‘उदयपुर फाइल्स’ का ‘सर तन से जुदा’ !

व‍ीर विनायक दामोदर सावरकर ने इटली के महान क्रांतिकारी जोसेफ मैजिनी की आत्मकथा से प्रेरणा ली थी । वर्ष १९०७ का वह काल ! वीर सावरकर ने इंग्लैंड में वर्ष १८५७ में हुए अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह के विषय पर ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ (अर्थात ‘भारत की स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध’) इस नाम से पुस्तक लिखी । उसकी प्रतियां अन्य क्रांतिकारियों के माध्यम से भारत भेजी गईं, जिससे भारत के क्रांतिकारियों को उससे प्रेरणा मिल सकेगी; परंतु उस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही अंग्रेजों ने उस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया । किसी पुस्तक पर उसके प्रकाशन से पूर्व प्रतिबंध लगाने का यह पहला उदाहरण है । इसी की पुनरावृत्ति हाल ही में प्रदर्शित होने जा रही फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ के संबंध में देखने को मिल रही है । देहली उच्च न्यायालय ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाई । सर्वाेच्च न्यायालय ने भी १६ जुलाई की दोपहर को इस रोक को यथावत रखकर केंद्र सरकार को इसके संदर्भ में शीघ्रातिशीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया । अन्य समय ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर आक्रोश दर्शाकर हिन्दुओं को घेरनेवाले आधुनिकतावादियों ने तथा कांग्रेसियों ने ही वास्तव में इस संदर्भ में स्वतंत्रता का गला घोंट दिया । राज्यसभा सांसद तथा वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल इस फिल्म पर प्रतिबंध लगे, इसके लिए हाथ धोकर इस फिल्म के पीछे पडे हुए हैं । कट्टरतावादी इस्लामी संगठन ‘जमियत उलेमा-ए-हिन्द’ ने इस फिल्म पर आपत्ति दर्शाकर न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की है ।

मध्ययुगीन हत्या !

इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की पृष्ठभूमि हम समझ लेते हैं । वर्ष २०२२ ! भाजपा की तत्कालीन प्रवक्ता नुपूर शर्मा ने पैगंबर मोहम्मद के विरोध में कथित आपत्तिजनक वक्तव्य दिया । इस पर इस्लामी राष्ट्रों ने केंद्र की भाजपा सरकार को घेरा । पूरे भारत में मुसलमानों ने हिंसक आंदोलन चलाए । ‘गुस्ताख ए नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ अर्थात ही ‘अल्लाह का अनादर करनेवाले को ‘शिरच्छेद’, यह एक ही दंड’ जैसे भयावह नारे लगाए । इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने ६ वर्षाें के लिए नुपूर शर्मा को भाजपा से निलंबित किया । ऐसे में उदयपुर (राजस्थान) के कन्हैयालाल नामक हिन्दू दर्जी ने नुपूर शर्मा के समर्थन में फेसबुक पर पोस्ट डाली । उसका विरोध होने के कारण उन्हें कारागृह भी जाना पडा । जमानत मिलने के उपरांत २८ जून २०२२ को जब वे अपनी दुकान में काम कर रहे थे, तब रियाज अत्तारी एवं मोहम्मद गौस ने ‘सर तन से जुदा’ का नारा लगाकर उनका सिर काट दिया । इस पूरे घटनाक्रम पर आधारित है फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’!

ऐसे मध्ययुगीन कृत्य की निंदा होनी चाहिए थी; परंतु हुआ उल्टा ही ! सर्वाेच्च न्यायालय ने नुपूर शर्मा के अभियोग पर अपना निरीक्षण बताते हुए कहा, ‘नुपूर शर्मा द्वारा दिए गए वक्तव्य के कारण सर्वत्र हिंसा फैली । उसके लिए उन्हें मुसलमान समाज से क्षमा मांगनी चाहिए ।’ इस निरीक्षण से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूलभूत अधिकार का हनन हुआ था । सर्वत्र सांस्कृतिक नहीं, अपितु मानवाधिकारों का शिरच्छेद हुआ था ।

इसे अब ३ वर्ष बीत चुके हैं । जिहादियों के विरुद्ध राजस्थान के न्यायालय में चल रहा अभियोग अभी पूरा नहीं हुआ है । कन्हैयालाल की विधवा पत्नी तथा उनके २ बच्चे न्याय की प्रतीक्षा में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं । उनकी दुर्भाग्यपूर्ण कहानी विश्व के सामने लानेवाली इस फिल्म के प्रसारण पर केवल ३ दिनों में ही रोक लगाई जाती है । एक ही प्रकरण, एक ही व्यवस्था; परंतु चौंकानेवाला यह विरोधी न्याय !, ऐसा भी जनता को लग सकता है । न्यायव्यवस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, यह स्वीकार्य ही है । लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ के रूप में अराजकता को रोकने हेतु उसका मान-सम्मान बनाए रखना अत्यंत आवश्यक; परंतु जब ऐसा कुछ देखने को मिलता है, तब १०० करोड हिन्दुओं का मन निराश होता है । क्या किसी के पास इसका उत्तर है ?

अब इसमें न्यायालय ने ‘इस फिल्म के प्रसारण के संदर्भ में केंद्र सरकार अर्थात प्रधानमंत्री मोदी निर्णय लें’, इस प्रकार पहली बार ही निर्णय दिया गया है । इसमें ऐसा भी नहीं हुआ है कि सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म के प्रसारण के लिए सीधे हरी झंडी दिखाई । उसमें ५० ‘कट’ दिए गए । उसके भी आगे जाकर फिल्म के प्रसारण पर ही प्रतिबंध लगाया जाता है, इसका अर्थ इससे सेंसर बोर्ड की आवश्यकता पर तथा प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है । वैसे देखा जाए, तो सेंसर बोर्ड भी कोई दूध का धुला नहीं है । विगत ३० वर्षाें में हिन्दुओं के देवी-देवता, हिन्दुओं की प्रथा-परंपराएं तथा साधु-संतों का उपहास करनेवाली अनेक फिल्में आईं, जिन्हें इसी सेंसर बोर्ड ने प्रसारित होने दिया । ‘पीके’, ‘मोहल्ला अस्सी’, ‘लक्ष्मी बाँब’, ‘ओह माय गॉड’, ‘वॉटर’, ‘लज्जा’, ‘फायर’, ‘तुम्बाड’, ‘बाँबे’ जैसी अनेक फिल्मों में हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को पैरों तले कुचला गया । हिन्दू आस्थाओं को किस प्रकार लक्ष्य बनाया जाता है, यह बताने हेतु ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ नामक एक संगठन भी बना है । यही उदाहरण ‘हिन्दूफोबिया’ की गहनता बताने के लिए पर्याप्त है ।

एकमात्र उपाय !

अब न्यायव्यवस्था को साथ लेकर हिन्दूविरोधी लोग एक भयानक परंपरा स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं, ऐसा कुछ बडे अधिवक्ता बोल रहे हैं । हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों के विषय पर जब किसी फिल्म के प्रदर्शित होने की आहट लगती है, तब सेंसर बोर्ड उस पर कैंची चलाकर पहले ही उसके महत्त्वपूर्ण दृश्यों को हटा देता है । उसके पश्चात फिल्म को न्यायालय में खींचा जाता है तथा उस पर प्रतिबंध लगाया जाता है । इस उदाहरण में तो ‘उदयपुर फाइल्स’ के प्रसारण के लिए तथा उसके कारण होनेवाले संभावित परिणामों को संपूर्णतया केंद्र सरकार को ही उत्तरदायी माना जानेवाला है । आनेवाला समय हिन्दुओं के लिए तथा केंद्र सरकार के लिए खतरे की घंटी है, यह इस फिल्म से स्पष्ट होता है । निर्माता-निर्देशक मनप्रीत सिंह धामी की कुछ दिन पूर्व प्रदर्शित ‘हिस स्टोरी ऑफ इतिहास’ फिल्म से हिन्दू युवकों को उनके धर्म के विपरीत शिक्षा देनेवाले क्रमिक पुस्तकों पर प्रकाश डाला गया । उसके कारण इस फिल्म को सिनेमाघर उपलब्ध नहीं होने दिए गए । अब बहुत शीघ्र विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित ‘द बेंगॉल फाइल्स’ फिल्म प्रदर्शित होगी । वह हिन्दुओं के हाथ से लगभग छूट चुके बंगाल राज्य में किस प्रकार हिन्दुओं पर अन्याय-अत्याचार हुए, उस पर प्रकाश डालनेवाली है । अब इस फिल्म को कौनसे संघर्ष का सामना करना पडेगा, यह ईश्वर ही जानें; परंतु वर्तमान में ‘उदयपुर फाइल्स’ का तो ‘सर तन से जुदा’ हो चुका है । इस भयानक समस्या का उपाय एक ही है, वह है भारतीय लोकतंत्र का प्रथम स्तंभ – संसद ! वह बनाई जाती है, हमारे मतदान से ! अब देश के करोडों हिन्दुओं को इस फिल्म का प्रसारण होने हेतु सरकार को बाध्य करना चाहिए तथा उससे होनेवाले संभावित परिणामों के समय सरकार के साथ खडे रहना चाहिए । यदि ऐसा हुआ, तभी कन्हैयालाल के परिवार को थोडा-बहुत न्याय मिलेगा, अन्यथा इस खंडित देश में सिर काटने की मानसिकता की विजय होती रहेगी !