‘दीपावली केवल हिन्दुओं का उत्सव नहीं है, अपितु वह सभी उत्सवों का शिरोमणि है । सभी हिन्दू पूरे वर्ष आतुरता से इस त्योहार की प्रतीक्षा करते रहते हैं । संतों के जीवन में दीपावली का आनंद नित्य होता है । ‘संतों को अपेक्षित दीपावली क्या होती है ?’ यहां इसका विवेचन किया गया है ।

१. संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराजजी को अपेक्षित दीपावली
संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराजजी मनुष्य के जीवन में निरंतर दीपावली का आनंद रहे, इसके लिए बताते हैं,
१ अ. सूर्यें अधिष्ठिली प्राची । जगा राणीव दे प्रकाशाची ।
तैशी वाचा श्रोतयां ज्ञानाची । दिवाळी करी ।।
– ज्ञानेश्वरी, अध्याय १५, ओवी १२
अर्थ : जिस प्रकार पूर्व दिशा में सूर्य उदित होकर विश्व को प्रकाश का साम्राज्य प्रदान करते हैं, उसी प्रकार भक्त की वाणी श्रोताओं को ब्रह्मज्ञान की दीपावली का अनुभव कराती है ।
भावार्थ : जिस प्रकार सूर्य उदित होने पर पूरे विश्व को प्रकाश का राज प्राप्त होता है; उसी प्रकार पाठक-श्रोताओं को ज्ञान की दीपावली प्राप्त हो ।
यहां संतश्रेष्ठ ज्ञानदेवजी को ‘ज्ञान की दीपावली’ अपेक्षित है । ज्ञान एवं प्रकाश एकरूप हैं ।

१ आ. संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराजजी आगे बताते हैं,
मी अविवेकाची काजळी । फेडूनि विवेकदीप उजळीं ।।
तैं योगियां पाहे दिवाळी । निरंतर ।।
– ज्ञानेश्वरी, अध्याय ४, ओवी ५४
अर्थ : मैं विवेकदीप पर बनी अविवेक की कालिख को हटाकर उसे प्रज्वलित करता हूं । उस समय योगियों को निरंतर दीपावली प्राप्त होती है ।
भावार्थ : मन में स्थित अविवेक, अज्ञान तथा अहंकार के अंधकार को एक बार विवेक के दीप से दूर किया जाए, तो मनुष्य के जीवन में निरंतर दीपावली बनी रहती है ।
१ इ. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा से संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वरजी को अपेक्षित दीपावली का अनुभव करने का अवसर मिलना : संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वरजी ने उक्त पद्धति से जो बताया है, उसे मैंने सुना और पढा, तब भी मुझे यह ज्ञात नहीं था कि ‘उसका प्रत्यक्ष आचरण कैसे करना चाहिए ?’ मुझ जैसे अज्ञानी जीव के जीवन में ज्ञान का दीप प्रज्वलित हो, इसके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने अध्यात्म, साधना एवं सेवा, इन विषयों पर अभ्यासवर्ग लिए, ग्रंथ लिखे तथा ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक आरंभ किया । इसके परिणामस्वरूप मुझ जैसे साधक के जीवन में ‘ज्ञान की दीपावली’ आ पाई । इसके साथ ही परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति हेतु ‘गुरुकृपायोग’ साधनामार्ग बताया है । उसमें उन्होंने स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन हेतु प्रयास करने को महत्त्व दिया है । साधकों ने उस प्रकार प्रयास किए, उसके कारण साधकों के मन में व्याप्त अविवेक,अज्ञान एवं अहंकार का अंधकार नष्ट हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप साधकों को अपने जीवन में नित्य दीपावली का आनंद मिल रहा है ।
२. संतों का सत्संग ही है दीपावली !, ऐसा जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी द्वारा बताया जाना
तिथि के अनुसार वर्ष में ५ दिन आनेवाली दीपावली निश्चित ही आनंद देनेवाली है; परंतु जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी कहते हैं, ‘जिस दिन साधु-संत हमारे घर आएं, चाहे वह तिथि कोई भी हो, तब भी उस दिन हमें मिलनेवाला आनंद दशहरा-दीपावली जैसा होता है ।’ संतों के सत्संग की दीपावली की तुलना करते हुए जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी बताते हैं,
अ. ‘साधू-संत येती घरा तोचि दिवाळी दसरा ।’
भावार्थ : ‘साधु-संतों का घर पर आगमन होना, मानो दीपावली एवं दशहरा ही होता है !’
आ. ‘दसरा दिवाळी तोची आम्हा सण । सखे संतजन भेटतील ।।’
भावार्थ : ‘मुझे अन्य संतों का सान्निध्य मिलना ही सच्चा दशहरा एवं दीपावली है ।’
इ. ‘तुका म्हणे त्याचे घरची उष्टावळी । मज ते दिवाळी दसरा सण ।।’
भावार्थ : ‘संतों ने जो विचार दिए, उनका अनुभव करने का अवसर मिलना मेरे (भक्त के) जीवन में आई सच्ची दीपावली एवं दशहरा है ।’
२ अ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी की कृपा से संतों का सत्संग मिलने के कारण जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी को अपेक्षित दीपावली का नित्य अनुभव करना : मेरे परम सौभाग्य से ३४ वर्ष पूर्व परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी मेरे जीवन में आए तथा उससे मेरे जीवन में आनंद की दीपावली का प्रातःकाल हुआ । वर्ष १९८९ से १० वर्ष तक मुझे स्थूल से प्रतिदिन परात्पर गुरु डॉक्टरजी का सत्संग मिला, साथ ही प.पू. भक्तराज महाराजजी, प.पू. जोशीबाबा, प.पू. काणे महाराजजी इत्यादि संतों का लंबे समय तक सत्संग मिला । पिछले १४ वर्ष से मैं देवद, पनवेल के सनातन आश्रम में रह रहा हूं । उसके कारण मुझे प.पू. पांडे महाराजजी, आश्रम में आनेवाले समाज के विभिन्न संत, सनातन के सद्गुरु तथा संतों का निरंतर सत्संग मिल रहा है । उसके कारण मैं संत तुकाराम महाराजजी को अपेक्षित सत्संगरूपी दीपावली का नित्य अनुभव कर रहा हूं ।
३. सनातन संस्था में आने पर सच्ची दीपावली के आनंद का अनुभव होना
मेरे सौभाग्य से मैं कुछ वर्ष तक दीपावली की अवधि में सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के साथ था तथा मैंने उनमें विद्यमान आनंद का अनुभव किया । गुरुदेवजी के साथ वर्ष १९९४ में मैं सपरिवार इंदौर में प.पू. भक्तराज महाराजजी के आश्रम में दीपावली की अवधि में गया था, उस समय मुझे दीपावली का आनंदोत्सव प्राप्त हुआ । प.पू. भक्तराज महाराजजी के साथ देवदीपावली पर मैं नासिक में था । उसके उपरांत परात्पर गुरु डॉक्टरजी मेरे हृदय-सिंहासन पर विराजमान होने के कारण मैं नित्य दीपावली का अनुभव कर पा रहा हूं । इसके लिए उनके चरणों में ये काव्यरूपी शब्दसुमन अर्पित करता हूं,
साधकों के गुरु परम पूज्यजी (टिप्पणी) हैं आनंद की प्रतीति ।
साधकों का भाव अनंत है परम पूज्यजी के प्रति ।
साधना से साधक पाते रामराज्य की अनुभूति ।
रामराज्य में साधकों के लिए है नित्य दीपावली ।।’
- टिप्पणी : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
– (पू.) शिवाजी वटकर (आयु ७७ वर्ष, सनातन के १०२वें [समष्टि] संत), सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (२०.४.२०२४)
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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