सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ओजस्वी विचार

साधना के संदर्भ में भारत का महत्त्व समझ लें !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

‘ईश्वरप्राप्ति हेतु साधना करनी हो, तो भारत को छोडकर संसार के किसी भी देश में न रहें; क्योंकि भारतीयों की स्थिति भले ही बुरी हो, तब भी भारत जैसा सात्त्विक देश संसार में कहीं नहीं है । अन्य सभी देशों में रज-तम की मात्रा अत्यधिक है; तथापि ५० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त व्यक्ति संसार में कहीं भी रहकर साधना कर सकते हैं ।’


संतान को साधना न सिखाने का परिणाम !

‘वृद्धावस्था में संतान ध्यान नहीं देती, ऐसा कहनेवाले वृद्धजनो, आपने संतान पर साधना के संस्कार नहीं किए, इसका यह फल है । इसलिए संतान के साथ आप भी उत्तरदायी हैं !’


व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थको, मानव को मानव देहधारी प्राणी मत बनाओ !

‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर उसके समर्थक आसमान सिर पर उठा लेते हैं । वे भूल जाते हैं कि प्राणी एवं मानव में महत्त्वपूर्ण भेद यही है कि प्राणी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अनुसार अर्थात स्वेच्छा से आचरण करते हैं; इसके विपरीत मानव से अपेक्षित है कि वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता भुलाकर, क्रमशः परिवार, समाज राष्ट्र एवं धर्म के हित का विचार कर आचरण करे, अर्थात चरण-दर-चरण स्वेच्छा के स्थान पर परेच्छा से आचरण करे अर्थात अंत में ईश्वरेच्छा से आचरण करे । ऐसा करने पर ही वह वास्तव में मानव बनता है; अन्यथा वह केवल मानव देहधारी प्राणी रह जाता है !’


विज्ञान तथा अध्यात्म में भेद !

‘विज्ञान को सूचना एकत्र कर किसी प्रश्न का उत्तर खोजना पडता है; इसके विपरीत अध्यात्म में प्रगति होने पर सूचना एकत्र नहीं करनी पडती । किसी भी प्रश्न का उत्तर तत्काल मिलता है !’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले