
१. ‘ईश्वर की लीला से विधि का विधान जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र में संलिप्त करता है, जबकि उस घोर बंधन से मुक्त होने हेतु साधना सिखाकर उस चक्र से मुक्त करनेवाले केवल गुरु ही होते हैं !’
२. ‘साधको, ‘साक्षात परमेश्वर स्वरूप गुरुदेवजी की छत्रछाया में स्थित प्रत्येक साधक का जीवन निश्चित ही सामान्य न रहकर दैवी एवं स्वर्णिम होनेवाला है’, इसके प्रति संपूर्ण श्रद्धा रखकर आप उन स्वर्णिम क्षणों की प्रत्यक्ष अनुभूति लें !’
३. ‘हमारे अंतर में श्री गुरु के प्रति जितना अधिक भाव होगा, तदनुसार श्री गुरुतत्त्व हममें कार्यरत होकर वह हमसे गुरुकार्य करवा लेता है !’
४. ‘अवतारी गुरु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का अवतारी रूप तथा उनके कार्य की कीर्ति केवल दसों दिशाओं तक ही नहीं, अपितु सप्तलोक एवं सप्तपाताल तक पहुंचनेवाली है’, यह त्रिकाल सत्य है !’
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !