मद्रास उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण आदेश ।

नई दिल्ली – तमिलनाडु के एक दोषी को हत्या की एक घटना में आजीवन कारावास तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के अंतर्गत एक वर्ष का दंड सुनाया गया था। उसका नाम ए. धनपाल है तथा वह २१ वर्ष से अधिक समय कारागार में बिता चुका है । लंबे समय बाद उसने कुछ समय पूर्व छूटने के लिए आवेदन किया था । हालांकि, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा ४३५ के अंतर्गत केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक होने की बात कहते हुए तमिलनाडु सरकार ने उसका आवेदन निरस्त कर दिया । इसके बाद धनपाल के पुत्र नंजिल मुगिलन ने मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । याचिका में कहा गया कि उसके पिता केंद्रीय कानून के अंतर्गत मिला एक वर्ष का अतिरिक्त दंड पहले ही पूरा कर चुके हैं । इसलिए अब केंद्र सरकार की अनुमति की शर्त लागू नहीं होनी चाहिए । इस पर उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि संबंधित दंड पहले ही पूरा हो चुका है, तो केवल केंद्र सरकार की अनुमति न मिलने के आधार पर किसी कैदी को समय पूर्व छूटने के लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता ।
यह सुनवाई न्यायमूर्ति अनिता सुमंत तथा न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की खंडपीठ ने की ।
निर्देशों का दूरगामी महत्व –
उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को धनपाल के आवेदन पर पुनर्विचार करने एवं चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है ।
यह आदेश न केवल सरकार के अधिकारों तथा कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास है, अपितु भारतीय जेल व्यवस्था, कैदियों के अधिकारों तथा समय पूर्व छोडने संबंधी कानूनों की व्याख्या के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है ।
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