हमने सनातन के मूल धर्मग्रंथ – वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण एवं महाभारत, इनका ज्ञान एवं सिद्धांत आत्मसात नहीं किए; अपितु उसके विपरीत, तथाकथित धर्माचार्याें एवं कथाकारों से प्रभावित होकर उनके बताए धर्मपालन को ही धर्म मानकर बैठ गए । ऐसी प्रतिकूल स्थिति ने हिन्दुओं के आत्मसम्मान को कलंकित कर आत्मग्लानि में जीने के लिए विवश कर दिया । इसीलिए देश के नीतिनिर्धारकों ने सनातन की महानता के मूलभूत सिद्धांतों का अध्ययन नहीं किया तथा तथाकथित बुद्धिजीवियों एवं धर्माचार्याें की भांति उदारमतवादी, कायर एवं अहिंसक इत्यादि बने रहना स्वीकार किया । जबकि अन्य पंथों ने सनातन हिन्दू धर्म के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की, तब भी भारत की गौरवशाली संस्कृति की रक्षा करने हेतु प्रखर हिन्दुत्व को उग्र रूप धारण करने की नितांत आवश्यकता है । सनातन धर्म के मूल सिद्धांत इसी को उचित मानते हैं ।

१. देशविरोधी तत्त्वों से भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति नष्ट करने का प्रयास

‘सनातन में समाए हिन्दुत्व के मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना कर वर्षों से राष्ट्रीय हितों को हानि पहुंचाना अब सामान्य बात बन गई है । देश की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता एवं प्रेरणादायी आदर्श महापुरुषों के विषय में नकारात्मक वातावरण तैयार करने को आधुनिकतावाद समझा जाने लगा है । जैसे कि वर्तमान सरकार विश्व स्तर पर भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति को प्रोत्साहन देकर उन्हें अधिक प्रशंसनीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है । राष्ट्रीय राजनीति में सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए हमारी सरकार पूर्ण रूप से एवं समर्पित होकर साहसिक निर्णय ले रही है । इस सरकार को सत्ता से हटाने के लिए धर्मद्रोही एवं भारतविरोधी षड्यंत्र रचनेवाले गिरोह सनातन एवं हिन्दुत्व के विषय में विषैले व्यक्तव्य देकर आक्रामक बन रहे हैं । लोकतंत्र में मुसलमानों एवं ईसाइयों की वोटबैंक को अपने पक्ष में कर लेने के लिए ऐसे तत्त्वों ने भारतीय अस्मिता एवं संस्कृति को नष्ट करने का लक्ष्य रखा है । ऐसे अनेक अपमानजनक, आपत्तिजनक एवं विषैले भाषण देनेवाले तत्त्वों के विरुद्ध हिन्दुओं द्वारा रोष व्यक्त करने को अवैध एवं अनुचित मानना दुर्भाग्यजनक है, जबकि हमारी सनातन संस्कृति इस प्रकार अन्याय सहन करना भी पापकर्म मानती है ।
२. शतकों से सहिष्णुता, अहिंसा एवं उदारता की सीख मिलने के कारण हिन्दू कायर एवं संघर्षहीन
हम ऐसे आत्मग्लानिपूर्ण अत्याचारों पर चुप रहें; क्या इसीलिए हिन्दुओं को तथा उनके पूर्वजों को शतकों से अहिंसा, सहिष्णुता एवं करुणा के पाठ पढाए जा रहे हैं ? वास्तव में देखा जाए, तो मुगल काल के आरंभ से ही हिन्दुओं को सहिष्णुता, अहिंसा, उदारता एवं ‘अतिथि देवो भव:’ इत्यादि के विशेष पाठ पढाए गए हैं । यहां तक कुछ भी अनुचित नहीं था; परंतु उसके लिए यदि हमारा स्वाभिमान त्यागकर तथा अपने अस्तित्व को संकट में डालकर हम स्वयं में ये सद्गुण संजोते रहे, तो क्या यह न्यायसंगत होगा ?
अपनी आस्थाओं के प्रतीक, मंदिर, मठ, तीर्थस्थल, साथ ही देवताओं का सम्मान एवं अनादर के विषय में हमारा जागरूक एवं सतर्क न होना कैसी सहिष्णुता है ? जहां हम अपने ऋषियों-आचार्याें के ज्ञान एवं विज्ञान का भी संरक्षण नहीं कर पाए तथा अपनी प्राचीन धरोहर नष्ट होते समय देखते रहे, क्या उस समय हमारा अहिंसक रहना उचित था ? जब हमारी अरबों की संपत्ति लूटी जा रही थी तथा लाखों हिन्दुओं का बलपूर्वक धर्मांतरण एवं नरसंहार किया जा रहा था, तब भी क्या हम कायर एवं विश्वासघाती बनकर हमारी धर्मनिरपेक्षता की नीति से चिपककर रहे ? इस प्रकार शतकों के साथ किए गए अत्याचारी एवं अमानवीय कृत्यों के कारण हिन्दू समाज का मनोबल तोडा गया । इस विषय में विभिन्न टीकाकारों में मतभेद हो सकते हैं; परंतु इतिहास इसका साक्षी है । इसके परिणामस्वरूप वर्ष ७१२ के उपरांत मुगलों एवं ब्रिटिश शासकों द्वारा हमारे सांस्कृतिक वैभव को क्षतविक्षत करनेवाली भयावह कहानियों का विस्तृत ऐतिहासिक वृत्तांत सभी जानते हैैं, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता । हमें हमारी गुलामी का तथा अधःपतन का विस्तृत इतिहास सिखाया गया । हम उदारमतवादी एवं सहिष्णु रह गए; किंतु उसी समय हम कायरता एवं संघर्षहीनता, इन दुर्गुणों से ग्रस्त रहे ।
३. हिन्दुओं को उनके गौरवशाली इतिहास का विस्मरण
वरिष्ठ लेखक तथा राष्ट्रवादी विचारक स्वर्गीय भानूप्रताप शुक्ल के कुछ वर्ष प्रकाशित एक लेख के अनुसार ‘देशवासियों का एक वर्ग यदि दूसरे वर्ग पर, एक समुदाय दूसरे समुदाय पर, एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय पर आक्रमण कर रहा हो, साथ ही हिंसा, हत्या, लूट, आगजनी, बलात्कार एवं अपहरण कर रहा हो अथवा वैसे करने का प्रयास कर रहा हो अथवा करना आरंभ कर रहा हो, तो उस स्थिति में पीडित समाज को क्या करना चाहिए ? क्या अपना घर जलाने देना चाहिए ?, अपनी बहन-बेटियों के साथ बलात्कार होने देना चाहिए ? समाजविरोधी तत्त्वों को लूटने के लिए हमारा घर सौंप देना चाहिए और क्या हमारी महिलाओं का अपहरण करने के लिए आमंत्रित करना चाहिए ? आपकी संतुष्टि के लिए आपको जो करना है, वह कीजिए; हम कुछ नहीं बोलेंगे ।’ वास्तव में स्वर्गीय शुक्लाजी के मन में देशद्रोहियों एवं जिहादियों के विरुद्ध इतना तीव्र क्षोभ एवं हिन्दुओं की असहायता के प्रति इतना उद्वेग था कि उन्होंने इस सच्चाई को इतनी स्पष्टता एवं हृदय विदीर्ण करनेवाली पद्धति से समाज के सामने रखा ।
आप इस बात को ध्यान में रखिए कि जब किसी राष्ट्र एवं समाज में अनैतिकता एवं दुराचार के विरुद्ध क्रोध उत्पन्न होता है, तब किसी चाणक्य को कुशासन के विरुद्ध अपनी शिखा खुली छोडनी पडती है; क्योंकि धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा सर्वाेपरि होती है । निःसंदेह ही हम अपना स्वर्णिम काल एवं गौरवशाली इतिहास भूल गए हैं । दुर्भाग्यवश इतिहास के उन प्रेरणाध्यायी अध्यायों एवं ग्रंथों का सान्निध्य हमें नहीं मिल पाया । हिन्दू समाज ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ पर विश्वास करता है, उसी प्रकार ‘शस्त्रमेव जयते’ का उद्घोषक तथा शास्त्रों एवं शस्त्रों का उपासक भी रहा है । ‘अश्वमेध यज्ञ’ के लिए विजयरथ पर आरूढ महान योद्धाओं के वंशज होते हुए भी हम केवल सम्राट अशोक के कलिंग के युद्ध के उपरांत अहिंसात्मक प्रेम की ओर आकर्षित क्यों हुए ?- विनोदकुमार सर्वोदय, राष्ट्रवादी विचारक एवं लेखक, उत्तर प्रदेश
हिन्दुओ, शांति के लिए शक्ति के उपासक बनिए !वर्तमान समय में देशभक्त राष्ट्र्रवादी हिन्दुओं को सांप्रदायिक ठहराकर आलोचना का सामना करना पड रहा है । हमारे शत्रु पाकिस्तान एवं जिहादियों के विरुद्ध जब आक्रामक बनने का विचार प्रचारित किया जाता है, तब भी हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहा जाता है । चाहे ‘समान नागरिक कानून’ की चर्चा हो अथवा धर्मांध बांग्लादेशी, पाकिस्तानी तथा रोहिंग्या घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के विषय में जनता का आक्रोश हो; हिन्दुओं पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाना आधुनिकतावादी विचार माना जाता है । ऐसी कठिन स्थिति में सनातन संस्कृति एवं भारतभूमि की रक्षा हेतु हिन्दुओं को यदि कट्टरपंथी, सांप्रदायिक एवं संविधान की रक्षा करते समय हिंसक भी होना पडे, तो उसमें अनुचित क्या है ? महर्षि अरविंद ने कुछ वर्ष पूर्व यह लिखकर रखा था कि ‘हमने हमारी शक्ति त्याग दी है; इसीलिए शक्ति ने भी हमें त्यागा है ।’ अतः सनातन में अंतर्भूत हिन्दुत्व के मूलभूत सिद्धांतों को समझ लीजिए तथा शांति के लिए ‘शक्ति’ के उपासक बनिए !’ – विनोदकुमार सर्वोदय, राष्ट्र्रवादी विचारक एवं लेखक, उत्तर प्रदेश |
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