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मुंबई – ‘तारीख पर तारीख’ के इस दुष्चक्र में २७ वर्ष फंसे रहने के उपरांत न्याय की प्रतीक्षा से हताश हुए नामदेव जाधव ने पुणे न्यायालय के भवन से कूदकर अपना जीवन समाप्त कर लिया । यह आत्महत्या नहीं, अपितु विलंब एवं उदासीनता से ग्रसित व्यवस्था द्वारा की गई हत्या ही कहलाएगी । आज भी देशभर के न्यायालयों में ५ करोड से अधिक प्रकरण प्रलंबित हैं । नीति आयोग के अनुसार, इन सबको निकालने में ३२४ वर्ष लगेंगे, अर्थात अनेक पीढ़ियों एवं करोड़ों लोगों को न्याय नहीं मिलेगा । अंततः प्रश्न यह है कि ‘तारीख पर तारीख’ का यह क्रम कब तक चलेगा ? नामदेव जाधव को न्याय कब मिलेगा ? – यह प्रश्न सनातन संस्था के प्रवक्ता श्री अभय वर्तक ने एक प्रसिद्धि-पत्र द्वारा सरकार के समक्ष उपस्थित किया ।
श्री वर्तक आगे बोले, ‘‘जाधव का मृत्यु-प्रकरण प्रलंभित प्रकरणों के विशाल पर्वत का केवल एक सिरा है । वर्तमान में देशभर के न्यायालयों में लगभग ५ करोड ३ लाख से अधिक प्रकरणों का पर्वत खडा है । इनमें से सर्वाधिक अर्थात् ४ करोड ७ लाख प्रकरण जिला तथा तालुका न्यायालयों में प्रलंबित हैं, जहां सामान्य नागरिक न्याय के लिए प्रथम बार आवेदन देता है । आश्चर्यजनक यह है कि इनमें से १ लाख ८ सहस्र से अधिक प्रकरण ३० वर्ष से भी अधिक समय से प्रलंबित हैं, तथा कुछ तो ५० वर्ष से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं ।’’
न्यायाधीशों के सहस्रों पद रिक्त !
इस न्यायालयीन विलंब का मूल कारण प्रशासन की उदासीनता है । भारत में प्रति १० लाख जनसंख्या पर केवल १५ न्यायाधीश कार्यरत हैं, जबकि अमेरिका में यह अनुपात १५० तथा यूरोप में २२० है । विधि आयोग ने अनेक दशक पूर्व प्रति करोड ५० न्यायाधीश रखने की अनुशंसा की थी; परंतु हम वह लक्ष्य भी प्राप्त नहीं कर सके । अक्तूबर २०२५ तक देश के २५ उच्च न्यायालयों में न्यायमूर्तियों के २६ प्रतिशत तथा जिला न्यायालयों में ५ सहस्र २०० से अधिक न्यायाधीशों के पद वर्षानुवर्ष रिक्त हैं । इन रिक्त पदों के कारण कार्यरत न्यायाधीशों पर कार्यभार अत्यधिक बढ जाता है, जिससे प्रकरणों के निपटारे की गति मंद पड़ती है तथा न्याय प्राप्ति में विलंब होता है । न्यायव्यवस्था पर होने वाला व्यय तो देश के सकल राष्ट्रीय उत्पादन का केवल ०.०८ प्रतिशत है, जो मूलभूत सुविधाओं की न्यूनता से स्पष्ट होता है ।
करोड़ों प्रलंबित प्रकरणों को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित किया जाए !
नागरिकों का न्याय पर से विश्वास न डगमगाए, इसलिए सरकार को इस समस्या को ‘राष्ट्रीय आपदा’ मानकर युद्धस्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है । प्रत्येक प्रकरण को निश्चित समयसीमा में निपटाने हेतु राष्ट्रीय नीति बनाकर उसका कठोर पालन करना, न्यायाधीशों की संख्या को अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार वृद्धि, सभी रिक्त पदों को शीघ्र भरना, न्यायालयीन आधारभूत संरचना में निवेश करना, विधिक प्रक्रियाओं में सुधार करना तथा प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग करना आवश्यक है । इन सब उपायों के समन्वित प्रयास से ‘सभी के लिए समय पर न्याय’ यह उद्देश्य साध्य हो सकता है, ऐसा श्री वर्तक ने अपने प्रसिद्धि-पत्र में कहा है ।
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