
विद्यालय जानेवाले बच्चों को सदैव बताया जाता है, ‘छडी बाजे छम छम विद्या आवे घम घम ।’ पहले अध्यापकों को छात्रों को दंडित करने के लिए लाठी के उपयोग की अनुमति थी; परंतु वर्तमान में बच्चों पर लाठी का प्रयोग करने से पूर्व शिक्षकों को १० बार विचार करना पडता है; कारण है अभिभावकों द्वारा इसका किया जानेवाला विरोध ! लाठी का प्रत्यक्ष उपयोग कब करना है तथा उसकी धाक कैसे जमानी है ?, यह शिक्षकों को अच्छे से ज्ञात होता है । विगत अनेक वर्षाें से कांग्रेस के मन में ऐसी ही एक लाठी की तथा उसका उपयोग करनेवाले एक संगठन की धाक एवं उसका भय है । इस भय के कारण कारण कांग्रेस निरंतर इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करती रहती है । अभी तक कांग्रेस की सरकार ने ३ बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया तथा कुछ समय पश्चात उसे हटाया, तब भी कांग्रेस का मन भरा नहीं है । जब-जब मुसलमानों तथा आधुनिकतावादियों के मतों की कांग्रेस को अधिक आवश्यकता होती है अथवा उसे अपना हिन्दूद्वेष दिखाना होता है, तब-तब कांग्रेस संघ की आलोचना करती है अथवा उस पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करती है । अब कर्नाटक राज्य की कांग्रेस सरकार के मंत्री तथा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे के पुत्र प्रियांक खर्गे से संघ की सार्वजनिक स्थानों पर लगनेवाली शाखाओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है । उस पर राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या ने इस विषय में जांच कर उचित निर्णय लेने की बात कही है । ‘संघ की शाखा में सिखाए जानेवाले स्वरक्षा प्रशिक्षण से तथा उसमें उपयोग की जानेवाली लाठी से समाज को भय लगता है तथा राज्य के बच्चों, युवाओं तथा समाज के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका विपरीत परिणाम होने से यह प्रतिबंध लगाया जाए’, ऐसी मांग मंत्री प्रियांक खर्गे की ओर से की गई है । इसमें निजी सभागारों में लगनेवाली शाखाओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं की गई है, ऐसा ध्यान में आता है । इस मांग में ‘हमें संघ के प्रदर्शनों से भय लगता है’, यह जो कारण दिया गया है; तो क्या वह जनता के लिए है अथवा देशद्रोही, धर्मांधों एवं हिन्दूद्वेषियों के लिए है ? ऐसे लोगों पर संघ की लाठी का प्रहार निरंतर होता आया है तथा इन लोगों में इस लाठी का ही भय होने से वे निरंतर संघ की आलोचना करने का प्रयास करते हैं । इसके कारण ही ऐसे लोगों को संतुष्ट करने के लिए कांग्रेस ने यह प्रतिबंध लगाने की मांग की । कांग्रेस को सत्ता में बिठाए जाने के उपरांत अब तक जो हिन्दूद्वेषी निर्णय लिए गए, उन्हें देखते हुए क्या राज्य के हिन्दुओं को कांग्रेस को सत्ता पर आसीन करने का पश्चाताप हुआ है ?’, यह प्रश्न मन में उठता है । इसके साथ ही भाजपा को भी इस पर विचार करना चाहिए । कर्नाटक की भाजपा के भ्रष्टाचार के कारण ही जनता से उसे सत्ता से हटाकर कांग्रेस को पुनः सत्ता में बिठाया । दोनों बार हानि तो हिन्दुओं की ही हुई है, ऐसा ही इस मांग से ध्यान में आता है । दूसरी ओर नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक के कांग्रेस के नेताओं ने संघ की प्रशंसा कर संघ की सहायता ली है, इस विरोधाभास को ध्यान में रखना होगा ।
कांग्रेस ने ही की संघ की प्रशंसा !
वर्ष १९६२ के भारत चीन-युद्ध के समय नेहरू के अनुरोध पर संघ ने सीमावर्ती क्षेत्रों में, नागरी रक्षा हेतु, यातायात, अन्न वितरण, अनुशासन एवं शरणार्थियों की सेवा के लिए तत्काल अपने स्वयंसेवक भेजे । उस समय नेहरू ने ‘संघ का कार्य उत्कृष्ट देशभक्तिपूर्ण है’, ऐसा बोलकर संघ की प्रशंसा की तथा वर्ष १९६३ के गणराज्य दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संचलन में सहभागी होने के लिए संघ को औपचारिक निमंत्रण दिया । उस समय संघ के स्वयंसेवकों ने पथसंचलन किया था, यह घटना आज भी आधिकारिक रूप से प्रविष्टियों में उल्लेखित है । नेहरू ने संघ के विचार स्वीकार नहीं किए; परंतु उनकी कार्यशक्ति एवं संगठन अनुशासन की प्रशंसा की थी । वर्ष १९६५ के भारत-पाक युद्ध के उपरांत अनेक स्वयंसेवकों को गृह मंत्रालय की ओर से प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए । संकटकाल में संघ द्वारा दिए योगदान के कारण उस समय के कुछ कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने भी सार्वजनिक रूप से संघ के कार्यकर्ताओं की प्रशंसा की । जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब वर्ष १९७१ के भारत-पाक युद्ध में संघ के स्वयंसेवक शरणार्थियों की सेवा में, रक्तदान शिविरों के आयोजन में तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में कार्यरत थे । उस समय इंदिरा गांधी ने इस देशसेवा के लिए संघ का आभार व्यक्त किया था । इंदिरा गांधी ने वर्ष १९८० में एक निजी संभाषण में संघ के कार्यकर्ताओं के अनुशासन का तथा उनके निःस्वार्थ कार्य का संज्ञान लिया था । वर्ष १९८६ में राजीव गांधी की सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि के द्वार खोलने का निर्णय लिया तथा दूरदर्शन पर ‘रामायण’ धारावाहिक के प्रसारण की अनुमति दी । उस काल में राजीव गांधी ने संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना के विषय में बोलते हुए वक्तव्य दिया था कि ‘सांस्कृतिक चेतना राष्ट्र को बांधकर रखनेवाली शक्ति है ।’
कांग्रेस से होनेवाली आलोचना
कांग्रेस सदैव ही संघ पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ की संकल्पना पर धार्मिक विभाजन बढाने का आरोप लगाती है । कांग्रेस का मत यह रहा है कि संघ की हिन्दुत्वनिष्ठ विचारधारा के कारण देश के अल्पसंख्यक समुदाय में भय का वातावरण रहता है; परंतु ‘इन्हीं अल्पसंख्यकों के कारण अर्थात मुसलमानों के कारण हिन्दुओं में भय का वातावरण है’, ऐसा कांग्रेस को कभी भी नहीं लगता, इसे ध्यान में लेना होगा । इसी कांग्रेस ने मोहनदास गांधी की हत्या के उपरांत सहस्रों ब्राह्मणों की हत्या करने सहित उन्हें प्रचंड आर्थिक हानि पहुंचाई । इसी कांग्रेस के नेताओं ने इंदिरा गांधी की हत्या के उपरांत ३.५ सहस्र सिखों की हत्या की । इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीपद के कार्यकाल में प.पू. करपात्री महाराजजी के नेतृत्व में गोहत्या बंदी कानून की मांग करनेवाले मोर्चा पर गोलीबारी कर अनेक साधु-संतों को मारा गया । कश्मीर से हिन्दुओं को पलायन करना पडा, उनका हत्याकांड हुआ; परंतु इसका कांग्रेस को कभी दुख नहीं हुआ । ऐसी कांग्रेस को संघ पर आरोप लगाने में कभी लज्जा प्रतीत नहीं हुई । ‘संघ भले ही स्वयं को सामाजिक संगठन कहता हो, तब भी उसका अप्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव (विशेषकर जनसंघ तथा उसके उपरांत भाजपा) बढता है’, यह कांग्रेस का आरोप था । मोहनदास गांधी की हत्या के उपरांत कांग्रेस ने संघ पर देश में विद्वेष फैलाने का आरोप लगाया तथा इसी कारण से संघ पर पहली बार प्रतिबंध लगाया । कांग्रेस के कुछ नेताओं के अनुसार संघ कांग्रेसविरोधी जनभावना भडकाता है तथा उसके राजनीतिक नियंत्रण को चुनौती देता है । उसके कारण संघ पर ‘अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति’ का लेबल लगाया गया । कांग्रेसवाले कितने लोकतंत्रप्रेमी है, यह पूरा विश्व जानता है । कांग्रेस ने अलोकतांत्रिक पद्धति से विरोधी दलों की कितनी राज्य सरकारें बरखास्त की, इसकी कोई गणना ही नहीं है । ऐसी कांग्रेस को संघ को अलोकतांत्रिक बोलने का अधिकार ही नहीं है । अब देखना होगा कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार प्रतिबंध की इस मांग पर क्या निर्णय लेती है । ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ।’ (अर्थ : जब विनाशकाल निकट आता है, तब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है), ऐसा कहा जाता है । ‘कांग्रेस ने यदि संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध लगाया, तो समझिए उसका विनाशकाल निकट आ गया है’, इस बात को भी कांग्रेस को ध्यान में रखना चाहिए ।
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कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने यदि रा.स्व. संघ की शाखाओं पर प्रतिबंध लगाया, तो उसका यह निर्णय कांग्रेस के राजनीतिक विनाश का कारण बनेगा ! |

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