयोग की जानी चाहिए । यह सहकारी बैंक की आय का या उसे बचाने का आधार नहीं हो सकती, यह सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई के समय स्पष्ट किया ।
१. केरल की कुछ सहकारी बैंकों ने तिरुनेल्ली मंदिर देवस्थान द्वारा रखी गई सावधि जमा (Fixed Deposits) लौटाने के केरल उच्च न्यायालय के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी । इस संबंध में प्रविष्ट याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जॉइमल्या बागची की खंडपीठ ने सुनवाई की । उसी समय न्यायालय ने उपरोक्त मत व्यक्त किया । सुनवाई के समय न्यायालय ने यह प्रश्न उठाया कि ‘उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देश में क्या अनुचित है ?’
२. ग्राहकों को आकर्षित करने में विफल रहना बैंक की समस्या है ! सहकारी बैंकों की ओर से अधिवक्ता मनु कृष्णन ने बताया कि उच्च न्यायालय द्वारा २ महीने के भीतर जमा राशि वापस करने का अचानक दिया गया आदेश समस्या उत्पन्न कर रहा है । इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जनता का विश्वास प्राप्त करना बैंकों का दायित्व है । यदि ग्राहक तथा जमा राशि आकर्षित करने में विफलता मिलती है, तो वह बैंक की ही समस्या है ।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि परिपक्वता (Maturity) पर जमा राशि तुरंत वापस करना बैंक का कर्तव्य है । खंडपीठ ने सभी याचिकाएं रद्द कर दीं एवं याचिकाकर्ताओं को आवश्यक होने पर वापसी के लिए समय-सीमा में विस्तार प्राप्त करने हेतु उच्च न्यायालय जाने की अनुमति दी । ये याचिकाएं मनंथवाडी को-ऑपरेटिव अर्बन सोसाइटी तथा तिरुनेल्ली सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक द्वारा प्रविष्ट की गई थीं ।
संपादकीय भूमिकाहिन्दुओं को लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से आगे बढकर यह आदेश देना भी आवश्यक हो गया है कि मंदिरों के पैसे का उपयोग विकास कार्यों के लिए, साथ ही मंदिर के अतिरिक्त किसी अन्य काम के लिए नहीं किया जा सकता ! |
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