Govind Pansare Case : डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे, अमोल काळे तथा शरद कळसकर की जमानत स्‍वीकार !

कॉ. गोविंद पानसरे हत्‍या प्रकरण

कोल्‍हापुर, १४ अक्‍टूबर (वार्ता.) –  कोल्‍हापुर स्‍थित मुंबई उच्‍च न्‍यायालय की ‘सर्किट बेंच’ (न्‍यायालय का एक अस्‍थायी स्‍थान, जहां उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायमूर्ति निश्‍चित अवधि में आकर अभियोग (प्रकरण) चलाते हैं) द्वारा कॉ. गोविंद पानसरे हत्‍या प्रकरण के संदिग्‍ध तथा सनातन संस्‍था के साधक डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे के साथ अमोल काळे तथा शरद कळसकर की १४ अक्‍टूबर को जमानत स्‍वीकार कर ली गई । यह जमानत न्‍यायमूर्ति शिवकुमार डिगे ने स्‍वीकार की । इस अवसर पर अधिवक्‍ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर के साथ सातारा के अधिवक्‍ता गुरुराज रसाळ सहित अन्‍य अधिवक्‍ता उपस्‍थित थे ।

निर्णय आने के उपरांत मुंबई उच्‍च न्‍यायालय के सर्किट बेंच के सामने उपस्‍थित अधिवक्‍ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर तथा अन्‍य अधिवक्‍ता

१. डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे की वर्ष २०१८ में कोल्‍हापुर के जिला तथा सत्र न्‍यायालय ने जमानत स्‍वीकार की थी । जमातन स्‍वीकार होने पर भी डॉ. तावडे, डॉ. नरेंद्र दाभोलकर हत्‍या प्रकरण में जमानत न मिलने के कारण पुणे के कारागृह में थे ।

२. डॉ. तावडे को डॉ. नरेंद्र दाभोलकर प्रकरण में १० मई २०२४ को निर्दोष मुक्‍त किए जाने के उपरांत वे कारागृह से बाहर आए थे ।

३. इसके उपरांत डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे की जमानत कोल्‍हापुर के जिला तथा सत्र न्‍यायाधीश एस.एस. तांबे ने १६ जुलाई २०२४ को निरस्‍त कर दी थी । इस कारण, रिहाई के पश्‍चात केवल २ माह की अवधि में डॉ. तावडे को फिर से कारागृह जाना पडा ।

४. अंतत: १४ अक्‍टूबर २०२५ को मुंबई उच्‍च न्‍यायालय की ‘सर्किट बेंच’ द्वारा डॉ. तावडे की जमानत स्‍वीकार की गई ।

५. इस प्रकरण में कुल १२ संदिग्‍ध हैं तथा मुंबई उच्‍च न्‍यायालय द्वारा कॉ. पानसरे हत्‍या प्रकरण में संदिग्‍ध सचिन अंदुरे, गणेश मिस्‍कीन, अमित डेगवेकर, भरत कुरणे, अमित बद्दी एवं वासुदेव सूर्यवंशी की इससे पहले ही जमानत स्‍वीकार की जा चुकी है । इसी के साथ इस प्रकरण के संदिग्‍ध समीर गायकवाड को भी इससे पहले ही जमानत मिल चुकी है ।

बचाव पक्ष के अधिवक्‍ताओं का प्रभावी युक्‍तिवाद !

मुंबई उच्‍च न्‍यायालय में बचाव पक्ष की ओर से ज्‍येष्ठ अधिवक्‍ता नितीन प्रधान, जबकि कोल्‍हापुर के खंडपीठ में हिन्‍दू विधिज्ञ परिषद के अध्‍यक्ष अधिवक्‍ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर तथा अधिवक्‍ता सिद्धविद्या ने युक्‍तिवाद किया । उसमें ‘सरकारी गवाह सागर लाखे की गवाही हत्‍या के साढे तीन वर्ष उपरांत प्रविष्‍ट की गई । वर्ष २०१८ में जमानत मिलने के बाद सरकारी पक्ष ने उच्‍च न्‍यायालय में की गई अपील वर्ष २०२३ में स्‍वयं ही वापस ले ली थी, साथ ही इसी प्रकरण के अन्‍य ६ संदिग्‍ध आरोपियों को जमानत मिलने के कारण समान न्‍याय के सिद्धांत पर अन्‍य आरोपियों को जमानत मिलनी चाहिए’, ऐसा युक्‍तिवाद किया गया । इसी सुनवाई में निर्दोष अन्‍य हिन्‍दुत्‍वनिष्ठ श्री अमोल काळे तथा श्री शरद कळसकर की ओर से पूर्व न्‍यायमूर्ति एवं अधिवक्‍ता पुष्‍पा गनेडीवाला ने प्रभावी युक्‍तिवाद किया । उसे न्‍यायालय ने स्‍वीकार कर संदिग्‍धों की जमानत स्‍वीकार की ।

इसी के साथ, कोल्‍हापुर स्‍थित जिला न्‍यायालय में इस अभियोग की शुरुआत से ही सांगली के अधिवक्‍ता समीर पटवर्धन, अधिवक्‍ता प्रीति पाटिल नियमित रूप से पैरवी कर रहे हैं ।

निरपराध हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों के व्‍यर्थ गए साढे नौ वर्षों की भरपाई कौन करेगा? – अभय वर्तक, प्रवक्‍ता, सनातन संस्‍था

श्री. अभय वर्तक, प्रवक्‍ता, सनातन संस्‍था

कोल्‍हापुर – कॉम्रेड गोविंद पानसरे हत्‍या प्रकरण में हिन्‍दुत्‍वनिष्ठ डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे, श्री. अमोल काळेे और श्री. शरद कळसकर को मुंबई उच्‍च न्‍यायालय की कोल्‍हापुर खंडपीठ ने जमानत दे दी है । न्‍यायमूर्ति शिवकुमार डिगे द्वारा दिए गए इस निर्णय से, लगभग ९ वर्ष ६ महीने की लंबी न्‍यायिक लडाई के पश्‍चात डॉ. तावडे की रिहाई का रास्‍ता खुल गया है । इस पृष्ठभूमि पर, सनातन संस्‍था के प्रवक्‍ता श्री. अभय वर्तक ने सभी अधिवक्‍ताओं को उनकी सफल लड़ाई के लिए बधाई दी है । उन्‍होंने प्रसारित प्रेस विज्ञप्‍ति में कहा कि “इससे पहले ’कोल्‍हापुर बार काउंसिल’ द्वारा बचाव पक्ष को अधिवक्‍ता देने से इनकार करना तथा अब प्रगतिशीलों द्वारा जमानत निरस्‍त करने के लिए दबाव बनाना, कुल मिलाकर प्रगतिशील एवं कम्‍युनिस्‍टों के ’दबाव समूहों’ के कारण निर्दोषों का जीवन कैसे नष्‍ट हो जाता है, यह दिखाई देता है । एक ’गोल्‍ड मेडलिस्‍ट’ ई.एन.टी. सर्जन डॉक्‍टर को (कान-नाक-गला विशेषज्ञ को) ९ वर्ष कारागृह में रहना पडता है, यह इसका हृदय विदारक उदाहरण है । इन सबके जीवन के व्‍यर्थ गए बहुमूल्‍य वर्षों की भरपाई कौन करेगा ?”

उन्‍होंने आगे कहा:

१. दीपावली की पूर्व संध्‍या पर हिन्‍दू समाज को आनंद देनेवाला समाचार मिला है । हाल ही में मालेगांव प्रकरण के हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों की निर्दोष मुक्‍ति हुई, अब पानसरे प्रकरण से भी सभी हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों को जमानत मिल गई । इसलिए सही अर्थ में इस वर्ष हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों की दिवाली मनाई जाएगी ।

२. ‘जनवरी २०१८ में पानसरे प्रकरण में कोल्‍हापुर सत्र न्‍यायालय ने डॉ. तावडे को जमानत दी थी; किंतु दाभोलकर प्रकरण में वे कारगृह में होने के कारण उनकी रिहाई नहीं हो सकी । १० मई २०२४ को जब दाभोलकर प्रकरण में वे निर्दोष प्रमाणित होकर बाहर आए, तब पानसरे परिवार तथा कम्‍युनिस्‍ट शक्‍तियों ने उनकी जमानत निरस्‍त कराने के लिए अभियान चलाया । बाद में जमानत निरस्‍त होने के कारण उन्‍हें पुनः कारागृह जाना पडा । अब उच्‍च न्‍यायालय के निर्णय से अंतत: उन्‍हें न्‍याय मिला है ।

३. ‘देर से मिला न्‍याय अन्‍याय ही होता है,’ यह न्‍यायालय का सिद्धांत डॉ. तावडे, श्री. काळे और श्री. कळसकर के प्रकरण में पूर्ण रूप से लागू होता है । जिन शक्‍तियों ने न्‍याय प्रक्रिया में बाधा डालकर यह देरी करवाई, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए । इस न्‍यायालयीन लडाई को जमानत मिलने से आधी सफलता मिली है, ईश्‍वर की कृपा से इन सभी की शीघ्र ही निर्दोष मुक्‍ति होकर संपूर्ण सफलता मिलेगी, ऐसी हमारी न्‍यायदेवता पर श्रद्धा है ।

डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे तथा अन्‍य आरोपियों को जमानत मिलने पर प्रतिक्रिया !

‘मीडिया ट्रायल’ के कारण आरोपियों को कई वर्षों तक कारागृह में रहना पडा! – अधिवक्‍ता प्रकाश साळसिंगीकर, मुंबई उच्‍च न्‍यायालय

अधिवक्‍ता प्रकाश साळसिंगीकर, मुंबई उच्‍च न्‍यायालय

इस अभियोग में आरंभ से ही विभिन्‍न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा राजनीतिक बयानबाजी की जा रही थी । ‘मीडिया ट्रायल’ के कारण इस अभियोग में आरोपियों को कई वर्षों तक कारागृह में रहना पडा । जैसे सभी आरोपियों को जमानत मिली, वैसे ही इस अभियोग से भी सभी आरोपी शीघ्र ही निर्दोष छूट जाएंगे ।

कॉमरेड पानसरे हत्‍याकांड प्रकरण में निर्दोष हिन्‍दुत्‍वनिष्ठ डॉ. तावडे, अमोल काळे तथा शरद कळसकर को जमानत मिलना, यह अच्‍छी बात है ! – अधिवक्‍ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

अधिवक्‍ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

कॉमरेड पानसरे हत्‍याकांड प्रकरण के संदिग्‍ध शरद कळसकर एवं अमोल काळे को साढे छह वर्ष जितनी लंबी अवधि तक कारागृह में रहने पर भी उनकी जमानत जिला तथा सत्र न्‍यायालय ने निरस्‍त कर दी थी । इन दोनों के साथ डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे की ज़मानत भी ’सर्किट बेंच’ ने स्‍वीकार कर ली है । वास्‍तव में देखा जाए तो डॉ. तावडे की वर्ष २०१८ में जमानत स्‍वीकार की गई थी । इसके उपरांत इस प्रकरण में मुंबई उच्‍च न्‍यायालय ने जमानत निरस्‍त करने से मना कर दिया था । ऐसा होने पर भी जिला तथा सत्र न्‍यायालय ने उसे वर्ष २०२४ में निरस्‍त कर दिया था । हमने उच्‍च न्‍यायालय में तर्क दिया कि यह अनुचित था, जिसे न्‍यायालय ने स्‍वीकार करते हुए तीनों की जमानत स्‍वीकार की । इसलिए कॉमरेड पानसरे हत्‍याकांड प्रकरण में निर्दोष हिन्‍दुत्‍वनिष्ठ डॉ. तावडे, अमोल काळे तथा शरद कळसकर को जमानत मिलना, यह एक अच्‍छी बात हुई ।

“हम इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्‍च न्‍यायालय में याचिका प्रविष्‍ट करने के संबंध में वरिष्‍ठ अधिवक्‍ताओं का सुझाव ले रहे हैं !” – मेघा पानसरे

मेघा पानसरे

कॉ. पानसरे, डॉ. दाभोलकर, कलबुर्गी तथा गौरी लंकेश, साथ ही नालासोपारा प्रकरण में, इन ३ आरोपियों में से कुछ तथा अन्‍य आरोपियों के संबंधित होने की बात पहले ही स्‍पष्ट हो चुकी है । डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे एवं अमोल काळे के विरुद्ध बडे स्‍तर पर प्रमाण उपलब्‍ध होने का न्‍यायालय का पूर्व में निरीक्षण रहा है । इसलिए, डॉ. तावडे तथा अमोल काळे को जमानत मिलना, परिवार के रूप में बहुत दुखद, साथ ही चिंताजनक बात है । हम इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्‍च न्‍यायालय में याचिका प्रविष्‍ट करने के संबंध में वरिष्ठ अधिवक्‍ताओं से परामर्श कर रहे हैं, यह प्रतिक्रिया कॉ. गोविंद पानसरे की पुत्रवधू मेघा पानसरे ने मीडिया को दी है । (कॉ. पानसरे परिवार के हस्‍तक्षेप के कारण ही यह मुकदमा ६ वर्षों से अधिक समय तक नहीं चला । कॉ. पानसरे, साम्‍यवादी तथा पुरोगामी (प्रगतिशील/अधोगामी) के दबाव के कारण डॉ. तावडे जैसे उच्‍च शिक्षित आधुनिक वैद्य को लंबे समय तक कारागृह में रहना पडा । एक ओर संदेहास्‍पदों को जमानत भी नहीं मिलने देनी तथा दूसरी ओर मुकदमा टालने का प्रयास करना, यही काम आज तक डॉ. दाभोलकर तथा कॉ. पानसरे के परिवारों ने किया है ! – संपादक)

आरोपियों को जमानत मिलना, यह समस्‍त हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों के लिए दिवाली निमित्त आनंद का समाचार है ! – रमेश शिंदे, हिन्‍दू जनजागृति समिति

श्री. रमेश शिंदे, हिन्‍दू जनजागृति समिति

कोल्‍हापुर के कॉ. पानसरे की हत्‍या के प्रकरण में कोई ठोस प्रमाण न होने पर भी, साथ ही कोई आपराधिक पृष्‍ठभूमि न होने पर भी निरपराध हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों को बंदी बनाकर हिन्‍दुओं को आतंकवादी प्रमाणित करने का प्रयास किया गया । इस प्रकरण को १० वर्ष हो चुके हैं, फिर भी कोल्‍हापुर के प्रगतिशील गुटों द्वारा दबाव बनाकर मुकदमा खींचकर इन युवाओं को कारागृह में ही सडने देने का षड्यंत्र चल रहा था; परंतु मुंबई उच्‍च न्‍यायालय की कोल्‍हापुर स्‍थित ’सर्किट बेंच’ द्वारा आज इस प्रकरण के अंतिम ३ संदिग्‍धों की जमानत स्‍वीकार कर लिए जाने से उनका यह षड्यंत्र विफल हो गया है, ऐसा हिन्‍दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्‍ता श्री. रमेश शिंदे ने प्रेस विज्ञप्‍ति द्वारा बताया है ।

इस प्रेस विज्ञप्‍ति में श्री. रमेश शिंदे ने आगे कहा कि इन संदिग्‍धों में वे डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे भी सम्‍मिलित हैं, जो पहले हिन्‍दू जनजागृति समिति का कार्य देखते थे तथा कान-नाक-गला विशेषज्ञ हैं । उनके साथ श्री. अमोल काळे एवं शरद कळसकर इन हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों की भी जमानत स्‍वीकार हो गई है । ’जमानत एक नियम है; जबकि कारागृह एक अपवाद है’, इस प्रकार का वाक्‍य न्‍यायाधीशों ने कई निर्णयों में उपयोग किया है; लेकिन इस अभियोग में प्रमाण न होने पर भी इन हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों को वर्षों तक कारागृह में रखा गया । इसके विरोध में लडनेवाले कई मान्‍यवर अधिवक्‍ताओं ने अथक प्रयास करके उनका उचित पक्ष रखा तथा उन पर हो रहे अन्‍याय को न्‍यायालय के ध्‍यान में लाया, उन सभी अधिवक्‍ताओं का भी हिन्‍दू जनजागृति समिति की ओर से अभिनंदन करते हैं । दिवाली के त्‍योहार से पूर्व यह समाचार, अर्थात समस्‍त हिन्‍दुत्‍वनिष्ठों के लिए आनंद का समाचार है ।