विशिष्ट प्रकार की देखरेख किए बिना उगनेवाली सब्जियों को ‘वनशाक’ कहते हैं । वन में, खेत की बाड पर में ये सब्जियां बिना रोपण किए उगती हैं । इन वनस्पतियों में खनिज, मूलद्रव्य, उपयोगी रसायन एवं औषधीय गुणधर्म होते हैं । महाराष्ट्र सरकार की ओर से जिला सूचना कार्यालय से चलाई जा रही लेखमाला यहां दी है ।
(भाग १)

१. औषधीय गुणधर्म एवं उपयोग

अपामार्ग को वायविडंग या हिंगुचक्का भी कहते हैं । वैज्ञानिक नाम : Achyranthes aspera
इस वनस्पति की जडें, फूल तथा फलों का औषधि में उपयोग किया जाता है । यह कडवा, तीखा, गरम, वायुनाशक, अम्लरोधी, रक्तवर्धक, मूत्रजनक, पथरी, उदरशूल, जलोदर, अपचन, अमांश, रक्तरोग आदि बीमारियों में उपयुक्त है । अपामार्ग की राख चिकित्सकीय द्रव में अग्रणी है । अपामार्ग का क्षार तंत्रिका एवं हड्डियों, साथ ही रक्तकणों के लिए उपयुक्त है । अपामार्ग की वनस्पति को सुखाकर उसके उपरांत उसे जलाकर मिलनेवाली राख पानी में मिलाई जाती है । कपडे से छाना हुआ यह पानी धूप में सुखाते हैं । उससे नमक जैसी राख जम जाती है । इस क्षार में चूना, लोहा, नमक, गंधक आदि घटक होते हैं । भोजन से पूर्व इसका काढा पीने से पाचकरस बढता है, जबकि भोजन के उपरांत पीने से अम्लता घटती है । यकृत की बीमारी पर अपामार्ग की क्रिया बहुत हितकारी है ।
अपामार्ग के कोमल पत्तों की सब्जी बनाते हैं । यह सब्जी पाचक है तथा पेशाब साफ होने में उपयोगी है । इस सब्जी के सेवन से हड्डियां सशक्त होती हैं । शरीर की चर्बी घटने के लिए सूखी सब्जी उपयुक्त है । इस सब्जी के सेवन ने बवासीर का कष्ट घटने में सहायता मिलती है ।
२. सब्जी बनाने की पद्धति
अपामार्ग के कोमल पत्तों को धोकर उन्हें काट लें । कढाई में तेल गरम कर उसमें जीरा, कटा हुआ प्याज, लहसुन पीसकर डालें । उसमें कटी मिर्च डालें । उसके उपरांत कटी हुई सब्जी डालकर उसमें नमक डालें । सब्जी को चलाकर ढक्कन लगाएं तथा उसे ठीक से पका लें ।
– श्री. प्रशांत सातपुते, जिला सूचना अधिकारी, रत्नागिरी.
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