
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले : ‘छींक आना’ पूर्वसूचना होती है क्या ? व्यक्ति जब बोल रहा होता है, उस समय उसे अथवा अन्यों को छींक आई, तो क्या उसका कुछ परिणाम होता है ? (२.४.२०२३)
श्री. राम होनप :

१. छींक आने के विषय में जालस्थल पर उपलब्ध जानकारी
‘छींकें आने का अर्थ है फेफडों द्वारा नाक एवं मुंह के मार्ग से व्यक्ति के शरीर से बाहर निकलनेवाली जोरदार हवा ! यह क्रिया अनैच्छिक है । छींकें आने के संभावित कारण हैं ‘एलर्जी (धूल, फफूंद तथा पालतू पशुओं का भूसा), विषाणुजन्य संक्रमण (फ्लू एवं सामान्य सर्दी), सांस से कुछ औषधियां लेना, मसालेदार पदार्थ खाना, तनाव तथा अन्य तीव्र भावनाएं’ !
(साभार : https://my.clevelandclinic.org/health/symptoms/sneezing)
२. उक्त संदर्भ में सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान !
२ अ. आध्यात्मिक पीडा से ग्रस्त साधक : जैसे अनिष्ट शक्तियों की पीडा से ग्रस्त साधक किसी जागृत मंदिर, अत्यंत चैतन्यमय आश्रम अथवा संतों के संपर्क में आता है, उस समय वहां के चैतन्य का परिणाम ऐसे साधक के शरीर पर होता है । उस समय चैतन्य के कारण साधक में समाहित कष्टदायक शक्ति द्रवीभूत होकर फेफडों के द्वारा वह शरीर के बाहर निकलती है, जिसके परिणामस्वरूप उसे छींकें आती हैं ।
२ आ. ६० प्रतिशत तथा उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त साधक : जब ६० प्रतिशत तथा उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त साधक रज-तम बहुल परिसर में जाता है अथवा किसी पीडा से ग्रस्त व्यक्ति के संपर्क में आता है, उस समय कष्टदायक शक्तियां ऐसे साधक पर सूक्ष्म से आक्रमण करती हैं । उस समय साधक के शरीर के माध्यम से उसकी स्वयं की रक्षा हेतु ईश्वरीय शक्ति प्रकट होती है । ईश्वरीय शक्ति के ये कण ऐसे साधक के फेफडों के माध्यम से उसके शरीर के बाहर निकल आते हैं, उस समय उस साधक को जोरदार छींकें आती हैं । इस प्रक्रिया के कारण साधक के शरीर पर आए कष्टकारी शक्तियों का प्रभाव अल्प होने में सहायता मिलती है ।
२ इ. संत : अनिष्ट शक्तियां संतों पर सूक्ष्म से आक्रमण करती हैं, उस समय संतों को आनेवाली छींकों के द्वारा वातावरण में ईश्वरीय शक्ति के अनेक कण प्रकट होते हैं तथा उसके कारण संतों की देह की रक्षा होती है, साथ ही वातावरण में स्थित अनिष्ट शक्तियों का प्रभाव अल्प होता है ।
२ ई. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी
२ ई १. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के सहस्रारचक्र पर स्थित विश्वमयकोष पर विश्व की अच्छी एवं अनिष्ट घटनाओं का परिणाम होना : प्रत्येक व्यक्ति में विभिन्न सूक्ष्म कोष होते हैं, उदा. अन्न से संबंधित अन्नमयकोष, प्राण से संबंधित प्राणमयकोष, मन से संबंधित मनोमयकोष इत्यादि ! परात्पर गुरु डॉक्टरजी का कार्य अवतारी होने से उनमें विश्वमयकोष है । यह कोष विश्व से संबंधित है, साथ ही परात्पर गुरु डॉक्टरजी के सहस्रारचक्र से संबंधित है । उस स्थान को ‘ब्रह्मस्थान’ भी कहते हैं । विश्व में घटित होनेवाली अच्छी अथवा अनिष्ट घटनाओं का परिणाम परात्पर गुरु डॉक्टरजी के विश्वमयकोष पर होता रहता है ।
२ ई २. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को होनेवाले शारीरिक कष्ट विश्व में होनेवाली विभिन्न नकारात्मक घटनाओं के परिणाम हैं : विश्व के विभिन्न स्थानों पर जब साधकों, भक्तों तथा भारत पर बडे आघात होते हैं, उस समय सर्वप्रथम सूक्ष्म से उसका नकारात्मक परिणाम परात्पर गुरु डॉक्टरजी के विश्वमयकोष पर होता है । इन आघातों की तीव्रता अल्प करने हेतु परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी में विद्यमान ईश्वरीय शक्ति कार्यरत होती है । उसके उपरांत यह ईश्वरीय शक्ति विश्व में हो रहे विभिन्न आघात दूर करने हेतु गति से परात्पर गुरु डॉक्टरजी के शरीर के द्वारा वातावरण में प्रक्षेपित होती है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी पर इसका परिणाम ‘थकान होना, चक्कर आना, प्राणशक्ति क्षीण होना, गला सूखना, ग्लानि आना तथा छींकें आना’, आदि के रूप में होता है ।
‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को अकस्मात छींकें आना’ सूक्ष्म युद्ध अथवा किसी बडे संकट की पूर्वसूचना भी हो सकती है ।’
– श्री. राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (३.७.२०२५)
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