आन्ध्रप्रदेश सरकार का सराहनीय आदेश

अमरावती (आन्ध्रप्रदेश) — आन्ध्रप्रदेश सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह स्पष्ट किया गया है कि “कोई भी प्रशासकीय अधिकारी (आयुक्त, प्रादेशिक संयुक्त आयुक्त, उपआयुक्त अथवा सहायक आयुक्त) को अपने अधीनस्थ देवस्थानों की आगम परंपरा, रूढियां तथा धार्मिक आचार-प्रणाली में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा ।”
इस संदर्भ में जारी आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि — “वेदशास्त्र एवं आगमशास्त्र के विषय में देवस्थानों को स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए, देवस्थानों की धार्मिक परंपराओं एवं रूढियों की पवित्रता अक्षुण्ण रखी जानी चाहिए तथा धर्मादाय अधिनियम की धारा १३ (१) के प्रावधानों का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए ।”
आदेश में क्या कहा गया है ?
१. महत्त्वपूर्ण धार्मिक निर्णयों में आचार्य अथवा अर्चक का निर्णय अंतिम होगा
पूजा-विधि, सेवा (सेवापद्धति), यज्ञ, कुम्भाभिषेक, उत्सव-समारोह आदि विषयों में कोई भी निर्णय लेते समय देवस्थान के वरिष्ठ अर्चक अथवा धार्मिक अधिकारी का मत निर्णायक माना जाएगा । इस संबंध में यदि आवश्यकता हो, तो कार्यकारी अधिकारी मन्दिर के लिए वेदशास्त्र समिति की स्थापना कर सकते हैं । यदि मतभेद उत्पन्न हो, तो उस विशेष आगम परंपरा से संबंधित पीठ के पीठाधिपति का परामर्श लिया जाना चाहिए ।
२. प्रत्येक देवस्थान को स्वतंत्र माना जाएगा
किसी भी देवस्थान पर, चाहे वह समान आगम परंपरा से संबंधित क्यों न हो, अन्य किसी देवस्थान की परंपराओं का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा ।
३. सेवा-पद्धति में प्रशासन का हस्तक्षेप वर्जित
कार्यकारी अधिकारी मेरी यह सुनिश्चित करने हेतु हस्तक्षेप कर सकते हैं कि किसी प्रकार का आगम-विरोधी परिवर्तन न हो ; परन्तु उस अधिकारी को प्रत्यक्ष रूप से सेवा अथवा पूजाविधि आदि में कोई हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा ।
संपादकीय भूमिकावर्तमान परिस्थिति में आन्ध्रप्रदेश सरकार का यह आदेश योग्य अवश्य है, किन्तु मूलतः हिन्दुओं के मन्दिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना आवश्यक है । ऐसा होने पर ही सरकार को मन्दिरों के विषय में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं रहेगा । |
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