
श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी ‘निरपेक्ष प्रेम’ (प्रीति) का साकार रूप हैं और सदैव मातृरूप में रहती हैं । सभी साधकों के प्रति उनका वात्सल्य भाव है । हम कुछ साधक उनके साथ सेवा करते हैं । चित्र में दिख रहा है, वह ऐसा ही एक सुंदर क्षण है ! ऊपर विशाल आकाश, सामने अथांग समुद्र और विशाल हृदय तथा प्रीति का अथांग सागर लिए हुए श्रीचित्शक्ति (श्रीमति) अंजली गाडगीळजी ! उस समय वे कह रही थीं, ‘‘क्या तुमने कभी अनुभव किया है कि यह समुद्र और यह आकाश कितने व्यापक हैं ? समुद्र कभी भी किसी को ‘ना’ नहीं कहता । समुद्र की भांति ही हमारे अंदर भी व्यापकता बढनी चाहिए । गुरुकार्य करते समय हमें किसी भी सेवा को कभी ‘ना’ नहीं कहना चाहिए । ‘जो सेवा मिले, उसे करते रहना’, यही हमारी साधना है ।’’ यह हम साधकों को उनकी निर्मलता और प्रीति की अनुभूति करानेवाला यह एक अद्भुत क्षण था ।
– श्री. स्नेहल मनोहर राऊत, कांचीपुरम्, तमिलनाडु. (७.१२.२०२४)
साधक एवं धर्मकार्य के लिए अत्यंत कठिन दैवी यात्राएं !श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी गांव-गांव जाकर दैवी वं तीर्थ यात्राएं कर संतों तथा देवताओं के आशीर्वाद पाने हेतु प्रयासरत हैं । उन्हें महर्षियों से आज्ञा मिलते ही वे आज्ञा स्वरूप उसी क्षण यात्रा आरंभ कर देती हैं । कुछ स्थानों की यात्रा अत्यंत कठिन होती है, जो पहाडों और घाटियों से होकर गुजरती हैं । जहां सामान्यतः युवकों को भी चढना-उतरना कठिन होता है, ऐसे स्थानों पर भी वे इस आयु में भी लगातार यात्रा कर रही हैं । – श्री. योगेश जलतारे, समूह संपादक, सनातन प्रभात (१९.११.२०२४) |
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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