इतिहास में कैसे मनाते थे दीपावली ?

भारत में अनेक वर्षाें से दीपावली का त्योहार मनाया जा रहा है । पुराणकथाओं में भी ‘दीपोत्सव’ जैसे त्योहार के संदर्भ मिलते हैं, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है । पेशवाकाल सहित संतपरंपरा में इस त्योहार के संदर्भ मिलते हैं ।

वैदिक साहित्य में ‘अश्वायुजी’ अथवा ‘नवान्नपूर्णिमा’ यज्ञ का उल्लेख

वैदिक साहित्य में ‘अश्वायुजी’ अथवा ‘नवान्नपूर्णिमा’ यज्ञ का उल्लेख आता है । दीपावली इन यज्ञों के निकट आनेवाला त्योहार है । जब खेत में नया अनाज आता है, उस समय ‘कामसूत्र यक्षरात्रि’ के नाम से कुबेरपूजा का अर्थात ‘लक्ष्मीपूजन’ का उल्लेख आता है । रामायण एवं महाभारत में भी ‘दीपावली’ का भले ही उल्लेख न हो, तब भी उसका बीजरूप है, ऐसा कहा जा सकता है ।

पुराणों में ‘दीप कैसे प्रज्वलित करें ?’, इसका उल्लेख !

‘चतुर्वर्ग चिंतामणी’ अथवा ‘नीलमतपुराण’, इन ग्रंथों में ‘दीप कैसे प्रज्वलित करें ?’, इसका वर्णन मिलता है । पडवे की बलि की प्रथा है, जिसमें वामनावतार है, पुराण में उस ‘बलिप्रतिपदा’ का उल्लेख आया है ।

११वीं शताब्दी में मराठी भाषा में ‘दीपावली’ शब्द का उल्लेख

११वीं शताब्दी के उपरांत मराठी भाषा के साहित्य में ‘दीपावली’ शब्द का सुस्पष्ट उल्लेख मिलता है; परंतु उसके पूर्व ‘दीपोत्सव’ नाम से उल्लेख है । इसी काल में जो ‘लीळाचरीत’ लिखा गया, उसमें भाईदूज का वर्णन आता है ।

पेशवाओं के काल में पटाखे लाए जाने का उल्लेख !

पुणे के शनिवारवाडा में वर्तमान समय में दीपोत्सव के उपलक्ष्य में जितने दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, उससे अनेक गुना दीप पेशवाकाल में प्रज्वलित किए जाते थे । उस समय के पटाखों के नाम भी बडे रोचक थे । चंद्रज्योति, नीली सिंगटी, फूलबाजा इत्यादि ! वर्ष १७४० का उल्लेख मिलता है कि ‘राजश्री पंत नाना स्वामी खेलने के लिए आतिशबाजी की सामग्री लेकर आए ।’ इतिहास के अध्येता मंदार लवाटे ने यह जानकारी दी है ।

सवाई माधवराव पेशवा हेतु पर्वती पर ‘आतिशबाजी’ किए जाने का उल्लेख !

महादजी शिंदे ने पुणे आकर राजस्थान के कोटा में की जानेवाली आतिशबाजी का वर्णन किया । उसके उपरांत ‘ऐसे मजे सवाई माधवराव पेशवा भी देखें’, यह मांग होने पर महादजी शिंदे ने पुणे में ८ से १० दिन तक उसकी तैयारी की । उसके उपरांत महादजी शिंदे ने सवाई माधवराव पेशवा के लिए पर्वती पर भारी मात्रा में आतिशबाजी का आयोजन किया । ‘यह आतिशबाजी देखने के लिए अनेक लोग सायंकाल के समय पर्वती परिसर में बैठे हुए थे’, इतिहास के अध्येता मंदार लवाटे ने ऐसी जानकारी दी ।

अंग्रेजों के काल में लोग टिकट लेकर आतिशबाजी देखने आते थे !

१८ वीं शताब्दी के पहले लंदन के राजमहल में चार्ल्स टॉमस बॉक द्वारा आरंभ की गई आतिशबाजी के बारूद की प्रथा ७० वर्षाें तक चलती रही । आरंभ के काल में शब्द एवं चित्र तथा उसके उपरांत व्यक्तिचित्र बनानेवाली आतिशबाजी हुई । यह आतिशबाजी देखने हेतु अर्थात पटाखों से बनाई जानेवाली कलाकृतियां देखने के लिए ८० सहस्र तक दर्शक टिकट लेकर आते थे । (संदर्भ : मराठी विश्वकोश)

सेना में आतिशबाजी के बारूद का उपयोग !

किसी क्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए तेजस्वी प्रकाश एवं संदेशवहन हेतु सांकेतिक रंगीन प्रकाश अथवा धुआं उत्पन्न करने का उपयोग सेना में किया जाता था । रूस के प्रथम राजा निकोलस ने ऑस्ट्रियन मोर्चे पर वॉर्सा से लेकर सेंट पीटर्सबर्ग तक संदेशवहन हेतु आतिशबाजी के बारूद के २२० स्थानकों की प्रणाली बनाई थी, ऐसा इतिहास में उल्लेख मिलता है ।

विभिन्न समूहों के पूर्वनियोजित संकेतों के लिए प्रकाश उत्सर्जक तथा धूम्रकारी पदार्थाें का उपयोग कर संदेशवहन के लिए आतिशबाजी के बारूद के प्रयोग किए गए । उसी प्रकार युद्धकाल में विमान को उतारते समय अवतरणपथ (रनवे) को प्रकाशित करने हेतु छातायुक्त ज्योति, जबकि रणक्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए तारे उत्पन्न करनेवाले गोलों का उपयोग किया जाता था । (संदर्भ : मराठी विश्वकोश)

भांडारकर इंस्टीट्यूट एवं तिलक महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, साथ ही जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम किया है, ऐसी डॉ. सुचेता परांजपे ने इस संदर्भ में दैनिक ‘सकाळ’ से संवाद किया, उसमें उन्होंने यह जानकारी दी ।

– श्रद्धा कोळेकर (साभार : दैनिक ‘सकाळ’)