प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ७ वर्ष के लंबे अंतराल के बाद की गई चीन यात्रा को देश के माध्यमों से बडी प्रसिद्धि मिली । चीन व रूस के राष्ट्रप्रमुखों से हुई उनकी भेंट को समाचार पत्रों व समाचार वाहिनियों पर विशेष महत्त्व दिया गया । मोदी की जापान यात्रा की अपेक्षा चीन यात्रा पर पूरे विश्व का ध्यान था । वहां मोदी द्वारा दिए भाषण तथा चीन द्वारा उनके आतिथ्य को देखते हुए इन देशों में पुनः निकटता बढ रही है, ऐसा दिखाई दिया । ७० वर्ष उपरांत क्या पुनः ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का नारा सुनने को मिलेगा ?, ऐसा वातावरण तैयार हुआ । मोदी को सदा ही अमेरिका का आकर्षण रहा है । अमेरिका के राष्ट्रपति से हमारे कैसे निकट संबंध हैं, इसे वे अपनी बातों से सदैव दिखा देते थे । अमेरिका जाकर मोदी ने पहले के चुनाव में ‘अब की बार ट्रम्प सरकार’ का नारा दिया था; परंतु पिछले कुछ महिनों से वे राष्ट्रपति ट्रम्प से दूरी बनाए हुए हैं तथा अब उन्हें रूस व चीन के प्रति अधिक अपनापन लग रहा है । ट्रम्प ने भारत पर बडे आयात कर तो लगाए ही; साथ ही ‘मैंने ही भारत-पाकिस्तान का युद्ध रुकवाया’, ऐसी डींग भी मारी । तब से मोदी ने ट्रम्प का नाम लेना बंद किया ।
लेखक : डॉ. सुकृत खांडेकर, पूर्व संपादक, मुंबई.

१. वर्ष १९६२ के युद्ध में चीन से भारत की पराजय
जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रीपद के कार्यकाल में वर्ष १९५० के दशक में ‘हिन्दी-चीनी भाई भाई’ के नारे उफान पर थे; परंतु चीन पर विश्वास करना भारत को भारी पडा । चीन ने वर्ष १९६२ में भारत पर आक्रमण कर भारत की पीठ में खंजर घोंपा । इस युद्ध में भारत को चीन से हार झेलनी पडी । इसमें चीन ने भारत की सैकडों वर्ग कि.मी. भूमि हडप ली, जिसमें से एक इंच भूमि भी चीन ने भारत को वापस नहीं की है । वर्ष १९६२ के भारत में तथा वर्तमान वर्ष २०२५ के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है । वर्तमान में भी चीन भारत की अपेक्षा आर्थिक दृष्टि से सशक्त तथा रक्षा तैयारी में भी अधिक सक्षम एवं सुसज्जित है ।

२. चीन को भारत पर आक्रमण करने से सीखने को मिला पाठ
चीन ने केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व के सभी प्रमुख बाजारों पर नियंत्रण स्थापित किया है । भारत भले ही रक्षा क्षेत्र में सक्षम है, तब भी चीन के समक्ष उसे बचावात्मक नीति अपनानी पडती है, यह वास्तविकता है । लद्दाख इसका उदाहरण है । विगत ४-५ वर्षाें से इन दोनों देशों की सेनाओं में चल रही मुठभेड की घटनाओं तथा तनाव के उपरांत अब सहमति बनी है । भारत-चीन सीमा पर अपने प्रदेश की रक्षा हेतु भारतीय सेना को १२ महिने एवं २४ घंटे सतर्क रहना पडता है । दोनों देशों के सेनादलों तथा राजनीतिक स्तरों पर ३१ बैठकें हुईं । उसके उपरांत दोनों देशों ने अपनी-अपनी सीमारेखा अप्रैल २०२० की भांति बनाए रखना तथा दोनों देश सेनाएं वापस लें, ऐसा सुनिश्चित किया । विगत ५ वर्षाें से दोनों देशों की ५० सहस्र सशस्त्र सेना, तोपें एवं टैंकों का एक-दूसरे के सामने खडे रहने से भारत-चीन सीमा पर निरंतर तनाव का वातावरण था ।
जून २०२० में गलवान घाटी में चीनी सेना द्वारा अकस्मात किए आक्रमण में २० भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए । उसके उपरांत भारत द्वारा किए प्रतिआक्रमण में चीन के ५० सैनिक मारे गए । रूससहित अनेक देशों ने चीन के सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की । ‘भारत अब सुरक्षा व्यवस्था में बहुत आगे है तथा भारत के साथ युद्ध करना सरल नहीं’, यह चीन को समझ में आ गया है । डोकलाम में भी चीनी सेना को यही अनुभव मिला । लद्दाख सीमा पर हुई मुठभेड में भी भारतीय सेना ने चीन की सेना को अपनी शक्ति दिखा दी । सीमा पर युद्धजन्य स्थिति बनाए रखकर उसके बदले में भारत का बाजार गंवाना चीन के लिए लाभप्रद नहीं है ।
३. ‘ब्रिक्स’ के परिप्रेक्ष्य में भारत एवं चीन का महत्त्व
२०१९ में महाबलीपुरम् में प्रधानमंत्री मोदी एवं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मिलने के उपरांत ‘ब्रिक्स’ शिखर सम्मेलन के उपलक्ष्य में पुनः इन नेताओं में द्विपक्षीय बातचीत हुई । रूस, चीन एवं भारत ‘ब्रिक्स’ के संस्थापक हैं । यदि इन्हीं देशों में सुसंवाद नहीं, तो विश्व स्तर पर ‘ब्रिक्स’ का महत्त्व कैसे बढेगा ? पिछले कुछ वर्षाें में कुछ संवेदनशील स्थानों को छोडकर पेगाँग लेक, गलवान, हॉट स्प्रिंग, गोगरा आदि स्थानों से भारत एवं चीन ने अपनी सेनाएं वापस ली हैं ।

४. ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ नारे लगाने की शीघ्रता न करें !
‘शांघाई सहयोग परिषद’ के उपलक्ष्य में भले ही ‘मोदी एवं शी जिनपिंग मिले हों, तो भी अब तक के अनुभव के आधार पर, भारत को चीन पर विश्वास नहीं करना चाहिए तथा ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का नारा लगाने की शीघ्रता नहीं दिखानी चाहिए, ऐसा रक्षा विशेषज्ञों का विचार है । चीन की सरकार के सामने बेरोजगारी एवं अर्थव्यवस्था को सुदृढ रखने की बडी चुनौती है । डोनल्ड ट्रम्प की नई ‘टैरिफ’ नीति के उपरांत चीन के विदेशमंत्री वांग यी ने भारत यात्रा की । चीनी उत्पादकों के लिए भारत का बाजार उनकी आवश्यकता है, इसे हमें सदैव ध्यान में रखना चाहिए । दूसरी ओर अमेरिका के दबाव के सामने भारत को भी चीन के साथ संबंध दृढ रखना आवश्यक है । भाजपा एवं रा.स्व. संघ परिवार को चीन सदा ही भारत का शत्रु लगता रहा है । ‘दीपावली तथा अन्य त्योहारों पर चीनी वस्तुएं न खरीदें’, ऐसा आवाहन किया गया था ।
५. भारत का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ व पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध चीनी हथियार व तकनीक का उपयोग
पहलगाम में आतंकियों द्वारा भारतीय पर्यटकों की गोली मारकर हत्या करने के उपरांत भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर पाकिस्तान में घुसकर उसके आतंकी अड्डों पर आक्रमण किए । पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत का लडाकू विमान गिरा देने की चर्चा हुई । पाकिस्तानी सेना ने भारत के विरुद्ध चीनी हथियारों एवं तकनीक का उपयोग किया । चीनी हथियारों एवं तकनीक ने भारतीय सेना को निश्चित रूप से कितनी हानि पहुंचाई, इसके आंकडे सामने नहीं आए हैं; उसके कारण ही चीन के साथ संबंधों में सुधार लाते समय भारत को सतर्क रहना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है । युद्धविराम के उपरांत प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में दिए भाषण में आवाहन किया था कि भारत में ‘मेक इन इंडिया’ को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए व लोगों को स्वदेशी वस्तुएं खरीदनी चाहिए । ‘अधिक लाभ के लिए व्यापारियों को विदेशी वस्तुएं नहीं बेचनी चाहिए ।’
६. ‘शांघाई सहयोग परिषद’ में भारत को सफलता
वर्ष २००१ में स्थापित ‘शांघाई सहयोग परिषद’ में १६ वर्ष उपरांत भारत एवं पाकिस्तान सहभागी हुए । मोदी ने ‘एस.सी.ओ.’ का वर्णन ‘सिक्युरिटी’ (सुरक्षा), ‘कनेक्टिविटी (यातायात) एवं ‘ओपर्चुनिटी’ (अवसर) इन शब्दों में किया । इस परिषद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ भी थे । तियानजिन के परिषद में पारित प्रस्ताव में २२ अप्रैल २०२५ को पहलगाम में हुए आतंकी आक्रमण की निंदा की गई, यह भारत की बडी सफलता है । रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एवं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भेंट ने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया । इन देशों की निकटता से अमेरिका अप्रसन्न होगा, इससे तीनों नेता अवगत हैं । ‘ड्रैगन’ (चीन) एवं ‘हाथी’ (भारत) एक-दूसरे के कितने निकट आएंगे, यह निकट भविष्य में ज्ञात होगा ।
(साभार : ‘इये मराठीचिये नगरी’का जालस्थल)
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